शरीर पर लगे घाव तो भरने के लिए ही होते हैं,
किंतु मन पर लगे घाव शरीर को भीतर से खोखला कर देते हैं।
यही कारण है कि मन के घाव, सतही घावों को भरने नहीं देते।
खोखला शरीर, शिथिल मन और दर्द से कराहती हृदय-भित्तियाँ–
इन्हीं के साथ एक दिन व्यक्ति चुपचाप दम तोड़ देता है।
यह कहानी है हम सबके बीच स्थित नव्या की।
बीते वर्ष से उसने ही अपने घर की बागडोर संभाल रखी है।
पैरो तले मातृत्व के जमीन का खिसक जाना,शांति और सुकून से भरे आलिंगन का इस विपत्त भरे समय में छिन जाना...आसान कहां है किसी व्यक्ति के लिए।
पर हृदय की पीर और नयनों के नीर को घूंट घूंट कर के पीती रही नव्या..हां थोड़ी परेशानियां आई भी..कई बार स्थितियां हाथों से फिसल खौलते दूध की तरह उसके पांवों पर गिर जाया करते ।
समय पर काम न हो पाने और उसके परिणामस्वरूप मिलने वाली डाँट-मार..
इन दोनों ग़मों को भुलाकर
गृहस्थी में खुद को उलझा ही देती है।
अंततः उसने सब संभाल लिया पर नहीं संभाल पाई , तो अपने नर्म बाहों से निकले उस सुकुंदायक लम्हों को जिसकी स्मृतियां उसके सिर माथे पे अक्सर नाचती रहती है।
पिछले कई दिनों से उसे भीतर से बुखार है।
शरीर कभी तपता है, कभी अचानक ठंडा पड़ जाता है।
दिन में नींद बहुत आती है,रातों की नींद आंखों से उस चुकी हैं, और बेचैनियाँ फिर से सिर उठाने लगी हैं।
आराम के वक्त बदन का दर्द जैसे हर रोज़ उसे याद दिलाता है—वह थक चुकी है।
और इसमें भी शिमला की ठंड..रोज नहा लेती है पगली , मना करो तो कहती है
"दीदी पूजा करना है न ,
बड़ी हो गई हूं न.!!"
"बड़ी ही नहीं तुम बुजुर्ग हो गई हो–
ब्याह के नाम पर कहती हो,
क्यों किसी लड़के के जीवन बर्बाद होने का पाप लूं..।"
मेरी बाते सुनकर,
कुछ कहती नहीं–
बस टूटे मन और किसी पुराने तालाब सी गहरी आंखों को झुका बस मुस्कुरा देती है।
"जाने कब तक ऐस जिएगी ऐसे कैसे पार लगेगी इसकी दुनिया" ।
वैसे एक्सीडेंट वाली शाम तुम सब्जी मार्केट क्यों गई थी..?
"कौन मै..?" नव्या ने पूछा।
"हां,वो तो शुक्र करो तुमको लगी नहीं बस गिर के बच गई वर्ना पता नहीं क्या होता.."
हंसना जैसे नव्या के आदतों में है..हर बात पर हल्का हंस देती है।
वो हल्की मुस्कुराहट और दिखावटी हंसी के साथ कहती है "कुछ खास नहीं,बस पापा का दहेज बच जाता ,घर से क्लेश खत्म हो जाता और कुछ लोग है जो हो चुके है परेशान मेरी आदतों से उनकी परेशानियां मिट जाती..कुल मिला के जो होता वो अच्छा ही होता..।"
नव्या इन सारी गहरी बातों को इतनी सहजता से कह जाती की खबर ही नहीं होता–कब शुरू हुई और कब खत्म।
उसकी नज़रे जैसे चिढ़ाती सी लगती तो कभी मेरे मन को रिझा लेती ।
मै एक गहरी सांस ले ही पाई थी कि उसके उसके गर्दन पर पड़े निशान पर मेरी नजर टिक गई ।
स्मृतियाँ जैसे अचानक जाग उठीं—
“ओह… याद आया।”
नव्या.."क्या याद आया दी..?"
