Gift of LIFE in Hindi Motivational Stories by PAYAL PARDHI books and stories PDF | जिंदगी उधार नहीं होती

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जिंदगी उधार नहीं होती

शीर्षक: ज़िंदगी उधार नहीं होती

राहुल के घर में हर सुबह डर के साथ शुरू होती थी।डर इस बात का नहीं कि वह बीमार है—डर इस बात का था कि समय उसके साथ ईमानदार नहीं है।

डॉक्टर की रिपोर्ट कह चुकी थी—“कुछ साल… शायद उससे भी कम।”उसके माता-पिता हर रात एक ही बात दोहराते—“शादी कर लो राहुल।”उनकी आँखों में ममता थी,लेकिन उस ममता के पीछे एक डर छिपा था—बुढ़ापे का अकेलापन।वे चाहते थे कि राहुल की पत्नी एक बच्चा दे,ताकि उनके बाद भी उनका जीवन किसी सहारे से चलता रहे।लेकिन राहुल हर बार चुप हो जाता।क्योंकि वह जानता था—अपनी अधूरी उम्र किसी और के पूरे सपनों पर लिख देना सबसे बड़ा अन्याय है।

दूसरी ओर मीनाक्षी थी।उसके सपनों की उम्र अभी शुरू ही हुई थी।किताबें, प्रतियोगी परीक्षाएँ,एक आत्मनिर्भर ज़िंदगी—सब कुछ उसके भीतर ज़िंदा था।लेकिन घर में उसकी आवाज़ कमजोर थी।“लड़कियों को ज़्यादा पढ़ने की ज़रूरत नहीं।”“अच्छा रिश्ता आया है, मना मत करो।

”मीनाक्षी ने हाँ कह दी।इसलिए नहीं कि वह तैयार थी—बल्कि इसलिए कि थक चुकी थी लड़ते-लड़ते।राहुल ने शादी से पहले उससे मिलने की शर्त रखी।न कोई सजावट,न कोई दिखावा।उसने मीनाक्षी को अपनी बीमारी के बारे में सब कुछ बता दिया।हर सच, हर डर, हर अधूरापन।बोलते-बोलते उसकी आवाज़ कांप गई

—“मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से कोई अपनी ज़िंदगी खो दे।”मीनाक्षी की आँखों में आँसू थे,लेकिन उनमें डर से ज़्यादा सम्मान था।उसने कहा—“मुझे आपकी बीमारी से नहीं,मुझे मजबूरी से डर लगता है।”उस दिन राहुल ने एक ऐसा फैसला लियाजो आसान नहीं था—लेकिन सही था।

उसने अपने माता-पिता के सामने शादी से मना कर दिया।आँसू बहे।गुस्सा हुआ।इल्ज़ाम लगे।लेकिन राहुल पहली बार डरा नहीं।उसने कहा—“अगर मेरी ज़िंदगी कम है,तो मैं उसे सच के साथ जीना चाहता हूँ,किसी की कुर्बानी के साथ नहीं।

फिर भी उसी माता-पिता उसे बहुत प्रेशर करने लगे अब ऐसे में हल राहुल के अगेंस्ट तूने खुद खुद जिंदगी से दूर करने का फैसला लिया, वह हमेशा के लिए उन्हें छोड़कर चला,l

पढ़ा लिखा समझदार था ,इसलिए समझता थ वह तो कभी ना कभी चला जाएगा, पीछे बैठी  उस लड़की का क्या होगा, जिसे हर दिन उसके  वी योग में जीना पड़ेगा उसे बच्चे का क्या होगा जो हर दिन पूछेगा कि उसके पापा कहां गए,

ऐसे में दो जिंदगी बर्बाद करने से अच्छा है क्यों हमेशा के लिए ही चले जाए। राहुल के जाने के बाद

”मीनाक्षी ने भी पहली बार अपनी आवाज़ उठाई।उसने पढ़ाई पूरी करने का निर्णय लिया।रिश्ता टूट गया।लेकिन दो सपने बच गए।दो जिंदगियाँ बच गईं।

राहुल  अपनी बीमारी को अपनी पहचान  बनाता, उसने उन लोगों के लिए काम भी  किया जो हालात के आगे हार मान लेते हैं।वह कहता—“ज़िंदगी की लंबाई नहीं,उसकी सच्चाई मायने रखती है। पर अंत मोड पर में उसने खुद हार मान ली,


”मीनाक्षी ने पढ़ाई पूरी की।वह उन लड़कियों की मार्गदर्शक बनीजिनकी आवाज़ घर की दीवारों में दब जाती है। तुम जैसे ही उसकी उम्र राय उसने अपने लिए एक अच्छे से जीवन साथी को चुना ।


मीनाक्षी ने आज भी राहुल को बोला नहीं था जब भी उसका जिक्र आता वह बस होठों पर मुस्कान लिए कहती करती की आसान नहीं था उसे भूल पाना, एक ऐसा सख्स था जिसने मेरी जिंदगी सवार दी ।मुस्कुरा ,कर कहती थी—हमने एक-दूसरे की ज़िंदगी नहीं ली,बल्कि जीने की वजह दी।

कहानी का संदेश:कभी-कभी सही फैसला वही होता हैजो सबसे ज्यादा दर्द देता है।लेकिनदर्द से भागकर नहीं,सच का सामना करकेज़िंदगी बदली जाती है।किसी और की कुर्बानी पर खड़ी ज़िंदगीकभी मजबूत नहीं होती।औरज़िंदगी उधार नहीं होती—उसे हिम्मत से जिया जाता है।