सुबह की हल्की ठंड थी। खिड़की से आती धूप कमरे की दीवारों पर बिखर रही थी। बाहर गली में लोगों की आवाज़ें थीं, बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन रिया के कमरे में अजीब-सी ख़ामोशी पसरी हुई थी। वह बिस्तर पर बैठी छत को देख रही थी, जैसे वहाँ कोई जवाब लिखा हो, जो वह पढ़ नहीं पा रही थी।
रिया धीरे-धीरे उठी। रोज़ की तरह आज भी उसका मन भारी था। इस घर में रहते हुए उसे कभी यह एहसास नहीं हुआ कि कोई उसे सच में समझता है। माँ हर समय काम में व्यस्त रहती थीं, पापा अपनी ज़िम्मेदारियों में और छोटा भाई अपनी दुनिया में। रिया सबके बीच होते हुए भी अकेली थी।
वह बाथरूम में गई और आईने के सामने खड़ी हो गई। आईने में दिखता चेहरा शांत लग रहा था, लेकिन आँखों के नीचे जमा हुआ थकान का साया उसकी सच्चाई बता रहा था। यह मुस्कान उसने सालों पहले सीख ली थी—ऐसी मुस्कान जो दर्द को छुपा ले। उसे ठीक से याद भी नहीं था कि आख़िरी बार उसने कब बिना किसी डर के हँसा था।
नहाने के बाद वह अपने कमरे में लौटी। अलमारी खोलकर उसने पुरानी किताबें निकालनी शुरू कीं। ये किताबें उसके कॉलेज के दिनों की थीं, जब वह सपने देखती थी—अपने लिए, अपनी ज़िंदगी के लिए। किताबों को हटाते ही अचानक एक लिफ़ाफ़ा नीचे गिर पड़ा।
रिया चौंक गई।
यह लिफ़ाफ़ा उसने पहले कभी नहीं देखा था। वह झुकी और उसे उठाया। साधारण-सा सफ़ेद लिफ़ाफ़ा, लेकिन उस पर लिखा नाम उसकी सांसें रोक देने के लिए काफ़ी था।
“रिया के नाम”
उसके हाथ काँपने लगे। दिल तेज़-तेज़ धड़कने लगा। उसने लिफ़ाफ़े को कई बार पलटा, लेकिन कहीं भेजने वाले का नाम नहीं था। यह चिट्ठी किसकी हो सकती है? और अब तक उससे छुपाकर क्यों रखी गई?
वह पलंग पर बैठ गई। लिफ़ाफ़े को हाथ में लेकर वह दुविधा में थी। मन कह रहा था अभी खोल ले, लेकिन डर भी लग रहा था। कहीं इसके अंदर ऐसा सच न लिखा हो, जो उसकी अब तक की ज़िंदगी को झकझोर दे।
उसकी आँखों के सामने उसका बचपन घूम गया।
जब वह छोटी थी, तब भी कोई उसकी बात नहीं सुनता था। रोती तो कहा जाता, “इतना मत रोया करो, अच्छी लड़कियाँ मजबूत होती हैं।” जब किसी बात पर सवाल पूछती, तो जवाब मिलता, “ज़्यादा सोचने की आदत ठीक नहीं।” धीरे-धीरे रिया ने बोलना कम कर दिया। उसने अपने जज़्बातों को दिल में दबाना सीख लिया।
वह पढ़ाई में अच्छी थी, ज़िम्मेदार थी, हर किसी का ख्याल रखती थी। लेकिन कभी किसी ने यह नहीं पूछा कि वह खुद क्या चाहती है। उसकी इच्छाएँ, उसके सपने—सब कहीं पीछे छूटते चले गए।
लिफ़ाफ़ा उसकी हथेली में अजीब-सी गर्माहट पैदा कर रहा था। जैसे उसमें कोई ज़िंदा एहसास क़ैद हो। वह जानती थी कि इस चिट्ठी के अंदर कुछ ऐसा है, जो उससे अब तक छुपाया गया है।
तभी बाहर से माँ की आवाज़ आई,
“रिया, नाश्ता ठंडा हो रहा है। रोज़ की तरह देर मत करो।”
रिया जैसे नींद से जागी। उसने लिफ़ाफ़े को जल्दी से अलमारी में छुपा दिया। चेहरे पर वही पुरानी बनावटी मुस्कान लाई और कमरे से बाहर निकल गई।
नाश्ते की मेज़ पर सब बैठे थे। बातें रोज़ की तरह चल रही थीं, लेकिन रिया का मन कहीं और था। उसकी नज़र बार-बार अपने कमरे की तरफ़ जा रही थी, जहाँ वह चिट्ठी छुपी हुई थी।
उसे एहसास हो रहा था कि यह साधारण काग़ज़ का टुकड़ा नहीं है। यह उसकी ज़िंदगी से जुड़ा कोई ऐसा सच है, जिसे जानना अब टाला नहीं जा सकता।
वह जानती थी—आज नहीं तो कल, उसे वह चिट्ठी खोलनी ही पड़ेगी।
और जब वह सच सामने आएगा,
तो शायद रिया की दुनिया हमेशा के लिए बदल जाएगी।
(जारी रहेगा…)