(यहाँ डेविल काले पत्थर के साथ कुछ छेड़छाड़ कर रहा होता है।
वह अपने खंजर से निकलने वाली ऊर्जा से काले पत्थर को गोलाकार बना देता है।)
डेविल: अब आएगा मज़ा!
शागिर्द, ज़रा इसे पिंजरे से बाहर निकालो।
शागिर्द: जी, अभी निकालता हूँ।
(शागिर्द अमर को जादुई बॉक्स से बाहर निकालता है।
अमर में इतनी ताकत नहीं बची कि वो ठीक से खड़ा हो सके, वो शागिर्द के सहारे ही खड़ा होता है।
शागिर्द उसे उल्टा लिटाता है और डेविल उसके सिर के पीछे कुछ प्रयोग करने लगता है।)
शागिर्द: इस काले पत्थर से क्या होगा, आका?
डेविल: ये काला पत्थर अब इसे हर बार गलत राह चुनने को मजबूर करेगा।
भले ही हम जेमस्टोन को खत्म न कर सकें, लेकिन इसके दो टुकड़ों को आपस में लड़वाकर इसकी ताकत को बेकार कर देंगे।
शागिर्द: मतलब अब ये दोनों भाई आपस में ही लड़कर एक-दूसरे को खत्म कर देंगे?
डेविल: अभी नहीं... अभी एक काम बाकी है।
जैसे ही ये होश में आएगा, इसके मन में इसके भाई को लेकर शक पैदा करना होगा।
डेविल: इसे ज़रा होश में लाओ... और फिर देखना, मेरे दिमाग़ का कमाल।
(शागिर्द अमर को होश में लाता है। अमर धीरे-धीरे होश में आता है।)
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अमर बैठा हुआ है डेविल और शागिर्द उससे बात कर रहे है।
डेविल: हमें लगा था कि तुम्हारा भाई तुम्हें बचाने ज़रूर आएगा...
लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद भी वो तुम्हें ढूंढने नहीं आया है।
अमर: वो आएगा... ज़रूर आएगा... और मुझे यहां से छुड़ाएगा।
डेविल: कहीं ऐसा तो नहीं कि वो तुम्हारे साथ चीज़ें बांटना नहीं चाहता —
और उसने तुम्हें यहाँ मरने के लिए छोड़ दिया हो?
अमर: नहीं! वो ऐसा नहीं कर सकता। वो मेरा भाई है, वो मेरे लिए कुछ भी कर सकता है।
डेविल: अगर ऐसा है, तो उसे अब तक आ जाना चाहिए था।
जॉन और सारा को पता है कि काले पत्थर को कैसे ढूंढा जाता है, तो अब तक वो तुम्हें ढूंढ क्यों नहीं पाए?
शागिर्द: ये ‘भाई-भाई’ कुछ नहीं होता।
मेरा भी एक भाई था — वो मुझसे बेहद प्यार करता था।
पर पता नहीं कब उसकी नीयत बदल गई और वो मुझसे अलग हो गया।
शायद किसी लड़की की वजह से, या माँ-बाप के प्यार को बाँटना पड़ा इस वजह से...
या यूँ कहो — हर उस चीज़ के लिए जो उसे मेरे साथ बाँटनी पड़ती थी।
डेविल: कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारा भाई भी तुमसे पीछा छूडाना चाहता हो —
इसलिए तुम्हें बचाने नहीं आया?
अमर (गुस्से में): तुम दोनों अपनी बकवास बंद करो!
तुम हमारे प्यार को नहीं जानते। वो कभी भी आ सकता है!
शागिर्द: प्यार को नफरत में बदलते देर नहीं लगती।
देखना — एक दिन तुम दोनों का प्यार नफरत में ज़रूर बदलेगा।
डेविल: छोड़ो शागिर्द, इसमें इस बेचारे की क्या गलती?
