स्नेह श्रद्धा

( प्रतिकात्मक तस्वीर )
स्नेह ख़ुशी से नाच उठा. ऊस की भाव रंगी आंखो में कर्तव्य के मोती झलक उठे. श्रद्धा को दी गईं आशा ने अपना रंग दिखाया.. उसी के कारण ही श्रद्धा को अच्छा जोब मिल गया.
" श्रद्धा! तुम एक अर्जी लिख दो. मेरी दोस्त की ओफिस में जगह खाली है. मैं तुम्हे वहाँ जोब दिला दूंगा.. "
दोस्त प्रति के अटूट विश्वास की वजह से स्नेह ने उसे वादा कर लिया.
दूसरे ही दिन श्रद्धा की अर्जी ऊस ने धीरज के हाथों में थमाते हुए भार पूर्वक सिफारिश की.
" श्रद्धा मेरे लिये बहन से भी बढ़कर है. ऊस को नौकरी की जरूरत है. प्लीझ मेरी श्रद्धा के लिये इतना जरूर करना. तेरा यह एहसान मैं क़भी नहीं भूलूंगा. "
ऊस के बाद स्नेह ने कई बार धीरज की ओफिस के चककर काटे थे. कितनी बार फोन किये थे. लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ. धीरज प्रति के विश्वास ka फुग्गा फट से टूट गया.
पहली बार स्नेह को अपनी भूल का एहसास हुआ. एक पर विश्वास कर के ऊस ने दूसरो को आशा दिलाई थी. ऊस के ऐसे व्यवहार से श्रद्धा भी अस्वस्थ, मायूस हो गईं थी. ऊस ने कह दिया था.
" नौकरी को मारो गोली! "
" गोली मारुं? मुझे तो बन्दुक पकड़ना नहीं आता.. गलती से गोली चल गईं तो तो कोई बिचारा कोई निर्दोष मार जायेगा. "
श्रद्धा के गुस्से तो शांत करने के लिये ऊस ने मजाक किया.
जवाब में श्रद्धा में हलकी सी मुस्कान बिखेरी. ऊस की आंखो में छिपी करुणा को स्नेह ने परख लिया. जुठी आशा देने के लिये उसे बड़ा अफ़सोस हुआ.. धीरज के भरोसे पर श्रद्धा ने दूसरा जोब भी खो दिया था. इस बात की स्मृति से स्नेह परेशान हो गया.
कुछ भी होता है. वह श्रद्धा को जोब दिलाकर रहेंगा.. ऊस ने मन ही मन फैसला कर लिया था
ऊस के बाद स्नेह ने काफी प्रयास किये थे. परिचित लोगो का संपर्क भी किया था.. दो महिने की काफी भगादौड़ के काम ऊस ने सभी सहूलियत के साथ श्रद्धा के लिये जोब ढूंढ निकाला था.
और श्रद्धा ख़ुशी के फूली नहीं समाई थी. ईश्वर ने ऊस की प्रार्थना सुनी थी. अपने पति का कर्ज उतारने का उसे मौका मिला था. ऊस का सपना पूरा हो जायेगा. ऊस बात की तसल्ली हो गईं. ऊस ने स्नेह का एहसास अदा करते हुए कहां :
" स्नेह तुम्हारी उमदा भावना का कर्ज मैं कैसे उतार पाऊंगी? तुम्हारी कर्तव्य प्रयाणता के बारे में क्या कहूं? शब्द नहीं मिलते. "
" पागल स्नेह का कोई बदला नहीं होता. बस सदा खुश रहो. तुम्हारे पति का ख्याल रखो.. और मुझे भूलना नहीं. बस यही तेरे स्नेह का बदला है. "
स्नेह की बातें सुनकर श्रद्धा की आंखो में आंसू आ गये. मान के संकेत रूप ऊस का सिर झुक गया. ऊस ने स्नेह के चरणों का स्पर्श करने की कोशिश की तो स्नेह ने उसे रोककर गले लगा लिया.
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" मीना! आज मेरा कर्तव्य पूरा हो गया. श्रद्धा को अच्छा जोब मिल गया. अब ऊस के सारे दुःख दूर हो जायेंगे. "
" चलो अच्छा हो गया.. बेचारी के दुःख भरे दिन ख़त्म हो गये. आप की ओफिस में उसे मिलता भी क्या था? कर्ज के बोज ने ऊस के पति की कमर तोड़ दी है. "
" मीना! तुम कितनी अच्छी हो. श्रद्धा की तरह किसी का दुःख नहीं देख सकती. "
" अब तारीफ के फूल बरसाना छोड़ो और पेट पूजा कर लो. मेरी रसोई ठंडी हो रही है. "
जूठा गुस्सा जताते हुए वह अपने पति को किचन में ले गईं.