“यही कि उस शाम, जब तुम अपने घुटने देख रही थीं—वहाँ भी चोट के निशान पहले से थे।
और अब ये… गर्दन पर।”
वह दंश-भरी मुस्कान को भीतर समेटते हुए बोली—
“ये कोई निशान नहीं हैं, दी।
अपनों के दिए प्यार… आशीर्वाद हैं।”
“तुम प्रतिकार क्यों नहीं करती?” मैंने पूछा।
उसने शांत स्वर में कहा—
“उसी का तो नतीजा है।”
गृहस्थी संभाल रही स्त्रियों को अक्सर पागल बनकर जीना पड़ता है।
उसकी आँखें भर आईं, पर जितनी जल्दी नम हुईं—
उससे कहीं तेज़ उसने उन्हें पी भी लिया।
नज़रें फेरते हुए, मजबूत स्वर में वह बोली—
“जब एक स्त्री नई गृहस्थी में आती है,
तो उसे लगता है वह सब सुधार देगी–सदस्यों की उन बुरी आदतों को जिनसे अक्सर स्त्रियों का काम बढ़ जाया करता है।
पर समय सिखा देता है—
बोलने से बेहतर है चुप रहना।
" स्त्रियाँ इस समाज की वो कठपुतली हैं,
जिनकी आँखों पर पट्टी इसलिए बाँधी जाती है
ताकि वे दूसरों की ग़लतियाँ और कमियां न देख सकें। "
" मुँह पर पट्टी इसलिए—
ताकि वे उन ग़लतियों को , बुरी आदतों को चुपचाप स्वीकार लें।
और हाथों पर पट्टी—
रिश्तों की मर्यादा,लोगों के सम्मान, अपनों के प्रति अपनत्व और मोह उनसे कुछ करने की शक्ति छीन लेता है।
चूंकि देख कर बोलना, मानव के लिए स्वाभाविक है पर स्त्रियों के लिए सदैव घातक ही साबित हुआ है।
उस क्षण वह मुझे किसी बहुत बूढ़ी स्त्री जैसी लगी—
जिसने जीवन से शिकायत करना भी छोड़ दिया हो।
जो आधी बातें कहती है
और आधी अपने भीतर ही खा जाती है,
फिर भी एक हल्की मुस्कान से सामने वाले का दिल जीत लेती है।
किन्तु नव्या का सच तो यही है कि पुरुषों में छिपा दंभ उसकी स्त्री शक्ति को नष्ट कर देता है।
मै अच्छे से रिलेट कर पा रही थी उस सुबह की शोर से जब उसके द्वारा साफ सफाई को लेके हुए बहस में उसके पिता उसे बार बार बोल रहे थे "तें कुछ मत बोल,तू पागल हो जो,तू मान ले तोरा में बुद्धि नइखे आंख मूंद के रह, हमार जैसे मन करी औसहि करम, तुँहे जादे पंडित भईल बाड़े..,आदितियादी..।
और नव्या ने बोल दिया था " मम्मी थी तो सब चलता था और मुझे बोल रहे हो पागल हो जाऊ..,"
बस इतने ही से तो बात और बढ़ गई थी,
और शायद ये चोट भी उसी रोज के होंगे जब उसके भाई द्वारा ये कहा जा रहा होगा कि "आज तुझे मार ही दूंगा...।"
मै ये सब सोच ही रही थी कि नव्या फिर बोल पड़ी "आप लोगों को दिख कैसे जाते है, मुझे तो मेरे शरीर के निशान भी औरों से पता चलते है"
इतना सुनते ही मेरी हंसी निकल पड़ी.. औरों से मतलब..? और देखता कौन कौन है तुम्हारे शरीर के निशान..(मुझे लगा थोड़ा चिढ़ाया जाए।)
किन्तु अब नव्या पहली जैसी रही ही नहीं अब चिढ़ती नहीं, उलझती नहीं,बल्कि बेहद शांत हो गई है..।
वह अब जवाब नहीं देती..सिर्फ सुनती रहती है।
रस्सियों पर सूखते कपड़े,कपड़े न होकर थे उसके टूटे मन...और..अधूरी ख्वाहिशें।
उसके घरवाले उससे प्रेम तो करते है,पर उसके भीतर जो मोह था वह शायद अब टूट चुका है।वह अब प्रेम से ऊपर उठ चुकी है। इस मोह भरे जंजाल को समझ जाना अपने आप में बहुत बड़ी परिपक्वता है 22-24वर्षीय नव्या 65 वर्षीय बुढ़ियों जैसी बातें करने लगी है...। वाकई समय बहुत कुछ सिखा देता है।
भला ऐसा भी होता है क्या की अपनी पसंद की सब्जी लाने के लिए वो स्वयं मार्केट जाए.. और सबकी पसंद के लिए सब्जी अलग से बनाए...ऐसा नहीं है कि वह अपने पिता से अपनी पसंद बोले और वह लेकर न आए पर.. अब वह डरती है किसी से कुछ कहने से यहां तक कि अपनी राय अपनी पसंद तक बोलने से–
क्योंकि वो जानती है "कब कौन सी बात क्लेश की वजह बन जाए,उसको कुछ खबर नहीं..की क्लेश कर के लाया जाएगा या आसानी से..।
उसे बस इतना नहीं पता कि वह क्लेश शब्दों का होगा
या फिर हाथों का।
इस लिए यदि अपना शरीर बचाना है तो चुप ही रहना पड़ेगा, वरना मार खानी पड़ेगी और उसे बचाने वाला शायद अब इस संसार में कोई नहीं..कोई नहीं...।
शायद बिन मां की बेटियां घूरे पर उगे उस पौधे की तरह होती हैं जिस पर घर दुआर की सारी गंदगी हो गंदी आदतों की तरह बेधड़क फेंक दी जाती है।
जिस पर फेंके गए हो घर के पुराने कपड़े पुराने दंश बन कर हर रोज़ चुभते है,
और चूल्हे की राख में छुपी आग
हर रोज़ उसके तने को झुलसाती रहती है।
फिर भी–वह पौधा जिजीविषा कभी कभी खिल उठता है
और खिलता ही रहता है,
तब तक जब तक उसे किसी माली की निगरानी में
हरे-भरे बगीचे की छाँव न मिल जाए,
या फिर उसे जड़ से उखाड़कर कहीं फेंक न दिया जाए।
पर उसका भविष्य उसके गुणों से नहीं,
बल्कि उसे रोपने वाली ज़मीन की नीयत से तय होता है।
और यह सब अब समय के हाथों में है
कि बिन-माँ की बेटियाँ, किसी बगीचे की नई शोभा बढ़ाएगी
या हमेशा के लिए, घूरे पर ही छोड़ दी जाएँगी,
यथासंभव यह भी हो सकता है कि वह जड़ से उखाड़ फेंक दी जाएँगी।