ये तो भोला है। ये करता रहेगा इंतजार लेकिन इसके पीछे समय बर्बाद करने से अच्छा है कि हम खुद जाकर उन्हें ढूंढें और खत्म कर दें।
(दोनों वहाँ से चले जाते हैं।)
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(यहाँ अमन अपने सीने से लगे जेमस्टोन पर ध्यान केंद्रित कर रहा होता है।
दूसरी तरफ जॉन अपने हाथ में रिंग लेकर काले पत्थर को ढूंढने की कोशिश करता है।)
सारा: क्या लगता है जॉन, अमर किस हाल में होगा?
जॉन: पता नहीं... पर जहाँ भी होगा, मेरे ख्याल से सुरक्षित ही होगा।
सारा: क्या तुम्हें पूरा यकीन है कि काला पत्थर और अमर दोनों साथ ही होंगे?
जॉन: जितना मैं जानता हूँ, सारा — हमारी असली मुश्किल डेविल नहीं है।
बल्कि वो चाल है जो उसने खेली है।
सारा: कैसी चाल, जॉन?
कोई नया खतरा तो नहीं है?
जॉन: वो तो मुझे भी नहीं पता...
बस हमें अमर को जल्द से जल्द ढूंढना होगा।
(तभी अमन वहाँ आता है।)
अमन: कुछ पता चला अमर कहाँ है?
जॉन: काले बादल अभी तक तो नहीं दिख रहे...
लेकिन मेरा मानना है कि जल्द ही दिख जाएँगे।
अमन: काले बादल? वो किस लिए?
जॉन: वही तो रास्ता बताएँगे काले पत्थर का।
(तभी रिंग से हल्का काला धुआँ निकलता है। ये देखकर जॉन उत्साहित हो उठता है।)
जॉन: देखो! काला धुआँ निकल रहा है —
हमें इसका पीछा करना होगा!
(तीनों उस धुएँ के पीछे तेज़ी से बढ़ते हैं।)
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(अमर वहीं पड़ा होता है — चाहकर भी अपनी जगह से हिल नहीं पा रहा।
उसमें अब इतनी ताकत भी नहीं बची कि उठ सके।
काला पत्थर धीरे-धीरे अपना असर दिखा रहा था।
अमर के मन में अजीब-अजीब ख्याल आ रहे थे, जिन्हें वह चाहकर भी रोक नहीं पा रहा था।)
अमर (मन में): कहीं ये दोनों सच तो नहीं कह रहे थे?
नहीं... ऐसा नहीं हो सकता।
अमन मुझे मरने के लिए नहीं छोड़ सकता — वो मेरा भाई है।
लेकिन अगर दूसरी तरफ से देखा जाए...
तो उसे मुझे ढूंढने में बहुत समय लग रहा है।
काले पत्थर को तो आसानी से ढूंढा जा सकता है — ऐसा कहा था उन दोनों ने।
तो अमन भी उसे जल्दी ढूंढ लेता...
पर फिर भी उसे काफी वक्त लग रहा है।
वो मुझसे बहुत प्यार करता है,
लेकिन क्या वो भी शागिर्द के भाई की तरह मेरे अंदर ही मुझसे ईर्ष्या करता है?
हम दोनों जुड़वाँ हैं — एक जैसे दिखते हैं,
तो फिर हमारी किस्मत एक जैसी क्यों नहीं है?
वो न जाने कहाँ है और क्या कर रहा है...
और मैं यहाँ मौत से जूझ रहा हूँ।
मुझे तो ये भी नहीं पता कि मैं ज़िंदा बचूँगा या नहीं।
शायद वो मुझे ढूंढना ही नहीं चाहता,
या फिर मेरी हर चीज़ पर अधिकार जताना चाहता है।
अमर (रोते हुए): नहीं... नहीं... ये मेरे ख्याल नहीं हो सकते...
मैं ऐसा सोच भी कैसे सकता हूँ?
(वो अपना शक बढ़ता हुआ महसूस करता है और बड़बड़ाता है…)
अमर: मुझे नहीं लगता कि वो आएगा मुझे बचाने...
