Ramesar's grandmother in Hindi Moral Stories by navratan birda books and stories PDF | रामेसर की दादी

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रामेसर की दादी

रामेसर अब गाँव का भोला-सा लड़का नहीं रहा। समय ने उसे माँजा, अनुभवों ने उसे गढ़ा, और शिक्षा ने उसे ऊँचाई दी। अब वह अपने व्यक्तित्व में एक निखार लिए चलता है, साफ़-सुथरे कपड़े, चमचमाते जूते, चुस्त बेल्ट, सलीके से चढ़े हुए मोज़े। भाषा में मधुरता है, बातों में सैकड़ों महापुरुषों की उक्तियों की गूँज, और शैलियों में आधुनिकता का उन्नत स्वर। वह एक अच्छी नौकरी करता है और समाज में सम्मानित स्थान पा चुका है। ज्ञान, शील और मूल्य अब उसके जीवन के पथप्रदर्शक हैं।

परंतु इस सबके बीच भी भीतर का रामेसर वही है, जिसे किताबों से, विचारों से और स्मृतियों से गहरा लगाव है।

आज ऑफिस से लौटते ही थकान ने उसे जकड़ लिया। भारी कदमों से कमरे में आया और जैसे ही बिस्तर पर गिरा, उसका तन मानो बोझ उतारकर हल्का हो गया। कुछ देर आँखें मूँदकर पड़ा रहा, फिर मन ने कहा,
"क्यों न कुछ पढ़ा जाए? किताबें ही तो मनुष्य को उसकी असली यात्रा पर ले जाती हैं।"

रामेसर की आदत थी, जब-तब समय मिलता, किताबों में कुछ खोजने लग जाता। उसकी चेतना में हजारों विचार ऐसे उमड़ते-घुमड़ते जैसे कोई नदी अपनी धारा में कंकड़-पत्थर, रेत, घास-फूस, यहाँ तक कि झाड़-झंखाड़ सबको बहा ले जाती हो।

आज उसकी उँगलियाँ अनायास ही प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ पर ठहर गईं। हामिद और उसकी बूढ़ी दादी अमीना की कथा पढ़ते-पढ़ते उसका मन किसी और लोक में पहुँच गया। पंक्तियाँ जैसे ही आँखों से होकर हृदय तक पहुँचीं, उसके सामने अपनी ही दादी का चेहरा आ खड़ा हुआ, वह चेहरा जिस पर उम्र की झुर्रियाँ थीं, मगर आँखों में अथाह ममता का प्रकाश।

रामेसर का हृदय भीग गया। उसे याद आया कैसे दादी कई बार अपनी भूख दबाकर उसे रोटी का बड़ा टुकड़ा दे देती थीं। कैसे सर्दी की रातों में अपने ओढ़ने को आधा मोड़कर उसके ऊपर डाल देती थीं। कितनी बार उन्होंने बिना शब्दों के त्याग किया और उसे कभी यह एहसास तक नहीं होने दिया।

‘ईदगाह’ के हामिद में आज रामेसर को अपना ही बचपन दिखाई दिया, और अमीना में अपनी दादी का अमर रूप। किताब का हर शब्द उसकी स्मृति और संवेदना को जैसे झकझोर रहा था। आधुनिक जीवन की चकाचौंध के बीच वह क्षणभर के लिए अपने मूल तक लौट गया, जहाँ संबंध थे, त्याग था, और वह निःस्वार्थ ममता थी जिसने उसे गढ़ा।

आज दादी अपने अंतिम समय का इंतजार करती बैठी रहती है. वह चल-फिर नहीं सकती क्योंकि छः बरस बीते वो अंधी हो गई है।

इस बुढ़ि‌या से रामेसर कितना आसक्त था कुछ समय पहले, दोनों में कितना प्रेम था। जब वे साथ ही एक घर में रहते थे, एक साथ खाना खाते थे और जब रामेसर को दादी के अलावा किसी के भी साथ नीन्द नहीं आती थी।

दादी रामेसर को सुलाने के लिए प्रेम से उसकी पीठ पर अपने फटे-खुरदरे हाथों से खुजाती थी। जिद्द करने पर कैसे वह अपने पल्लू से एक पुराने गुड़ की भेली निकालकर देती और उसे मनाती थी।
रामेसर के लिए उसकी दादी का ओढ़ना ही पूरा आसमान था, सारा संसार था।

रामेसर की सोच‌ते-सोचते आँखे भर आई, आज जब वह अपने आप को देखने लगा तो सब कुछ पर्याप्त सा था पर एक अनकही कमी का एहसास भी साथ था।

आज जब भी वह मंहगी मिठाइयाँ खाता है,फल और तरह-तरह के पकवान खाता है, लेकिन उनमें भी उस पुराने गुड़ का स्वाद नहीं पाता। 
  • जब रात में कभी रामेसर की नींद उचट जाती है तब उसे अपनी पीठ पर वह हाथ महसूस होता है जो किसी खुरदरे पत्थर की भांति हो और उसकी पीठ खुजा रहा हो।