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10 साल का प्यार... एक मैसेज ने तोड़ दिया"
⚠️ संवेदनशील कहानी - आत्महत्या का जिक्र है, सावधानी से पढ़ें
15 जनवरी 2026, ठीक दोपहर 1:30 बजे।
अस्पताल की इस सख्त खाट पर लेटे हुए पुरानी यादें आंखों के सामने नाच रही हैं। वही पुराना दर्द, वही पुरानी बातें... यही वो जख्म है जिसकी वजह से आज मैं यहाँ हूँ।
बचपन का वो वादा
यह कहानी शुरू हुई करीब 10-12 साल पहले। राजस्थान के छोटे से गांव में रहने वाले हम लोगों की परंपरा होती है - लड़के या लड़की की सगाई बचपन में ही कर देना। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मेरे जन्म के ठीक एक साल बाद मेरी सगाई हो गई।जब बड़ा होने लगा, शादी-विवाह का असली मतलब समझ आने लगा तो दिल ने एक वचन ले लिया - "बस यही लड़की होगी मेरी जिंदगी में।" ना उसका नाम ठीक से जानता था, ना कोई फोटो देखी थी। फिर भी मन ही मन उसे चाहने लगा। हर रात सोने से पहले सोचता - "मेरी होने वाली..." बस इतना ही काफी था।
शहर की तन्हाई
पढ़ाई के लिए गांव से शहर भेज दिया गया। नर्सरी से लेकर लॉकडाउन तक इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ा। छुट्टियों में गांव आता, लेकिन मन हमेशा उसी के पास अटका रहता। कोरोना आया, चौथी क्लास में था। दो साल गांव रहा। फिर सातवीं में शहर लौटा।यहाँ किसी मामा के लड़के के घर रखा गया। किसी और के घर रहना आसान नहीं होता। वहाँ उनकी पत्नी, दो छोटे बच्चे। जब मन किया, बुरा बर्ताव। कभी मारना-पीटना, कभी काम करवाना। सातवीं में 93% लाया, वो भी ऐसी परिस्थितियों में। सातवीं को छोड़कर कभी 95% से नीचे न गया।
आठवीं का वो काला दिन
आठवीं में स्कूल बदला - शहर के मशहूर इंग्लिश मीडियम स्कूल। नया स्कूल, नए बच्चे, कोई दोस्त नहीं। इस बार किसी दूसरे मामा के लड़के के घर। वहाँ भी वही कहानी - रोज़ त्रासदी।बोर्ड एग्जाम का आखिरी दिन - संस्कृत का पेपर। अकेला था घर पर, जाग न पाया। सुबह पता चला - पेपर छूट गया। 75% बने। घरवालों ने खूब सुना दिया। लेकिन जो गड़बड़ हुई, उसे मैंने अकेले ही सुलझाया। किसी ने मदद न की।
हॉस्टल के वो दिन
नौवीं में हॉस्टल। अच्छे दोस्त बने, लेकिन दिल कहीं और था। पढ़ाई से मन हटने लगा। नौवीं में 70%, दसवीं में 68%। अब घरवालों का ताना रोज़ - "पढ़ाई नहीं करते, नौकरी कैसे मिलेगी?"अगर किसी का पढ़ाई में मन न हो तो दूसरे रास्ते दिखाओ। लेकिन घरवालों ने सिर्फ़ एक ही राग अलापा - "पढ़ाई करो, नौकरी लो!" पढ़ाई से नफरत हो गई। इतना तंग आया कि भागने के ख्याल आए, खुदकुशी के ख्याल आए। लेकिन सोचता - "घरवालों का क्या होगा?"*रातों चुपके-चुपके रोता। अकेला लड़का था, सारा प्रेशर मेरा। उसी लड़की को याद करता, सोचता - "उसके पास जाकर सुकून मिलेगा।
"आखिरकार वो मौका"
ग्यारहवीं कॉमर्स (2025 में शुरू किया)। फिर आया वो दिन जिसका 10 साल इंतज़ार था। 14 दिसंबर 2025, रात 7:25 बजे - इंस्टाग्राम पर लिखा - "हाय"। जवाब आया। बात शुरू हुई।एक महीना चली बात, लेकिन धीरे-धीरे एहसास हुआ - वो उतना interest नहीं दिखा रही। घंटों फोन पर इंतज़ार। स्कूल से आते ही चेक करता। कभी हफ्ते में एक मैसेज उसके से। 10 साल का प्यार था, थोड़ी तो उम्मीद तो बनती है ना?
वो आखिरी मैसेज
14 जनवरी को पूछा - "तुम्हें बात करने में interest है या formality कर रही हो?"
जवाब आया - "नहीं।"
फिर पूछा - "तो बात करने का क्या फ़ायदा?"
कटु जवाब - "मुझे किसी से बात करने की इच्छा ही नहीं है।"बस। खत्म।
जिसके लिए 10 साल wait किया, वो इतनी आसानी से निकल गई।
अंधेरे का सफर
उस एक मैसेज ने मुझे अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया। जिसके लिए मैंने 10 साल तक बिना मिले, बिना देखे, सिर्फ मन ही मन प्यार किया, वही लड़की इतनी आसानी से, इतनी सादगी से मेरी जिंदगी से निकल गई। दिल में एक खालीपन सा छा गया, जैसे सारी दुनिया अंधेरी हो गई। सांस लेना मुश्किल लग रहा था, आंसू रुक ही नहीं रहे थे। सदमे में मैं वहीं से निकला, पास की दुकान पर गया और जहर की बोतल ले आया। हाथ कांप रहे थे, लेकिन दिमाग ने कहा – बस अब बहुत हो गया। बोतल मुंह से लगाई, सारा जहर उतार लिया।धीरे-धीरे शरीर सुन्न होने लगा। पेट में जलन, सांस फूलने लगी, चक्कर आने लगे। मैं फर्श पर गिर पड़ा, कमरे में अकेला। घंटों पड़ा रहा, किसी को कुछ पता न चला। तड़पता रहा, लेकिन आवाज न निकली। तभी बचपन का वो खास दोस्त – जो मेरे साथ हर दुख-सुख में रहा – अचानक कमरे पर आया। मुझे ऐसी हालत में देखा, उसका चेहरा सफेद पड़ गया। बिना वक्त गंवाए मुझे गोद में उठाया, ऑटो रोका और सीधा शहर के अस्पताल पहुंचाया। डॉक्टरों ने तुरंत स्टमक वॉश किया, इंजेक्शन चढ़ाए, ICU में डाला। कई घंटे जिंदगी-मौत के बीच झूलता रहा। मेरे दोस्त ने मम्मी-पापा को फोन किया, रातभर मेरे पास बैठा रहा। कम वक्त में चमत्कार हुआ – मैं बच गया। लेकिन वो घाव आज भी ताजा है। काश वो मैसेज न आया होता…