EK SHIKSHIKA KI KAHANI in Hindi Moral Stories by उषा जरवाल books and stories PDF | संघर्ष और पहचान : एक शिक्षिका की कहानी

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संघर्ष और पहचान : एक शिक्षिका की कहानी


खिड़की के उस पार आसमान में बादल घिर आए थे। सीमा जी किताबों से भरी अलमारी के सामने खड़ी थीं। किताबें उनके लिए केवल पन्नों पर लिखे शब्द नहीं थीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी का आईना थीं। उन्हें पढ़ाना उतना ही प्रिय था जितना किसी को सांस लेना।
लेकिन जीवन हर किसी को आसान राह कहाँ देता है।
हर बार एक नई शुरुआत
पति के लगातार ट्रांसफर ने सीमा जी को घुमक्कड़ बना दिया था। हर चार-पाँच साल में उन्हें सामान बाँधकर नए शहर का रुख़ करना पड़ता। नया स्कूल, नई कक्षाएँ, नए सहकर्मी—सब कुछ हर बार बिल्कुल अनजान। कई बार लगता कि फिर से सब शून्य से शुरू करना कितना कठिन है, लेकिन सीमा जी कभी हिम्मत नहीं हारीं।
वे मुस्कुरातीं और कहतीं—
"अगर बच्चे नए हैं तो तरीक़े भी नए होंगे।"
इसलिए वे हमेशा कुछ नया सीखतीं। व्याकरण को नीरस नियमों का जाल बनाने के बजाय वे उसमें कहानियाँ, खेल और नाटकों का रंग भर देतीं। बच्चों को संधि समझानी हो तो वे शरारती पात्र गढ़ लेतीं, और समास समझाना हो तो किसी पहेली का सहारा लेतीं। धीरे-धीरे बच्चे भी उन्हें अपना मानने लगते।
कोलकाता का संघर्ष
लेकिन जब वे कोलकाता पहुँचीं, तो ज़िंदगी ने मानो उनकी परीक्षा लेनी शुरू कर दी। अच्छे स्कूलों में जगह नहीं मिली। जहाँ अवसर मिला, वहाँ वेतन इतना कम कि आत्मसम्मान चुभ जाए। एक पूरा साल बीत गया, और सीमा जी बिना उचित नौकरी के घर में कैद-सी हो गईं।
दिन के लंबे-लंबे घंटे उन्हें काटने लगे। किताबों से भरी अलमारी भी अब ताने देती लगती—“तुम्हारा हुनर बेकार क्यों बैठा है?”
उनका दर्द दोगुना इसलिए भी था कि शिक्षण उनकी आय ही नहीं, उनका पैशन था।
पहली बार दूरी
मजबूरी ने उन्हें जीवन का सबसे कठिन निर्णय लेने पर विवश कर दिया—पति से दूर जाकर गुरुग्राम लौटना। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि ऐसा दिन आएगा। लेकिन वहाँ उन्हें अच्छा अवसर और उचित वेतन मिला। मन थोड़ा हल्का हुआ, पर भीतर एक टीस बनी रही—“क्या शिक्षण का सपना हमेशा परिस्थितियों से हारता रहेगा?”
कोलकाता में रहते समय उन्होंने खान-पान और भाषा की समस्याएँ भी झेलीं। पूर्ण शाकाहारी होने के कारण कई बार भोजन की कठिनाइयाँ सामने आईं। लोग उनके उच्चारण पर हँसते, पर वे चुपचाप सह लेतीं। इन सबके बीच उनके पति ही उनकी ढाल बने। वे कहते—
"चिंता मत करो, तुम्हारी काबिलियत एक दिन सही अवसर तक ज़रूर ले जाएगी।"
और सचमुच, एक साल बाद उनकी मेहनत रंग लाई।
वे क्षण जो जीवनभर याद रहे
🌸 एयरपोर्ट पर चौंकाने वाली मुलाक़ात
एक दिन एयरपोर्ट पर अचानक एक हट्टा-कट्टा नौजवान उनके पैरों पर झुक गया। सीमा जी घबरा गईं। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा—“यह कौन है?”
नौजवान मुस्कुराया—
"मैडम, आप मुझे हिंदी पढ़ाती थीं। आज भी आपके पढ़ाए हुए संधि की वह शरारती कहानी याद है।"
सीमा जी की आँखें भर आईं। उनकी मेहनत का असली पुरस्कार सामने खड़ा था।
🌸 विद्यार्थिनी बनी सहकर्मी
कभी उन्होंने जिस लड़की को कक्षा 10 में पढ़ाया था, वही एक दिन उसी स्कूल में अध्यापिका बनकर लौटी। सबके सामने वह झुकी और सीमा जी के चरण छूकर बोली—
"मैम, आप ही ने मुझे प्रेरित किया था।"
सीमा जी के हृदय में उस पल जैसे घंटियाँ बज उठीं।
🌸 शरारती से वकील तक
कक्षा 5 का एक लड़का इतना शरारती था कि सभी शिक्षक उसे स्कूल से निकालने की गुहार लगाते। पर सीमा जी ने उस पर विश्वास किया।
“तुम कर सकते हो,” वे कहतीं।
0 से 2-3 अंक आने पर भी वे ताली बजवातीं। धीरे-धीरे वही बच्चा पढ़ाई की ओर मुड़ा।
सालों बाद उसका फोन आया—
"मैम, मैं अब वकील बन गया हूँ। आपकी वजह से आज यह मुकाम पाया है।"
सीमा जी की आँखें गर्व से चमक उठीं।
🌸 उद्धंड कक्षा का कायाकल्प
2011 की कक्षा 9 स्कूल की सबसे बदनाम कक्षा थी। कोई भी शिक्षक वहाँ टिक नहीं पाता। नए-नए शिक्षकों को रुलाकर भेज देती थी वह कक्षा। सीमा जी भी शुरू में परेशान हुईं, पर हार नहीं मानीं। उन्होंने स्नेह और थोड़ी अनुशासन की डोर से बच्चों का दिल जीत लिया।
वही कक्षा, जो सबसे खराब मानी जाती थी, साल के अंत में “सर्वश्रेष्ठ कक्षा” का पुरस्कार जीत लाई।
सच और कसक
सीमा जी जानती थीं कि यदि उन्हें बार-बार शहर न बदलने पड़ते, तो शायद वे और ऊँचाइयों तक पहुँच चुकी होतीं। लेकिन उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान था बच्चों के दिल में अपनी जगह बनाना।
वे कहतीं—
"शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान उसकी किताबें या पद नहीं, बल्कि उसके विद्यार्थी होते हैं।"
अंतिम सन्देश
सीमा जी की कहानी हमें यह सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, सच्ची लगन और जुनून कभी व्यर्थ नहीं जाते। सच्चा शिक्षक जहाँ भी जाता है, वहाँ अपनी छाप छोड़ ही देता है।