महात्मा गांधी: एक युगपुरुष, एक विचार और मानवता की अमर विरासत |
बीसवीं सदी के सबसे महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार महात्मा गांधी के बारे में कहा था, "आने वाली पीढ़ियों को शायद ही इस बात पर विश्वास हो कि हाड़-मांस का ऐसा कोई इंसान कभी इस धरती पर चला था।" यह कथन मात्र प्रशंसा नहीं, बल्कि उस विराट व्यक्तित्व का प्रमाण है जिसने न केवल भारत का मानचित्र बदला, बल्कि पूरी दुनिया को संघर्ष का एक नया और पवित्र मार्ग दिखाया। मोहनदास करमचंद गांधी से 'महात्मा' और फिर पूरे राष्ट्र के 'बापू' बनने की उनकी यात्रा, मानवीय इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। आज, जब दुनिया हिंसा और असहिष्णुता के दौर से गुजर रही है, गांधी के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गए हैं।
गांधीजी का जीवन पोरबंदर की गलियों से शुरू होकर लंदन की कानून की कक्षाओं तक पहुँचा, लेकिन उनके जीवन का वास्तविक परिवर्तन दक्षिण अफ्रीका में हुआ। वह वहां एक बैरिस्टर के रूप में गए थे, लेकिन एक सत्याग्रही बनकर लौटे। पीटरमैरिट्सबर्ग स्टेशन पर जब उन्हें केवल उनकी चमड़ी के रंग के कारण ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे से बाहर फेंक दिया गया, तो उस अपमान ने उनके भीतर विद्रोह की चिंगारी नहीं, बल्कि न्याय की मशाल जलाई।
यही वह क्षण था जब 'सत्याग्रह' का जन्म हुआ। उन्होंने महसूस किया कि अन्याय के खिलाफ हथियार उठाना आसान है, लेकिन सत्य और अहिंसा के बल पर उसका प्रतिरोध करना कहीं अधिक साहस का काम है। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने सीखा कि आत्मबल शारीरिक बल से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है।
1915 में भारत लौटने पर, गांधीजी ने गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर पहले पूरे भारत का भ्रमण किया। उन्होंने भारत की आत्मा को गांवों में बसते देखा। चंपारण का नील आंदोलन हो या खेड़ा का सत्याग्रह, गांधीजी ने राजनीति को ड्राइंग रूम से निकालकर खेतों और खलिहानों तक पहुँचा दिया।
गांधीजी का सबसे बड़ा हथियार 'अहिंसा' था। यह कायरों की विवशता नहीं, बल्कि वीरों का आभूषण था। असहयोग आंदोलन के दौरान जब चौरी-चौरा में हिंसा हुई, तो उन्होंने एक विशाल आंदोलन को तत्काल वापस ले लिया। यह दुनिया के लिए एक आश्चर्यजनक घटना थी। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि "साध्य की पवित्रता के साथ-साथ साधन की पवित्रता भी अनिवार्य है।" वह आजादी चाहते थे, लेकिन खून के धब्बों वाली आजादी उन्हें स्वीकार नहीं थी।
1930 का दांडी मार्च (नमक सत्याग्रह) गांधीजी की रणनीतिक कुशलता का सबसे बड़ा उदाहरण था। नमक जैसी साधारण चीज, जो हर गरीब की जरूरत थी, उसे उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया। 78 अनुयायियों के साथ शुरू हुई वह यात्रा जब समुद्र तट पर समाप्त हुई, तो पूरा देश उनके साथ खड़ा था। लाठियां बरसीं, जेलें भर गईं, लेकिन हाथ नहीं उठे। इस नैतिक साहस ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी।
गांधीजी का लक्ष्य केवल अंग्रेजों को भारत से भगाना नहीं था, बल्कि भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों को खत्म करना भी था। उन्होंने छुआछूत को मानवता पर कलंक माना और दलितों को 'हरिजन' (ईश्वर के जन) का नाम दिया। वह जानते थे कि एक विभाजित समाज कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता।
उन्होंने चरखा और खादी को केवल कपड़े तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक बनाया। उनका मानना था कि सच्चा भारत शहरों में नहीं, बल्कि उसके सात लाख गांवों में बसता है। ग्राम स्वराज की उनकी परिकल्पना आज भी विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा मॉडल है।
15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब आजादी का यह महानायक कोलकाता की गलियों में दंगों की आग बुझा रहा था। भारत का विभाजन उनके जीवन का सबसे गहरा घाव था। वह हिंदू- मुस्लिम एकता के लिए अंतिम सांस तक लड़े। विडंबना देखिए, जिस व्यक्ति ने जीवन भर अहिंसा का पाठ पढ़ाया, उसका अंत हिंसा से हुआ। 30 जनवरी 1948 को जब गोलियां उनके सीने में लगीं, तो उनके मुख से केवल 'हे राम' निकला। उन्होंने अपने हत्यारे के प्रति भी द्वेष नहीं रखा।
अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या 21वीं सदी के परमाणु युग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में गांधी प्रासंगिक हैं? उत्तर है- हाँ, शायद पहले से भी ज्यादा।
आज जब हम ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे हैं, गांधीजी का यह कथन हमारा मार्गदर्शन करता है- "धरती के पास हर किसी की जरूरत पूरा करने के लिए संसाधन हैं, लेकिन किसी के लालच के लिए नहीं।"
रूस-यूक्रेन युद्ध हो या मध्य पूर्व का संकट, हिंसा ने कभी स्थायी समाधान नहीं दिया। गांधीजी का अहिंसा का सिद्धांत ही वैश्विक शांति का एकमात्र विकल्प है। 'आंख के बदले आंख' का सिद्धांत पूरी दुनिया को अंधा बना देगा।
आज के बाजारवाद के दौर में, जहाँ मनुष्य केवल एक उपभोक्ता बनकर रह गया है, गांधीजी का 'अपरिग्रह' (जरूरत से ज्यादा संग्रह न करना) और 'सादा जीवन, उच्च विचार' का सिद्धांत मानसिक शांति की कुंजी है।
महात्मा गांधी कोई देवता नहीं थे, वह अपनी कमियों को स्वीकार करने वाले एक ईमानदार इंसान थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम ही 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग' रखा। वह हमें सिखाते हैं कि परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से होनी चाहिए- "वह बदलाव बनो जो तुम दुनिया में देखना चाहते हो।"
गांधी एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि एक विचार, एक संस्कृति और एक जीवन शैली का नाम है। जब तक दुनिया में अन्याय है, शोषण है और हिंसा है, तब तक गांधी की जरूरत बनी रहेगी। उनके चश्मे से देखने पर ही हमें एक समावेशी, सहिष्णु और मानवीय विश्व का रास्ता दिखाई देगा। आज हमें उनकी मूर्तियों पर माला चढ़ाने से ज्यादा, उनके विचारों को अपने आचरण में उतारने की आवश्यकता है। यही उस महामानव के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मानस कुमार कर,
कोणार्क, ओडिशा