भारत की रचना / धारावाहिक बीसवां भाग
भारत कभी सोचता कि रचना के बारे में ज्योति से पूछा जाए, ज्योति से पूछकर रचना के बारे में समस्त जानकारी ली जा सकती है. परन्तु फिर यह सोचकर कि, वह टाल जाता कि, न मालुम उसके इस प्रकार से पूछताछ करने पर ज्योति खुद उसके बारे में न जाने क्या-से-क्या सोचे? रचना के बारे में इस तरह से पूछताछ करना ठीक भी हो अथवा नहीं? भारत इसी तरह से सोचना आरम्भ करता, तो सोचते-सोचते कब कॉलेज का अंतिम घंटा भी घन-घनाकार शांत हो जाता, उसे पता ही नहीं चलता. विद्द्यार्थी अपने घर चले जाते. कॉलेज खाली हो जाता. नौकर-चाकर और शिक्षक भी अपना कार्य समाप्त करके लौट जाते. गार्डन में केवल पेड़-पौधे और फूलों की वनस्पति फिर दूसरे दिन की आस में सबको विदा कर देते.
फिर, जब अंत में कहीं सूर्य की अंतिम लाली भी अपना दम तोड़ने लगती, दिन का उजाला, करीब आती हुई संध्या को देखकर, स्वयं में ही सिमट जाता और जब कॉलेज में यात्री के चौकीदारों की ड्यूटी आरम्भ हो जाती- साथ ही कॉलेज के मैदान में विद्द्यार्थी भी खेलकर वापस अपने घर चले जाते, तब कहीं भारत अपने स्थान से उठता. थका-थका-सा अपनी मृत कामनाओं की ठंडी लाश के समान वह बे-मन से लौट जाता. होटल पर पहुंचता. किसी भी खाली मेज के सामने, बैठ जाता. खाना सामने आता तो वह खा लेता- फिर चाय पीता, और चुपचाप अपने किराए के कमरे में आकर पड़ जाता था. कभी-कभी जब उसकी परेशानी, उसकी सीमा से बाहर आ जाती थी और उसको सहन करना कठिन हो जाता था तथा रचना की अनुपस्थिति उसके दिल और दिमाग, दोनों ही को परेशान कर देती थी, तो न जाने क्यों स्वत: ही उसकी पलकें भीग जाती थीं. हांलाकि, रचना से उसका ऐसा कोई विशेष सम्बन्ध भी नहीं था, कोई वायदा भी किसी ने नहीं किया था; बस एक ऐसी कच्ची प्यार की अनुभूति अवश्य ही शायद दोनों को हो गई थी, जो जुड़ने से पूर्व ही अलग भी हो चुकी थी. कभी-कभी जब उसका दुःख उसकी सीमा से बाहर आ जाता और सहन करना कठिन हो जाता, तब ऐसे में उसकी आँखों से स्वत: ही आंसू उसकी बदकिस्मती का सहारा लेकर उसकी पलकों की कोरों से ढुलक पड़ते. ढुलकते हुए गालों पर उसकी बढ़ी हुई दाढ़ी के बालों में उलझ जाते. कुछेक कानों के गड्ढों में भी चले जाते. वह रोने लगता. अपने नसीब पर- अपने दुःख पर- और विधाता के दस्तूर भी. एक ओर उसके अपने पिता के निधन का दुःख, तो दूसरी ओर कॉलेज में हर वक्त छाई हुई खामोश मनहूसियत जैसे उसकी बेबसी का मज़ाक उड़ाती रहती. रचना, अचानक से क्या गुम हुई थी कि, जैसे उसके लिए तो कॉलेज का सारा आकर्षण ही अपने साथ ले गई थी? फिर, ऐसी दशा में भारत अपने जैसे बिना बात के आंसू बहाता हुआ सो भी जाता. किस समय उसकी आँखें बंद भी हो जातीं, उसे कुछ ज्ञात ही नहीं पड़ता. दुनियां के इस समाजी माहौल में, एक ओर भारत अपने दुःख-दर्दों पर आंसू बहा रहा था- रोजाना वह सिसक भी लेता था. तड़पता और और अकेले में रो भी लेता था तो दूसरी तरफ अपने मुकद्दर की मारी रचना भी जेल की सख्त दीवारों में कैद अपने दर्द में रोती और दम तोड़ देना चाहती थी. लोग तो ज़िन्दगी को पूजते हैं, उसे जी-भरकर प्यार करते हैं, उसे सुंदर बनाना चाहते हैं, परन्तु रचना ! अपने इंसानी मुकद्दमों के कारण मिले सिले को देख-देखकर स्वयं अपने जीवन को ही कोसा करती