ROBOT MAA in Hindi Moral Stories by उषा जरवाल books and stories PDF | रोबोट माँ

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रोबोट माँ

सुबह के चार बजे थे। घर गहरी नींद में डूबा हुआ था, पर उसके भीतर की चेतना पहले ही जाग चुकी थी। यह जागरण किसी आदेश का परिणाम नहीं था, न ही किसी अपेक्षा का बोझ। यह उन वर्षों की देन था, जिनमें उसने अपने शरीर को समय से पहले उठना सिखा दिया था—इस विश्वास के साथ कि अगर वह देर करेगी, तो दिन उससे आगे निकल जाएगा।

रसोई में जलती बत्ती किसी दीपक की तरह नहीं, बल्कि एक संकेत की तरह थी—कि घर का संचालन शुरू हो चुका है। आटे की लोई, उबलता दूध, टिफ़िन के डिब्बे—ये सब अब वस्तुएँ नहीं रहीं, बल्कि उसके अस्तित्व की इकाइयाँ बन चुकी थीं। उसे सात बजे स्कूल पहुँचना था, और वह जानती थी कि यदि उसने सुबह अपने हिस्से का सारा बोझ नहीं उठाया, तो शाम को उसकी देह और मन दोनों उसके विरुद्ध खड़े हो जाएँगे। इसलिए वह स्वयं पर अनुशासन थोपती थी, किसी के कहने से नहीं, बल्कि इसलिए कि थकी हुई माँ घर की व्यवस्था में एक बाधा बन जाती है।

पति कई बार उससे कहते कि वह अपने लिए काम खोज लेती है, कि रोज़ सफ़ाई आवश्यक नहीं, कि उसे आराम करना चाहिए। वह हर बार मुस्कुरा देती थी। वह मुस्कान दरअसल एक अनुवाद थी—उस सत्य का, जिसे शब्दों में कहना कठिन था। कैसे समझाए कि यह काम ढूँढना नहीं, बल्कि भविष्य की अव्यवस्था से पहले ही समझौता कर लेना है। यह उसकी स्वैच्छिक कैद थी, जिसमें वह स्वयं को सुरक्षित महसूस करती थी।

दिन भर स्कूल में वह बच्चों को केवल किताबें नहीं पढ़ाती। वह उन्हें अच्छे व्यवहार का अर्थ समझाती है—कैसे बात करनी चाहिए, कैसे बड़ों का सम्मान किया जाता है, कैसे अपनी असहमति को भी सभ्यता के साथ रखा जा सकता है। वह उन्हें सिखाती है कि टोकना हमेशा अपमान नहीं होता और रोकना हमेशा दमन नहीं। उसे यह सिखाते हुए विश्वास रहता है कि यह संस्कार कहीं न कहीं उनके भीतर अंकुरित होंगे।

पर यही विश्वास घर लौटते ही बिखर जाता है।

उसके अपने बच्चे—उन्हें ये सारी बातें सुननी नहीं होतीं। समय पर खाने, नहाने, सोने की बात उन्हें नागवार लगती है।
अच्छे व्यवहार की सीख उन्हें उपदेश लगती है। बड़ों के सम्मान की बात उन्हें पुरानी सोच। माँ की हर टोका-टाकी उन्हें चुभती है। उन्हें रोका जाना पसंद नहीं। उन्हें बताया जाना पसंद नहीं। कई बार वह सोचती है कि शायद गलती उसी की है। शायद उसे बोलना ही नहीं चाहिए। न टोकना, न रोकना, न कुछ कहना।
शायद उसकी चुप्पी उन्हें अधिक स्वीकार्य लगे। शायद तब वे उससे नरमी से बात करें। और वह सचमुच चुप हो जाती है।

कुछ दिन वह किसी बात पर नहीं बोलती। न खाने के समय पर, न फोन की आदत पर, न अस्त-व्यस्त दिनचर्या पर।

पर उसकी यह चुप्पी भी किसी को दिखाई नहीं देती। उसका मौन भी इस घर की व्यवस्था में
कोई बदलाव नहीं लाता।

बड़ा बेटा हॉस्टल में रहता है। छुट्टियों में आता है।
वह भीतर ही भीतर एक दृश्य रचती है—वह पास बैठेगा, उससे बात करेगा, शायद अनायास ही सिर उसकी गोद में रख दे। लेकिन गोद अब अप्रचलित हो चुकी है। स्नेह को समय की बर्बादी समझा जाने लगा है। सिर पर हाथ फेरना एक व्यवधान बन जाता है, और गाल पर रखा हाथ काम में खलल।

छोटा बेटा आठवीं में है, पर उसकी असहजता उम्र से अधिक है। फोन से बाहर आने को कहना जैसे उसकी स्वतंत्रता पर आघात हो।

रविवार उसके लिए सबसे लंबा दिन होता है। पति सहयोग करते हैं, पर सहयोग के बावजूद वह दिन उसके लिए अवकाश नहीं बन पाता। विशेष भोजन, बिखरा हुआ समय, सबका अपने-अपने ढंग से जीना—और इन सबके बीच वह निरंतर चलती रहती है। उसे कई बार लगता है कि काश रविवार अस्तित्व में ही न हो, क्योंकि अन्य दिनों में कम से कम एक निश्चित समय तक घर को समेट लेने का संतोष तो रहता है।

रात को, जब घर पूरी तरह मौन हो जाता है, वह अपने भीतर उतरती है। वहीं उसे यह बोध होता है कि उसने कब अपनी पसंदों को त्याग दिया, कब उसकी इच्छाएँ धीरे-धीरे विलुप्त हो गईं। वह जानती है कि वह इंसान है, पर इस घर में उसका मनुष्य होना कोई मूल्य नहीं रखता। यहाँ उसकी उपयोगिता ही उसकी पहचान है।

उसे लगने लगता है कि बच्चों को माँ नहीं चाहिए—उन्हें एक ऐसी रोबोट माँ चाहिए, जो बिना प्रश्न किए काम करती रहे, जो उतना ही बोले जितना उन्हें सहन हो, और जो प्रेम भी उनकी सुविधा के अनुसार बाँट दे। माँ तब तक स्वीकार्य है, जब तक वह चलती रहती है। रुकना, सोचना, चुप होना—ये सब उसकी भूमिका में अनावश्यक हैं।

और तब उसके भीतर एक कटु, असहज प्रश्न जन्म लेता है—

यदि यह रोबोट एक दिन सचमुच बंद हो जाए,
तो क्या किसी को यह याद आएगा
कि वह केवल एक व्यवस्था नहीं,
एक इंसान थी?

या फिर यह पूछा जाएगा कि
खाना कौन बनाएगा,
घर कौन चलाएगा,
और इस मशीन के बिना
ज़िंदगी अब कैसे चलेगी?