DASHANAN KI PEEDA in Hindi Spiritual Stories by उषा जरवाल books and stories PDF | दशानन की पीड़ा

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दशानन की पीड़ा

लंका का आकाश धुएँ से भर चुका था। अशोक वाटिका जलकर राख हो रही थी, और हवाओं में जलते वृक्षों की गंध तैर रही थी। सोने की लंका, जिसे रावण ने अपनी शक्ति और बुद्धिमत्ता से संजोया था, आज विनाश की आहट से काँप रही थी।

रावण अपने महल की सबसे ऊँची मीनार पर अकेला खड़ा यह सब देख रहा था। उसकी आँखों में क्रोध था, परंतु कहीं भीतर एक अजीब-सी बेचैनी थी। यह वही लंका थी, जिसका वह अभिमान करता था, पर आज उसे पहली बार यह वैभव व्यर्थ लगने लगा था।

"स्वामी, क्या आप चिंतित हैं?" पीछे से मंदोदरी की आवाज़ आई। वह धीरे-धीरे उसके पास आई और बोली, "आप थके हुए लग रहे हैं। क्या हम इस विनाश को रोक नहीं सकते?"

रावण हँसा— एक दर्द भरी हँसी।

"रोक सकते थे, मंदोदरी… यदि मैंने समय रहते अपने अहंकार को छोड़ दिया होता।"

मंदोदरी ने उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश की। यह वही दशानन था, जिसने देवताओं तक को पराजित किया था, जिसने शिव को प्रसन्न करने के लिए अपना शीश काटकर चढ़ा दिया था। पर आज उसकी आँखों में एक अलग ही दर्द था।

"तो अभी भी देर नहीं हुई है, प्रभु। आप सीता को लौटा दीजिए। यह युद्ध टल सकता है।"

रावण ने मंदोदरी की ओर देखा। उसके भीतर के दसों सिरों में विचारों का संग्राम छिड़ गया।

एक सिर बोला—"मैं महान योद्धा हूँ! क्या मै  यूँ ही समर्पण कर दूँ?"

दूसरा फुसफुसाया—"पर क्या यह युद्ध धर्म का है?"

तीसरा गरजा—"मैं लंकेश हूँ! किसी के आगे झुकना मेरी शान के खिलाफ है!"

चौथा सिर दर्द में डूबा—"पर मंदोदरी सही कह रही है। क्या हमने अपने ही राज्य को विनाश के द्वार पर नहीं ला खड़ा किया?"

रावण ने एक गहरी साँस ली और बोला, "अब यह युद्ध टल नहीं सकता, मंदोदरी। राम कोई साधारण पुरुष नहीं, स्वयं विष्णु हैं। और मेरा अंत अब निश्चित है।"

मंदोदरी की आँखों में आँसू आ गए। "तो फिर आप युद्ध में क्यों जा रहे हैं, स्वामी? अगर आप सत्य जानते हैं, तो स्वयं को बचाइए।"

रावण मुस्कुराया, लेकिन उसकी मुस्कान में अब वह अभिमान नहीं था। "क्योंकि यह युद्ध मेरा ही रचा हुआ है, मंदोदरी। अब इससे पलटना पराजय नहीं, कायरता होगी।"

फिर वह धीरे-धीरे महल के द्वार की ओर बढ़ने लगा। मंदोदरी उसे रोकना चाहती थी, लेकिन अब कोई शब्द रावण को रोक नहीं सकते थे।

रथ तैयार था। रावण ने अंतिम बार अपने महल की ओर देखा। वह जानता था कि अब वह वापस नहीं लौटेगा।

रणभूमि में पहुँचते ही उसने आकाश की ओर देखा। तो बादलों के पीछे से सूरज झाँक रहा था, मानो इस युद्ध के अंत का साक्षी बनने आया हो।

"हे प्रभु शिव! आपने मुझे अपार बुद्धि और शक्ति दी, पर मैं अपने ही अहंकार का शिकार हो गया।"

वह समझ चुका था कि यह युद्ध केवल राम और उसके बीच नहीं था। यह युद्ध धर्म और अधर्म का, अहंकार और विनम्रता का, अज्ञानता और सच्चे ज्ञान का था।

उसने धनुष उठाया और गर्व से मुस्कुराया।

"आज मैं अपने अंत की ओर नहीं जा रहा, मैं अपने अहंकार का संहार करने जा रहा हूँ।"

रावण का अंत निश्चित था, परंतु आज वह केवल पराजित होने नहीं, बल्कि स्वयं को मुक्त करने जा रहा था।

इस तरह रणभूमि में दशानन का पतन हुआ और  उसके साथ ही उसका अहंकार भी समाप्त हो गया। इतिहास में वह केवल एक दानव नहीं, बल्कि एक ऐसा ज्ञानी भी बना, जिसने अंततः सत्य को स्वीकार किया और लक्षमण को ज्ञानदान भी दिया ।

 

 

 
 उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’