थी. वह और उसका जीवन- उसके जीवन का धेय्य क्या था? उसका अब क्या होगा? वह इस संसार में क्यों आई थी? क्यों उसने जन्म लिया था? क्यों पैदा हो गई थी वह? किसने उसको जन्म दिया था? जन्म देनेवाली उसकी मां भी उसको इस दुनियां में अकेला छोड़कर क्यों अपना मुख छिपा गई? ऐसे ही न जाने कितने जटिल प्रश्नों के तहत फंसी, उलझी रचना अपने आप में ही जैसे एक कभी भी न सुलझने वाला प्रश्न बनकर रह गई थी. रामकुमार वर्मा पर उसे रह-रहकर क्रोध आता था, तो दूसरी ओर भारत का अनकहा, उसके दिल में चुपचाप बसा हुआ, उसका प्यार- उसकी मधुर यादें, यादों का सिलसिला, पलभर में ही उसके सारे अरमानों को रुला जाता था. क्या-से-क्या हो गया था? पल भर में ही वह कहाँ आ गी थी? एक क्षण में ही उसकी ज़िन्दगी का जैसे सारा नक्शा ही बदल चुका था. वह सोचती थी कि, अब वह जैसे कहीं की भी नहीं रही है. कहीं की तो वह पहले भी नहीं थी. परन्तु, अब तो वह अपने-आप में भी कुछ नहीं रही है. रचना उदासियों की बाढ़ में हिचकोले खाती हुई, कभी कुछ सोचती थी, तो कभी कुछ? जेल की दीवारों में बंद हुए उसे काफी दिन हो चुके थे. इतने दिनों के अंतर में ही वह और उसका समूचा सौंदर्य, सुन्दरता की राख बनकर जैसे हवा में उड़ चुका था. ये था, उसके बिगड़े वक्त का क्रूर तकाजा, जिसने एक ही पल में, उसका सारा कुछ ही छीन लिया था. छीन लिया था- उसका भविष्य- उसका सहारा- उसका प्यार- उसके जीवन की सम्पूर्ण आशाएं और जीने का आधार और आस भी.
रचना पढ़ी-लिखी थी. स्नातक कक्षा की वह छात्रा थी, इस कारण जेल में ही अन्य कैदियों को पढ़ाने का कार्य दे दिया गया था. उसके वार्ड में और भी कैदी स्त्रियाँ थीं. सब-की-सब, एक-से-बढ़कर-एक, बड़े-से-बड़े अपराधो न में पकड़ी गईं थीं. उनमें से कितनी ही 'कॉल गर्ल्स' और वेश्याएं भी थीं. प्रात: होते ही रचना सबसे पहले उठ जाती थी. वह, जैसा कि उसे मिशन में रहते हुए सिखाया-पढ़ाया गया था; वह बाइबल पढ़ती, अपने ईश्वर से प्रार्थना करती. अपने ईश्वर का सबसे पहले ध्यान करना उसका तब का कार्यक्रम था, जबकि, वह बहुत छोटी थी. बचपन से ही उसे मसीही संस्कारों की शिक्षा दी गई थी. एक बड़े ही अच्छे, शालीन वातावरण में उसे पाला गया था. इसी कारण उसके जेल की जेलर उसके शालीन, आचार-व्यवहार, तथा उसके अच्छे सम्पूर्ण चरित्र से काफी अधिक प्रभावित रहती थी. इसलिए, जेलर जब भी रचना को गौर से देखती, उसका एक प्रकार से निरीक्षण करती, तो उसको यह विश्वास भी नहीं हो पाता था कि, रचना जैसी, स्नातक कक्षा की सभ्य छात्रा, अफीम, गांजा, चरस और हेरोइन जैसी मादक वस्तुओं की तस्करी भी कर सकती है? इसलिए एक दिन, अवसर पाकर जब उसने रचना से उसकी सारी कथा स्वयं उसके ही ही शब्दों में सुननी चाही, तो इस घटना की स्मृति मात्र से ही रचना की आँखें सुर्ख हो गईं थीं. वह रोने-रोने को हो आई. आँखों के पपोटे जैसे कांपने लगे. होंठ उसके जैसे तड़पकर ही रह गये. मुख में जैसे उसके दुखभरे अतीत का कड़वा विष फैल गया था. जेलर, उससे कुछ और कहती, उससे पूर्व ही रचना की आँखों से आंसू रात्रि में बेदम होकर टूटती हुई शबनम की बूंदों के समान टूटकर गिर पड़े. नीचे, भूमि पर दर्द और वेदना के प्रतीक रचना की आँखों के ये आंसू, जैसे एक निर्दोष दुखिया की वास्तविक गवाही देने लगे थे.