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स्नेह के लिये श्रद्धा बहुत कुछ थी. ऊस के अलावा उसे मीना जैसी समझदार बीवी मिली थी. फूल जैसे बच्चे का उपहार मिला था. केवल अपनी कोई बहन नहीं होने का अफ़सोस होता था. वातसल्य भूखे स्नेह को श्रद्धा के रूप में इश्वर ने उपहार दिया था.. जिस ने ऊस का जीवन बदल दिया था.
श्रद्धा के साथ तीन साल का रिश्ता स्नेह के लिये श्रेष्ठ साबित हुआ था. रोज की तरह आखिरी दिन दोनों साथ निकले थे. श्रद्धा का संग छूट जायेगा इस ख्याल से स्नेह विचलित हो गया था.
" श्रद्धा चलो हम चाय पीते है. "
ऊस ने तुरंत आंखे झुकाकर अनुमति दे दी.. ऊस के प्रति के विश्वास के एहसास से स्नेह गदगदित हो गया.
दोनों होटल में दाखिल हुए. खाली टेबल देखकर स्नेह ऊस ओर आगे बढ़ा. यह देखकर श्रद्धा ऊस का हाथ पकडकर फैमिली रूम में ले गईं. यह देखकर स्नेह चकित सा रह गया.
" स्नेह! मैं तुम्हारे साथ दुनिया के कोई भी कौने में सुरक्षित हूं. "
बैठते हुए स्नेह ने केक और मैंगोला का ओर्डर दिया.
स्नेह अपने दिल की बात शेयर करना चाहता था.. उसी लिये वह उसे चाय के बहाने होटल में ले गया था. श्रद्धा को इस बात की भनक लग़ गईं थी.
" बोलो क्या बात है? श्रद्धा ने केक का टुकड़ा मुंह में डालते हुए सवाल किया.
" कैसे शुरू करू? " स्नेह अवढव में था. उसे चूप देखकर फिर से सवाल किया और स्नेह की आंखे छलक उठी.
यह देखकर श्रद्धा अस्वस्थ हो गईं. स्नेह अतीत की यादों को लेकर परेशान था. यह सोचकर ऊस ने स्नेह के आंसू को पोंछते हुए सांत्वन दिया.
" स्नेह! अब अतीत से बाहर निकल आओ. जो कुछ हुआ है उसे बदला तो नहीं जाता. ऐसी बातों को याद कर के क्या फायदा? मैं आज के स्नेह की रग रग से वाकिफ हूं. "
" श्रद्धा तुम कितनी अच्छी हो? मुझ पर विश्वास रखने वाली बहन को कैसे अँधेरे में रख सकता हूं? अब से मैं फिर अकेला हो जाऊंगा. अतीत की याद मुझे घिर लेगी. मैं कैसे ऊस का सामना करूंगा? श्रद्धा मैं किस से मेरी बातें शेयर करूंगा? खुशी के मौके पर भी आंसू निकल आते है. वही बताता है आदमी कितना मतलबी है?
" स्नेह! हमारे घर के दरवाजे सदैव तुम्हारे लिये खुल्ले है. हम दोनों तुम्हारे साथ है. मेरी ओफिस में भी तुम आ सकते हो. "
" श्रद्धा मैं लाख चाहे बुरा हूंगा लेकिन तेरी संगत में सब कुछ बदल गया है.. तुम स्नेह और करुणा की मुरत हो. "
" क्या मेरी प्रशंसा करने के लिये मुझे होटल में ले आये हो? "
मैंगोला का अंतिम घूंट गले में उतारते हुए श्रद्धा उठ खड़ी हुई. तुरंत दोनों फेमिली रूम से बाहर आये.. श्रद्धा जल्दी से काउंटर पर पहुंच गईं. पर्स खोलकर बिल चुकाने की कोशिश की. लेकिन स्नेह ने उसे रोकते ख़ुद बिल का भुगतान कर दिया. और दोनों होटल से बाहर आये.
रास्ते में दोनों खामोश थे. दिल पर भारी बोज था. कोशिश करने के बावजूद कुछ बात नहीं हो पाती थी.
स्टेशन पहुंच कर लेडीज़ कंपार्टमेंट में श्रद्धा को बिठाते हुए स्नेह कर दिल भर आया. ऊस की आंखो में आंसू उभर आये. यह देखकर श्रद्धा ने अपने रुमाल से ऊस के आंसू पोंछ दिये.
सिग्नल मिलते ही गाड़ी शुरू हो गईं. कोलाहल में एक धीमी आवाज ऊस के कानों से टकराई.
" गुड़ बाय! "
ऊस के बाद दोनों की राहे बदल गईं. फिर भी नियमित तौर से दोनों श्रद्धा के घर में मिलते थे.
यकायक श्रद्धा बीमार हो गईं. ऊस की बीमारी का नाम सुनकर स्नेह कांप उठा.
' पेट का अल्सर ' बीमारी ने उसे छू लिया था.
यह दुनिया की दस जीवलेन बीमारी में शामिल थी.
