Rajedu's last bell in Hindi Adventure Stories by Narendra Garuwa books and stories PDF | राजेड़ू की आखिरी घंटी

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राजेड़ू की आखिरी घंटी

राजस्थान के एक सुदूर गाँव राजेड़ में एक पुरानी, वीरान और झाड़ियों से घिरी हुई इमारत खड़ी है। दीवारें जर्जर हो चुकी हैं, छतें जगह-जगह से गिरी हुईं, और हर कोने में सन्नाटा पसरा हुआ है। लेकिन जो लोग वहां से गुजरते हैं, वे कहते हैं कि कभी-कभी रात को उस खंडहर से घंटी की आवाज़ आती है। एक बूढ़ी सी आवाज़ सुनाई देती है – “बच्चो, किताबें खोलो, आज का पाठ शुरू करते हैं।”

यह कोई आम इमारत नहीं थी, यह थी राजेड़ प्राइमरी स्कूल – कभी इस गाँव का गौरव। और इसी स्कूल से जुड़ी है एक रहस्यमयी कहानी, जो आज भी लोगों के रोंगटे खड़े कर देती है।


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मास्टर जगदीश जी – गाँव का दीपक

मास्टर जगदीश प्रसाद शर्मा, जिन्हें बच्चे प्यार से “गुरुजी” कहते थे, इस स्कूल के प्रधानाचार्य थे। लंबा कद, सफेद झक धोती-कुर्ता, माथे पर चंदन का टीका और हाथ में एक पुरानी सी छड़ी। उनकी आँखों में कठोरता थी, पर दिल में असीम ममता।

जगदीश जी का मानना था कि शिक्षा केवल किताबों से नहीं, आत्मा से दी जाती है। वे सुबह सबसे पहले स्कूल आते और आखिरी में जाते। गाँव वालों की नज़रों में वे शिक्षक नहीं, बल्कि गुरु थे। स्कूल की हर ईंट में उनका पसीना और मेहनत बसी थी।


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भागुराम का आगमन

एक दिन स्कूल में एक नया छात्र दाखिल हुआ – भागुराम। उम्र में तो दस साल का लगता था, पर उसके बात करने का तरीका, आंखों की गंभीरता और चाल में कुछ अलौकिक सा था। कोई नहीं जानता था कि वह कहाँ से आया है। न तो उसके साथ कोई अभिभावक था, न कोई दस्तावेज़। लेकिन मास्टर जी ने बिना सवाल किए उसे दाखिला दे दिया।

भागुराम चुपचाप रहता था, पर पढ़ाई में अव्वल। गणित के जटिल सवाल, विज्ञान की प्रयोगशाला की कठिनियाँ, संस्कृत के श्लोक – सब कुछ ऐसे हल कर लेता, जैसे ये सब पहले ही जानता हो। लेकिन जैसे-जैसे वह स्कूल में घुलने लगा, अजीब घटनाएं भी शुरू हो गईं।


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रहस्य का जन्म

पहली घटना हुई गणित की परीक्षा के दिन – बोर्ड पर सारे सवाल खुद-ब-खुद हल हो गए। छात्र डर गए, मास्टर जी ने चॉक फेंक कर मिटाया, लेकिन सवाल फिर से उभर आए। किसी ने कहा, “भूत प्रेत का काम है।”

फिर एक दिन विज्ञान प्रयोगशाला में रसायनों में अपने आप प्रतिक्रिया शुरू हो गई, और बिना किसी कारण हल्की सी आग लग गई। और फिर... एक दिन पुस्तकालय की सारी किताबें हवा में उड़ने लगीं और खुलकर अपने-आप पढ़ने लगीं।

गाँव में खलबली मच गई। कुछ लोग बोले, “ये लड़का शैतान है।” तो कुछ कहने लगे, “ये कोई ऋषि का पुनर्जन्म है।”


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मास्टर जी की जिज्ञासा

मास्टर जगदीश जी को भागुराम में कुछ अनोखा दिखता था। वे डरते नहीं थे, बल्कि समझना चाहते थे। एक शाम, जब स्कूल खाली था, मास्टर जी ने भागुराम को बुलाया और पूछा, “बेटा, तुम कौन हो? और क्या इन घटनाओं का कोई संबंध तुमसे है?”

भागुराम ने पहली बार मास्टर जी की आंखों में देखा। उसकी आँखों में गहराई थी, जैसे किसी गुफा में समुंदर छुपा हो।

"गुरुजी," भागुराम बोला, "मैं वहाँ से आया हूँ जहाँ ज्ञान समय की सीमा से परे है। मुझे भेजा गया है यह देखने कि क्या मनुष्यों ने अब भी ज्ञान को समझा है या उसे सिर्फ परीक्षा की चीज़ बना दिया है। पर यहां... यहाँ तो किताबें हैं, पर जिज्ञासा नहीं। शिक्षक हैं, पर समर्पण नहीं।"

मास्टर जी स्तब्ध थे। उन्होंने आगे पूछा, "तो अब क्या होगा?"

भागुराम बोला, "अब यह विद्यालय बंद करना पड़ेगा। जब तक शिक्षा का अर्थ फिर से जीवित नहीं होता, तब तक यह स्थान चुप रहेगा। लेकिन मैं लौटूंगा… जब किसी मासूम बालक की आंखों में फिर से सच्ची सीख की चमक दिखेगी।"


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अंत की शुरुआत

अगले दिन सुबह जब स्कूल खुला, तो मैदान में अजीब सा सन्नाटा था। मास्टर जी ने देखा – स्कूल की घंटी टूटी हुई ज़मीन पर पड़ी थी। भागुराम गायब था। उसकी किताबें, बैग, और उसकी जगह खाली पड़ी थी।

दीवार पर खून से नहीं, पर किसी अदृश्य रोशनी से लिखा था:

"ज्ञान जब बोझ बन जाए, तो मंदिर भी खंडहर बन जाते हैं।"
"मैं फिर लौटूंगा, जब गुरु और शिष्य दोनों फिर से जाग्रत होंगे।"

उस दिन के बाद स्कूल को बंद कर दिया गया। मास्टर जगदीश जी ने कभी फिर किसी को नहीं पढ़ाया। वे अकेले ही उस खंडहर के पास रहने लगे। कहते हैं, वे अब भी सुबह उठकर स्कूल की सफाई करते हैं, और घंटी बजाते हैं… मानो भागुराम कभी भी लौट सकता है।


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आज का राजेड़

आज जब कोई उस खंडहर के पास से गुजरता है, तो कभी-कभी हवा में किताबों के पन्ने पलटने की आवाज़ आती है। और अगर किस्मत हो, तो रात को मास्टर जी की धुंधली परछाईं स्कूल के बरामदे में टहलती दिखती है, जैसे वे किसी का इंतज़ार कर रहे हों।

कई लोग कहते हैं, उन्होंने एक बालक को वहां देखा है, जो अकेले बैठकर पढ़ाई कर रहा होता है – बिल्कुल वैसा ही जैसा भागुराम था।


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अंत या शुरुआत?

कहानी खत्म नहीं हुई है। ये तो बस एक विराम है। क्योंकि ज्ञान कभी मरता नहीं… वो बस मौन हो जाता है, तब तक के लिए जब तक कोई फिर से उसकी पुकार न सुन ले।

तो अगली बार जब आप किसी पुरानी, वीरान इमारत के पास से गुजरें… कान लगाकर सुनिए। शायद कोई कह रहा हो –
"गुरुजी, आज का पाठ शुरू करें?"