REBIRTH OF MEHBUBA - 2 in Hindi Love Stories by fate witch books and stories PDF | REBIRTH OF MEHBUBA - 2

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REBIRTH OF MEHBUBA - 2

रूप और निया घर के क़रीब ही पहुँची थी बारिश अब भी बिना थमे बरस रही थी।
तभी सामने से एक लड़का  दौड़ता हुआ आता दिखाई देता है।
उसकके एक हाथ में बैग था,  और बदन पर सफ़ेद शर्ट—
जो बारिश में भीगकर उसके जिस्म से चिपक चुकी थी, लगभग पारदर्शी…

अचानक—  वो लड़का सीधे रूप से टकरा जाता है।

बारिश की वजह से सड़क पहले ही फिसलन भरी थी इसलिए दोनों ज़मीन पर गिर पड़ते हैं।

रूप (झुँझलाकर):  “ये दिखायी नहीं देता क्या?   रोड है ये… मैराथन नहीं!”

लड़का जल्दी से उठता है, अपना बैग संभालते हुए अपना एक हाथ  रूप की तरफ़ बढ़ाता है।
लेकिन रूप खुद उठने की कोशिश करती है— और फिर से फिसल जाती है।

लड़का उसे सँभालने बढ़ता है,  पर इससे पहले कि संतुलन बन पाता दोनों फिर से गिर जाते हैं।

इस बार— वो लड़का नीचे और रूप उसके ऊपर थी

एक पल के लिए मानो  सब कुछ थम-सा जाता है

रूप उस लडके की आंखो में ऐसे खो जाती है जैसे वो इस लडके को बरसों से जानती हो

तभी निया की आवाज़ गूँजती है—  “रूप!” क्‍या तुम ठीक हो

रूप होश में आती हैझट से उठकर खड़ी होती है अपने कपड़े ठीक करती है
और ग़ुस्से से बोलती है—

“इंसान हो या केले का छिलका? इतना फिसलते कैसे हो!
ख़ुद गिरे और मुझे भी गिरा दिया।  चलना आता है या नहीं?”

लड़का :
एक्‍सयुज मी मैं तो आपकी हेल्‍प कर रहा था आप ही थी जो खुद भी गिरी और

 साथ में मुझे भी गिरा दिया और रही बात आपसे टकराने की तो  “सॉरी’’।
मैं जल्दी में था, इसीलिए—
लेकिन मैं सामने देखकर ही चल रहा था, आप ही अचानक—”

रूप (बीच में काटते हुए):   “अचानक?!  इतना झूठ कैसे बोल लेते हो हां ?
तुम ही उड़ते हुए आए थे और मुझसे टकरा गए।”

उसी पल बारिश और तेज़ हो जाती है लड़का हाथ से अपने भीगे बाल झाड़ता है
और हल्की मुस्कान के साथ कहता है—

“मैडम,  मैं उड़ नहीं रहा था… आप ही बीच सड़क पर कूद-फाँद कर रही थीं।”

रूप का गुस्सा भड़क उठता है, लेकिन कुछ कहने से पहले ही
पास से एक ऑटोवाला चिल्लाता हुआ निकल जाता है—

“अरे भाई!  रोड चलने के लिए है,  यहाँ रोमांस शुरू मत करो!”

रूप का पारा और चढ़ जाता है। वो ग़ुस्से में अपनी चप्पल निकालकर
ऑटोवाले की तरफ़ दिखाते हुए चिल्लाती है—

“ये दिख रही है? यही मारूँगी— भाग यहाँ से!”

लड़का उसे देखकर  हल्की-सी मुस्कान दबा लेता है  और आगे बढ़ने लगता है।

रूप जल्दी से चप्पल पहनती है और उसे रोकने ही वाली होती है
कि निया उसका हाथ पकड़कर खींच लेती है—

“चल ना! लेट हो रहे हैं।  जब देखो, लड़ाई ही करती रहती है!”

रूप उसकी बात मान लेती है, लेकिन जाते-जाते पलटकर कहती है—

“तुम्हें तो मैं बाद में देख लूँगी!” इतना कह कर वो दोनों वहाँ से चली जाती हैं।

पीछे—
लड़का अपने गीले बालों को  हाथ से पीछे करता है और  होंठों पर एक हल्की-सी smirk के साथ
बारिश में खोता हुआ आगे बढ़ जाता है।

रूप और निया जैसे ही घर पहुँचती हैं,

नानी तो मानो वहीं उनका इंतज़ार कर रही हों नानी जी सोफ़े से झट से उठती हैं
और तेज़ क़दमों से रूप की तरफ़ बढ़ती हैं।
उनकी नज़र जैसे ही रूप पर पड़ती है उनके चेहरे की मुस्कान फिक्र में बदल जाती है।

नानी (घबराकर):
“अरे… ये क्या हुआ, मेरी बच्ची?  कपड़े इतने गंदे कैसे हो गए?
और ये कैसी हालत बना रखी है तूने?”

इतने में निया बीच में उछलकर बोल पड़ती है—

निया:
“अरे नानी, एक लड़के से टक्कर हो गई थी।
पूरा पागल था… और ऊपर से पता है,  सॉरी तक बोलकर नहीं गया!”

निया की बात सुनते ही  रूप उसकी तरफ़ पलटती है—  रूप (तेज़ आवाज़ में):
“ऐ! तू चुप रह।  तेरी वजह से ही हुआ सब! मैं तो उसे मज़ा चखाने वाली थी,
तूने ही मुझे रोका है नहीं तो चप्पल पड़ती उसे!”

