भाग 1: वह लड़की जिसे कभी किसी से प्यार नहीं हुआ था। ना कोई चाहत ना कोई सपना। उसके जीवन में बस माता-पिता का विश्वास था। और एक नाम जिससे उसका विवाह होने वाला था। पहली बार जब उसने उससे बात की तो शब्द सामान्य थे, पर अर्थ बहुत कठोर। उसने कहा"में तुम्हें सुख दूगा इज्जत सम्मान सब कुछ मिलेगा। पर प्यार नहीं। एक ऐसी लड़की जिसकी स्मृति अभी भी जिंदा थी। और एक ऐसा रिश्ता। जिसमें केवल जिम्मेदारी थी। मोहब्बत नहीं। उस रात घड़ी कि सूइयां चलती रही। रात 10:00 बजे से लेकर सुबह 6:00 बजे तक। उसका शरीर जागता रहा। और उसका दिल टूटता रहा। उसके मन में एक ही विचार बार-बार उभरता रहा।"मुझे हमेशा तीसरे इंसान से नफरत थी । आज मैं खुद तीसरी बना द गई। सुबह हुई पर उसके जीवन में उजाला नहीं आया। उसने खाना त्याग दिया था। पानी तक पीना कठिन लगने लगा। आईने में उसने खुद को देखा। एक ऐसी लड़की जिसकी आंखों में अब कोई सपना नहीं था। सिर्फ पीड़ा और कष्ट था। क्या सामान के बिना प्रेम का पर्याप्त है? और क्या बिना प्रेम का विवाह जीवन बन सकता है। बीमारी अब केवल शरीर की नहीं रही थी। मन भी थक चुका था।, और दिल... दिल तो बहुत पहले ही हार चुका था। मैं अक्सर चुप रहती थी। खाना भूल जाती थी। हंसना तो जैसे याद ही नहीं रहा। मेरी मासी ने सब समझ लिया था। उन्होंने एक दिन कहा _ "मेरे घर आ जा... घर पर रहकर तू और टूट जाएगी। मैं भाग गई। अपनी ही जीवन से भाग कर मासी के घर चली गई। उस दिन मैंने उनसे एक बात कहीं- जो आज भी मेरे भीतर गूंजती है।"जिस तरह मेरा रिश्ता करवाया गया है ना ऐसा किसी और के साथ मत होने देना "मासी चुप हो गई। शायद इसलिए कि उन्हें सब पहले से पता था। वह लड़की कश्मीरी थी। उसका नाम जोया था। वो आज भी उसे चाहता था। हर बात में उसका जिक्र था। हर सांस में उसकी याद थी। वो कहता था "इंसान खुद ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन होता है"और शायद वह सच कहता था। क्योंकि वह जानता था कि उसका प्यार किसी और के हिस्से का था, फिर भी उसने मेरे जीवन बांध दिया। जब मैं उसकी बातें सुनती थी। तो कभी उस पर तरस आता था, और कभी खुद पर। उस पर इसलिए वह अपने प्रेम को कभी पा न सका। और खुद पर इसलिए क्योंकि मेरे नसीब में प्रेम कभी लिखा ही नहीं था। मैं कभी तीसरी नहीं बनना चाहती थीं, पर बना दी गई। मुझे किसी से नफरत नहीं थी। ना उससे न जोया से। नफरत बस उस सच्चाई से थी। जो देर से बताइए गई। एपिसोड यहीं समाप्त होता है। यहां मैं बीमार थी। टूटी थी ।कांच कि तरह। पर पहली बार यह समझने लगी थी। की प्रेम मांग कर नहीं मिलता। और बिना प्रेम के कोई रिश्ता जीवन नहीं बन सकता। बीमार में शरीर से नहीं थी,रूह को ज़हर मिल गया था। वह पहले से से किसी और का