अब मुझे ही कुछ करना होगा...
(वो अपनी पूरी ताकत लगाकर उठने की कोशिश करता है, लेकिन गिर जाता है।
तभी उसे एक आवाज़ सुनाई देती है…)
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(अमन, जॉन और सारा के साथ वहाँ पहुँचता है।)
अमन (भावुक होकर): अमर! मेरे भाई! तुम ठीक तो हो ना?
(वो अमर के सिर को अपनी गोद में रखता है।)
अमन: तुम्हारी ये हालत उन दोनों ने की है ना? मैं उन्हें ज़िंदा नहीं छोड़ूँगा!
(अमर कुछ बोलने की हालत में नहीं था।)
अमन (घबराकर): जॉन! इसे जल्दी से अस्पताल ले जाना होगा।
(तभी पीछे से एक आवाज़ आती है...)
डेविल: क्यों ना सभी को एकसाथ अस्पताल भेजा जाए?
(अमन, अमर को जॉन को सौंपता है, फिर डेविल से कहता है…)
अमन: मेरी तुमसे कोई दुश्मनी नहीं थी — फिर भी तुमने मेरे भाई की ये हालत कर दी।
अब बदले के लिए तैयार रहो।
डेविल: तुम्हें सच में लगता है कि तुम मुझे हरा सकते हो — वो भी सिर्फ आधे जेमस्टोन की मदद से?
अमन: तो चलो देखते हैं कौन ज़्यादा ताकतवर है — तुम या मेरे बदले की आग!
(बस ये उसके आखिरी शब्द थे — इतना कहकर वह टूट पड़ता है डेविल और शागिर्द पर।)
(ये लड़ाई पहली लड़ाई से ज़्यादा लंबी नहीं चली।
बस अमन के एक सटीक और ताकतवर हमले ने शागदी को पछाड़ दिया।
फिर वो डेविल की ओर मुडता है दोनो मे एक जंग छिड जाती है डेविल तेजी से वार किए जा रहा था पर उसका हर वार खाली जा रहा था और अमन के एक वार से डेवील दुर जा गीरा
उस एक ही हमले से डेविल और शागदी भाग खड़े हुए — जाते-जाते बस इतना कहा…)
डेविल: हम तुमसे दोबारा नहीं उलझेंगे...
क्या ये लड़ाई इतनी आसान थी या फिर डेविल की चाल का हिस्सा थी।
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(इस घटना के कुछ दिनों बाद — चारों तरफ अमन की वाहवाही होने लगती है।)
भीड़: वाह अमन! तुम तो बहुत बहादुर निकले!
किसी ने कहा — "अपने भाई की जान बचाकर तुमने बड़ा दिलेर काम किया है।"
हर तरफ उसके नाम की चर्चा थी।
अमन हर अख़बार के पहले पन्ने पर छाया हुआ था।
शहर को एक सुपरहीरो मिल गया था।
अखबार की हेडलाइंस:
“अमन – शहर का रक्षक”
“अमन – मानवता की नई उम्मीद”
(इस बात से अमन सातवें आसमान पर था।
लेकिन अमर के मन में कुछ और ही चल रहा था…)
अमर (मन में): आज तक जो भी मिला, दोनों को एक जैसा मिला।
लेकिन उस दिन के बाद से सब कुछ बदल गया है।
सबने अमन की बहादुरी देखी,
लेकिन मैंने जो झेला — वो किसी ने नहीं देखा,
और न किसी को उसकी परवाह है।
पर जो वाहवाही उसे मिली — उसका आधा हकदार मैं भी हूँ।
और जब तक मुझे मेरा हक नहीं मिलेगा...
मैं अमन को चैन से जीने नहीं दूँगा।
(इसके बाद वह अपने सिर के पीछे लगे काले पत्थर को छूता है...)
अमर: अब अमन के साथ जो कुछ भी बुरा होगा उसके पिछे की वजह मै बनुंगा।
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