नानी दोनों को टोकते हुए,
रूप के सिर पर प्यार से हाथ रखती हैं—  “बस-बस… अब तुम दोनों मत लड़ो।
देखो तो सही,
मेरी फूल-सी बच्ची का क्या हाल कर दिया उस लड़के ने।”

फिर निया की तरफ़ देखते हुए—

“निया, इसे इसके कमरे में ले जा। अगर निरजा या बृजराज ने
इसे इस हालत में देख लिया ना, तो नई परेशानी खड़ी हो जाएगी।

जल्दी… जल्दी ले जाओ।”

निया सिर हिलाती है,
और दोनों अपनी-अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ जाती हैं।


रूप अपने कमरे में पहुँचते ही सीधे बाथरूम में चली जाती है।

कुछ देर बाद  गीले बालों के साथ बाहर आती है कमरे में हल्की रोशनी है।
बारिश की आवाज़ अब भी दूर कहीं सुनाई दे रही है।

रूप धीरे से
ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठ जाती है।

आईने में अपने चेहरे को काफ़ी देर तक देखती रहती है फिर अपने ही चेहरे को छूकर
बहुत धीमी आवाज़ में कहती है—

“क्या… मैं उसे पसंद आऊँगी?” “और क्या वो… मुझे पहचान पाएगा?”

आईने में उसका अक्स उसे घूरता रहता है।

तभी—  आईने में दिखता वही अक्स  अचानक मुस्कुराता है।

और पहली बार… वो बोलता है—

“ आखिर कौन वो बेवकूफ होगा जो तुम्‍हें पसंद नहीं करेगा रूप…

अब इंतजार है वक्‍त का, देखते है क्‍या खेल खेलता है

तब तक के लिए सब्र रखो मेरी जान ”

रूप की साँसें थम-सी जाती हैं वह अपने आस-पास देखती है

और दुबारा से आईने के तरफ देखती है आईना अब भी वही था—
लेकिन उसमें दिखता चेहरा  अब मुस्‍कुरा नहीं रहा था

 

 


रूप तैयार होकर   बालकनी में आ जाती है वह बालकनी से चारों ओर देखती और
वहाँ रखी कुर्सी खींचकर बैठती है  और अपनी किताबें खोल लेती है।

हवा में अब भी   बारिश के बाद की हल्की ठंडक घुली हुई थी।
पन्ने पलटते-पलटते   रूप पढ़ाई में इतनी डूब जाती है  कि उसे एहसास ही नहीं होता
कब शाम उतर आई।

आसमान का रंग  धीरे-धीरे बदल चुका था।

अचानक रूप चौंकती है घड़ी की तरफ़ देखती है,  फिर उठकर अपने कमरे में आती है
और फोन उठा लेती है।

स्क्रीन ऑन होते ही  एक नाम चमक उठता है—  राधिका।

मैसेज पढ़ते ही  जैसे उसकी खुशी को पंख लग जाते हैं।

उसकी आँखों में चमक फैल जाती है वो फोन को कसकर  अपने सीने से लगा लेती है
और बिस्तर पर पीठ के बल लेट जाती है।

वो अपनी धीमी  आवाज़ में कहती है “वो आ रहा है…  वो सच में आ रहा है…”

अगले ही पल  उसकी आँखें फैल जाती हैं।

“अरे!  मैं क्या पहनूँगी आज रात?”

वो झट से उठती है  और अलमारी की तरफ़ देखती है।

“हम्म…
यार, कुछ भी पहनने को नहीं है मेरे पास का”

तभी पीछे से   एक प्‍यारी औरभरी आवाज़ आती है—

“किसने कहा हमारी कोहिनूर के पास  पहनने को कुछ नहीं है?”

रूप पलटती है।

दरवाज़े पर दादीजी खड़ी थीं—  हाथ में कपड़ों का पैकेट,
चेहरे पर वही सुकून भरी मुस्कान।

“देखो…”  वो प्यार से कहती हैं,  “हम तुम्हारे लिए कपड़े लाए हैं।
शायद पसंद आ जाएँ।”

रूप झट से आगे बढ़ती है—

“दादी!  आप भी ना…  आप कुछ लाएँ और हमें पसंद न आए—
ऐसा हो सकता है क्या?”

वो पैकेट संभालते हुए कहती है—

“आप यहाँ बैठिए।  थक गई होंगी ना?  इतनी बड़ी पार्टी…
ऊपर से माँ को भी संभालना पड़ रहा होगा।”

फिर थोड़ी झिझक के साथ—

“सॉरी दादी… हमें बाहर नहीं जाना चाहिए था। हमें आपकी मदद करनी चाहिए थी।”

दादी हल्के से हँसती हैं और प्यार से रूप के गाल थपथपा देती हैं—

“मेरी कोहिनूर, उदास अच्छी नहीं लगती।”

फिर मुस्कुराकर कहती हैं— “और किसने कहा हम थक गए?
अरे, हम तो अभी इतने जवान हैं कि तुम्हारी जैसी कई लड़कियों को पीछे छोड़ दें!”

रूप हँस पड़ती है। दादी आगे कहती हैं— “चलो, जल्दी तैयार हो जाओ।
और हाँ— काजल लगाना मत भूलना।”

थोड़ा रुककर, “क्योंकि तुम्हें पता है ना कि—” रूप बीच में ही बोल पड़ती है—

“अरे हाँ-हाँ दादी, हमें नज़र लग जाती है। फिर आप परेशान हो जाती हैं
और पूरा घर सिर पर उठा लेती हैं।”

दादी हँसते हुए— “हट पगली। जल्दी तैयार हो जा।
थोड़ी देर में निया को भेज देंगे,  वो तेरी मदद कर देगी।”

इतना कहकर  दादी कमरे से बाहर चली जाती हैं।

रूप कुछ पल वहीं खड़ी रहती है— फिर हल्की मुस्कान के साथ
अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लेती है।