डोक्टर की बात सुनकर श्रद्धा का पति प्रभु भी भयभीत हो गया. ऊस ने पानी की तरह खर्चा किया लेकिन बीमारी सुधरने का नाम नहीं लेती थी.
ज़ब कोई दवाई काम नहीं आती तब प्रार्थना एक ही विकल्प होता है. स्नेह ने ऊस के लिये दिन रात प्रार्थना की और श्रद्धा की बीमारी दुम दबाकर भाग गईं.
प्रभु ने टेलिफोन पर जानकारी दी.
" कौन स्नेह? मैं प्रभु बोल रहा हूं. तुम्हारी प्रार्थना रंग लाई.. तुम्हारी बहन श्रद्धा बिल्कुल ठीक हो गईं. "
यह सुनकर स्नेह ख़ुशी से झूम उठा.
" शाम को मिलने आता हूं. " कहकर ऊस ने फोन काट दिया.
लेकिन होता वही है जो मंजूरे खुदा होता है.
शाम को घर जाकर मीना को साथ ले जाना ऊस ने तय कर लिया था. लेकिन ऊस की इकलौती बेटी बीमार हो गईं थी. यह देखकर स्नेह भयभीत सा हो गया. क्या भगवान ऊस के बदले में अपनी बेटी को तो नहीं छिन लेगा? इस ख्याल से ऊस को पसीना छूट गया.. डोक्टर के कहने पर स्नेह अपनी बेटी को अस्पताल ले गया था.
वह नहीं आया था. यह सोचकर श्रद्धा और प्रभु भी परेशान हो रहे थे. प्रभु ने सामने से स्नेह को फोन किया था. हकीकत जानकर दोनों परेशान हो गये थे.
दूसरे दिन श्रद्धा स्नेह की बेटी को मिलने के लिये बेताब हो रही थी. वह काफी अस्वस्थ दिखाई दे रही थी.यह देखकर बोस ने सवाल किया :
" क्या बात है मिसिस श्रद्धा? "
" कुछ भी नहीं सर! "
" जरूर कोई बीमार है. "
" सर मेरे भाई की बेटी बीमार है. "
" तुम्हारे भाई? तुम्हारा तो कोई भाई नहीं है. "
" सर! स्नेह शरमा भले खून के रिश्ते में मेरा भाई नहीं है लेकिन दिल के रिश्ते में मेरा भाई है. "
" ओह! आई एम सोरी. तुम्हे अच्छी नौकरी दिलाने के लिये ऊस ने काफी परिश्रम किया था. "
" सर! इतना ही नहीं. मुझे ऊस ने कदम कदम मेरा पूर्ण सहयोग दिया है. ऊस की प्रार्थना ही तो मुझे मौत से बाहर ले आई थी. "
" मिसिस श्रद्धा.. यु केन गो.. इस समय उसे तुम्हारी ज्यादा जरूरत है. "
" थैंक्स सर. "
" यह तो मेरा कर्तव्य है. श्रद्धा स्त्री पुरुष के रिश्ते को गलत नजरों से देखकर मैंने बहुत बड़ी ठोकर खाई है. मेरी बीवी भी एक पुरुष को अपना भाई मानती थी. मैंने ऊन के रिश्तों पर संदेह किया., और ऊस ने विष पान कर के अपने आप को खतम कर दिया.. मेरी भूल का प्रायश्चित करने में है. "
ऊस ने प्रभु को फोन किया. और ओफिस से बाहर निकल गईं..
दोनों अस्पताल के दरवाज़े पर मिले.
दो दिन दो रात काफी यातना में गुजर गये.
तीसरे दिन ऊस अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया.
शाम को श्रद्धा और प्रभु स्नेह की बेटी को मिलने घर गये.
प्रभु के हाथों में ' combo ' देखकर ऊस ने उसे छिन लिया और ' आइसक्रीम मौसी ' कहकर श्रद्धा को लिपट गईं.
यह नजारा देखकर स्नेह और मीना बहुत भावुक हो गये.. दो परिवार के बीच की आत्मीयता देखकर धीरज भी चकित रह गया. ऊस ने तहेदिल से स्नेह की मांफी मांगी.
" स्नेह! प्लीझ मुझे माफ करना. श्रद्धा को पराई समजकर मैंने ऊस के लिये कुछ भी नहीं किया.. ऊस की नौकरी को लेकर तुमने जो परिश्रम उठाया है. यह देखकर मैं पुलकित हो गया हूं. तुम्हारे दिल में मेरे लिये कैसी छबि अंकित हुई है. उसे मैं कैसे मिटा सकूंगा? "
" इस दुनिया में कोई किसी के लिये कुछ नहीं करता. यह छबि मिटाने की कोशिश करूंगा. "
इतना कहकर ऊस ने श्रद्धा की बेटी के हाथों में फलो की टोकरी रख दी.
0000000000 ( क्रमशः )