Invisible Labor: Why Housework Is Still Not Considered Real Work in Hindi Women Focused by kajal books and stories PDF | अदृश्य श्रम: घर के काम को काम क्यों नहीं माना जाता?

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अदृश्य श्रम: घर के काम को काम क्यों नहीं माना जाता?

सुबह की शुरुआत अक्सर दूसरों के लिए होती है।
अलार्म से पहले जागना, सबके उठने से पहले चाय रखना, बच्चों के स्कूल की तैयारी, घर के कामों की सूची मन ही मन बनाना — यह सब बिना किसी शोर के होता है।
घर के बाकी लोग दिन की शुरुआत करते हैं,
और एक महिला का दिन शुरू हो चुका होता है।
यह काम दिखता नहीं,
लेकिन दिनभर चलता रहता है।
इसी को कहा जाता है — अदृश्य श्रम।
अदृश्य श्रम क्या होता है?
अदृश्य श्रम वह काम है जो किया तो जाता है,
लेकिन उसे “काम” की श्रेणी में नहीं रखा जाता।
यह केवल झाड़ू-पोंछा या खाना बनाना नहीं है।
यह वह मानसिक, भावनात्मक और योजनात्मक काम है
जो लगातार चलता रहता है।
जैसे —
घर में क्या खत्म होने वाला है, यह पहले से जानना
बच्चों की ज़रूरतें समझना
परिवार के मूड और भावनाओं को संभालना
रिश्तों में संतुलन बनाए रखना
सबकी सुविधा का ध्यान रखना, अपनी नहीं
यह सब बिना समय तय किए,
बिना छुट्टी लिए,
और बिना वेतन के होता है।
रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अदृश्य श्रम
दिनभर के छोटे-छोटे उदाहरण देखें।
अगर खाना अच्छा बन जाए —
तो कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं।
अगर किसी दिन देर हो जाए —
तो सवाल उठते हैं।
घर साफ़ है —
तो यह सामान्य बात है।
अगर घर थोड़ा अस्त-व्यस्त हो —
तो तुरंत नोटिस किया जाता है।
किसी को बीमार पड़ना हो,
किसी मेहमान का आना हो,
किसी त्योहार की तैयारी हो —
सारी planning एक ही व्यक्ति के दिमाग़ में चलती रहती है।
और यही लगातार सोचने वाला काम
सबसे ज़्यादा थकाने वाला होता है।
घर का काम ‘काम’ क्यों नहीं माना जाता?
इसके पीछे कई सामाजिक कारण हैं।
पहला —
घर का काम पीढ़ियों से महिलाओं से अपेक्षित रहा है।
इसलिए इसे “स्वाभाविक कर्तव्य” मान लिया गया।
दूसरा —
इसके बदले पैसे नहीं मिलते।
और समाज में अक्सर वही काम महत्वपूर्ण माना जाता है
जिसका आर्थिक मूल्य हो।
तीसरा —
यह काम दिखाई नहीं देता।
जब सब कुछ ठीक चलता है,
तो लगता है जैसे कुछ किया ही नहीं गया।
लेकिन सच यह है कि
सब कुछ ठीक चल रहा है,
क्योंकि कोई लगातार उसे संभाल रहा है।
मानसिक और भावनात्मक थकान
अदृश्य श्रम का सबसे गहरा असर
शरीर से ज़्यादा मन पर पड़ता है।
लगातार —
सोचना
याद रखना
योजना बनाना
सबको खुश रखने की कोशिश करना
धीरे-धीरे व्यक्ति अंदर से खाली होने लगता है।
वह थका होता है,
लेकिन कह नहीं पाता।
क्योंकि समाज ने उसे सिखाया है — “शिकायत करना अच्छी बात नहीं।”
“सब संभालना ही तो है।”
यही चुप्पी
सबसे भारी बोझ बन जाती है।
विवाह के बाद पहचान का संकट
विवाह के बाद महिला की पहचान
अक्सर उसकी भूमिकाओं में सिमट जाती है।
पत्नी, बहू, माँ —
लेकिन “वह खुद कौन है”
यह सवाल पीछे छूट जाता है।
उसकी पढ़ाई, उसकी इच्छाएँ,
उसके सपने धीरे-धीरे
“बाद में देखेंगे” की सूची में चले जाते हैं।
घर संभालना उसकी ज़िम्मेदारी बन जाती है,
लेकिन यह नहीं पूछा जाता कि
क्या वह खुद संभाली जा रही है?
दोहरी अपेक्षाओं का दबाव
आज की महिला से कहा जाता है — आधुनिक भी बनो
और पारंपरिक भी।
काम भी करो,
घर भी पूरी तरह संभालो।
थको मत,
शिकायत मत करो।
हर भूमिका में परिपूर्ण रहो।
यह दोहरी अपेक्षा
महिला को लगातार अपराधबोध में रखती है —
अगर घर पर ध्यान दे तो करियर छूट रहा है,
और अगर अपने लिए कुछ करे
तो उसे स्वार्थी कहा जाता है।
रिश्तों पर इसका असर
जब किसी का श्रम अनदेखा किया जाता है,
तो रिश्तों में धीरे-धीरे दूरी आने लगती है।
चिड़चिड़ापन बढ़ता है
संवाद कम होता है
भावनात्मक थकान बढ़ती है
कई बार यह दूरी शब्दों में नहीं,
चुप्पी में दिखाई देती है।
और बच्चे भी यही सीखते हैं कि
कुछ लोगों का काम गिना जाता है,
और कुछ लोगों का काम अपने आप हो जाता है।
पति और परिवार की भूमिका
स्वस्थ परिवार का अर्थ
सिर्फ़ आर्थिक सुरक्षा नहीं होता।
पति की भूमिका
केवल कमाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
जब वह —
घर के काम में हाथ बँटाता है
पत्नी की थकान को समझता है
उसकी इच्छाओं को महत्व देता है
तो घर बोझ नहीं,
साझा जिम्मेदारी बन जाता है।
महिला की प्रगति
पूरे परिवार की प्रगति होती है।
बदलाव की शुरुआत कहाँ से हो सकती है?
बदलाव किसी एक दिन में नहीं आता।
यह शुरू होता है —
घर के काम को काम मानने से
“धन्यवाद” कहने से
ज़िम्मेदारियाँ बाँटने से
आदेश नहीं, संवाद करने से
जब अदृश्य श्रम को पहचान मिलती है,
तो घर का माहौल बदलने लगता है।
निष्कर्ष
अदृश्य श्रम कोई छोटी बात नहीं है।
यह वह नींव है
जिस पर पूरा घर टिका होता है।
जब इस श्रम को देखा जाता है,
सम्मान दिया जाता है
और साझा किया जाता है —
तभी परिवार सच में सशक्त बनता है।
क्योंकि
जो काम दिखाई नहीं देता,
अक्सर वही सबसे ज़्यादा थकाता है।
और
जिस दिन यह श्रम दिखने लगेगा,
उस दिन घर और समाज —
दोनों ज़्यादा संवेदनशील बनेंगे।