रवि एक साधारण लड़का था, मध्यमवर्गीय परिवार से। उसके पापा का देहांत तब हो गया था जब वह छोटा ही था। घर की सारी ज़िम्मेदारी उसकी माँ के कंधों पर आ गई थी। माँ ने कभी थकान का नाम तक नहीं लिया। कभी चौका-बरतन किया, कभी दूसरों के घर सिलाई, और कभी खेतों में काम करके उसने अपने बेटे को पढ़ाया-लिखाया।
रवि बड़ा हो गया था, लेकिन समय के साथ उसमें एक आदत घर कर गई थी—गुस्सा। छोटी-सी बात पर चिल्ला पड़ना उसकी आदत बन गई थी। माँ बार-बार समझाती, "बेटा, गुस्सा आग की तरह होता है, इसमें पहले खुद जलते हैं और फिर दूसरों को भी जला देते हैं।" लेकिन रवि इन बातों को कभी गंभीरता से नहीं लेता।
एक शाम की बात है। रवि घर आया तो माँ ने प्यार से कहा—
“बेटा, आज तेरी पसंद की पूड़ियाँ बनाई हैं।”
रवि गुस्से में बोला—
“माँ, मैंने कितनी बार कहा है कि मुझे अब ये सब पसंद नहीं। आप क्यों मेरी बात नहीं समझतीं? मुझे अकेला छोड़ दीजिए।”
ये कहते हुए वह कमरे में चला गया। माँ के चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में हल्की नमी छिप गई थी। उन्होंने चुपचाप खाना समेटा और अपने कमरे में चली गईं।
उस रात रवि देर से लौटा। दरवाज़े पर वही पुरानी चप्पलें रखी थीं, जिन्हें देखकर उसे सुकून मिलता था। उसने सोचा, “माँ अब भी जगी होंगी, दरवाज़े पर इंतज़ार कर रही होंगी।” लेकिन जब उसने कमरे का दरवाज़ा खोला तो माँ बिस्तर पर सीधी लेटी थीं… आँखें बंद थीं और चेहरा शांत।
रवि ने झकझोर कर कहा—
“माँ, उठो ना… मैं आ गया हूँ।”
लेकिन माँ ने आँखें नहीं खोलीं।
उसके पैरों के पास वही पुरानी चप्पलें रखी थीं, जैसे वे अब भी उसका इंतज़ार कर रही हों। रवि की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे याद आया कि कितनी बार माँ ने उसके लिए भूखे पेट रहकर उसे खाना खिलाया, कितनी बार बीमार होने पर पूरी रात उसके सिर पर हाथ रखकर जागीं, और कितनी बार उसने गुस्से में माँ को चोट पहुँचाई थी।
उस रात रवि पहली बार समझा कि माँ का प्यार कैसा होता है—बिना शर्त, बिना शिकायत।
अगली सुबह घर में सन्नाटा था। रिश्तेदार आ गए, माँ की अर्थी उठी। रवि रो-रोकर बार-बार माँ की चप्पलों को सीने से लगाता और कहता—
“माँ, बस एक बार मुझसे बात कर लो। मैं अब कभी गुस्सा नहीं करूंगा। काश मैं उस दिन आपको डाँटता नहीं।”
लेकिन वक्त बीत चुका था। माँ की चप्पलें ही अब उसके लिए माँ की आख़िरी निशानी बन गई थीं।
रवि हर सुबह उठकर उन चप्पलों को उठाता, साफ करता और सीने से लगाता। जब भी गुस्सा आता, वो माँ की आवाज़ सुनने की कोशिश करता—
“गुस्सा मत कर बेटा, सब ठीक हो जाएगा।”
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💔 सीख: माँ-बाप हमारे लिए अल्लाह/भगवान की सबसे बड़ी नेमत होते हैं। उनकी ज़िंदगी में रहते हुए हमें उनका सम्मान, प्यार और कद्र करनी चाहिए। क्योंकि एक बार वे चले गए तो सिर्फ़ यादें और अफ़सोस रह जाते हैं
To doston kaisa laga kahani
Comments me jarur bataye 💕
Or agar apke mann me bhi hai koi kahani
Ya apke life me bhi koi real ghatna ghata hai jiska aap kahani banwana chahte hain ?ya kisi ki yaad me kahani banwana chahte h to hme comment 💬 karein