जेलर ने रचना की आँखों में दर्दभरे आंसू देखे, तो वह भी जैसे तड़पकर रह गई. उसने फिर रचना के कंधे पर अपना हाथ रखते हुए तसल्ली दी और कहा कि,'रचना ! मैं तुम्हारे दुःख को समझ रही हूँ. हृदय से महसूस भी करती हूँ, परन्तु सचमुच नहीं जानती, कि वास्तव में हकीकत क्या है? अपने बारे में यदि तुम मुझे सब-कुछ बता दोगी, तो हो सकता है कि, मैं तुम्हारी कुछ-न-कुछ मदद अवश्य ही कर सकूं. तुम्हारे इतने अच्छे चरित्र को सामने रखकर मैं सरकार से तुम्हारी सज़ा में कटौती करवा लूंगी. ये भी मनुष्य के सामने परीक्षाएं तो आती ही हैं, लेकिन, परिस्थिति से लड़ना सीखो, ढांढस बांधो. साहस से काम लो. तुम्हारे सुचरित्र को देखकर प्रतीत होता है, कि तुम बिलकुल ही निर्दोष हो. तुम्हारे केस का वास्तविक अपराधी तो कोई और ही है. अपने सामने आनेवाली हरेक बुराइयों से लड़ना सीखो. अब इतनी सीधी भी बनकर मत रहो, कि अपने अधिकारों के लिए अपना मुख भी न खोल सको. इतनी पढ़ी-लिखी और समझदार होते हुए, तुमको कम-से-कम इतना तो ज्ञान रखना ही चाहिए, कि आंसू ज़िन्दगी की हरेक ठोकर, प्रत्येक बिगड़ी हुई परिस्थिति और समय के बिगड़े हुए मिजाज़ का इलाज़ नहीं कर सकते हैं. कभी-कभी मनुष्य को अपना हक पाने के लिए, जीवन और मृत्यु के दौर से भी गुज़रना पड़ता है. तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि, अत्याचार सहना भी एक अपराध कहलाता है.'
जेलर के द्वारा ऐसी उपरोक्त बातें सुनने के पश्चात, जब रचना से नहीं रहा गया, तो वह फिर से सुबक पड़ी. आंसू उसकी पलकों से सरककर साड़ी के आंचल में जमा होने लगे. जेलर समझदार थी. उसने भी रचना को पहले खूब रो लेने दिया. चाहा कि, रोकर शायद रचना का गम हल्का हो जाए? फिर, कुछेक क्षणों के पश्चात जब रचना जीभर कर रो ली. उसका दुःख हल्का हुआ और जब उसे कुछ संयम-सा बंधा, तो उसके दिल को तसल्ली भी मिली. राहत प्राप्त हुई तो, फिर उसने अपने बारे में जेलर को सब-कुछ बता देना ही उचित समझा. चूँकि, रचना अन्य कैदियों को पढ़ाकर ही आई थी और जेलर ने भी उसे तुरंत ही अपने कार्यालय में बुलवा लिया था तथा जेल की अन्य कैदियों को दोपहर का भोजन बांटा जा रहा था; इस कारण जेलर ने भी रचना का लंच अपने ही कार्यालय में मंगवा लिया. जेलर ने रचना को भी अपने साथ ही खाने के लिए बाध्य किया तो वह चुपचाप खाने लगी. जेलर, शायद रचना को खूब अच्छी तरह से जान लेना चाहती थी? वह इतना तो समझ ही रही थी कि, रचना के रहन-सहन और बात-चीत करने के ढंग से उसमें अन्य कैदियों से बहुत अधिक अंतर नज़र आता था. रचना की ओर से यही कुछ विशेष कारण थे कि, जिन्होंने जेलर को उसकी तरफ कुछ विशेष ही आकर्षित कर दिया था.
- क्रमश: