महाराज अपने कक्ष में तैयार हो रहे हैं तभी एक सेवक उनके कक्ष में आता हैं।
सेवक : " महाराज कि जय हो ! कवि कुलभूषण आपसे मिलने आए हैं।"
महाराज सेवक को देखते हुए " ठीक है कविराज कुलभूषण को हमारे कक्ष में भेज दीजिए।"
फिर सेवक कवि कुलभूषण को महाराज के कक्ष में ले आता है।
महाराज कवि कुलभूषण को देखते हुए कहते हैं-" आईए कविराज बिराजिए।"और अपने सामने आसन की ओर संकेत करते हैं ।
कवि कुलभूषण आसन पर बैठकर कहते हैं :" प्रणाम महराज हम चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य की जीवनी पर एक पुस्तक लिखना चाहते हैं कृपया करके आप इस कार्य में हमारी सहायता करें और हमें उनके जीवन के बारे में बताइए ।"
महाराज :- (मुस्कुराते हुए) " ठीक है कविराज हम आपकी इसमें अवश्य सहायता करेंगे। "
फिर महाराज कविराज कुलभूषण को, चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के जीवन में जो भी घटित हुआ था वह एक-एक करके सारी घटनाएं बताते हैं और कवि कुलभूषण महाराज से सुनकर लिखते जाते हैं।
( जैसे-जैसे आप आगे कहानी पढ़ेंगे आपको सब पता चल जाएगा कि ये महाराज कौन है और उन्हें सम्राट विक्रमादित्य के जीवन के बारे में कैसे पता है।)
महाराज :-
यह कहानी है दसवीं शताब्दी में उत्तर भारत में स्थित समृद्ध राज्य इंद्रप्रस्थ की जहां के हर इंद्रवंशी के रोम -रोम में जीतने का साहस भरा हुआ है। वही आज महाराज अमरेंद्र सिंह ने एक प्रतियोगिता का आयोजन किया है जिसमें भारत के अनेकों राज्यों के राजकुमार भाग लेने के लिए उपस्थित हुए हैं , वहीं दूसरी ओर तो कईं भारत के बाहर के भी राजकुमार भी प्रतियोगिता में शामिल हुए हैं। सारे राज्यों के राजकुमारों का शामिल होने का पहला कारण यह है कि:-
इंद्रप्रस्थ एक प्रगतिशील और महान राज्य है जो कि अपने आप में एक बहुत ही विशाल है , जिस पर आक्रमण करने से पूर्व हर एक राजा सौ बार सोचता है अथवा शांति प्रस्ताव ही रखता है । यहां पर अपना साहस दिखाना अपने आप में बहुत बड़ी बात है ,, और दूसरा कारण यह है कि इस प्रतियोगिता का पुरस्कार एक अद्भुत श्वेत रंग का अश्व है जो कि विश्व का सबसे साहसी और तीव्र घोड़ा है , जो चीते की तरह तेज दौड़ता है और ऊंची ऊंची छलांग लगाने में पारङ्गत है। यह प्रतियोगिता इंद्रप्रस्थ की सबसे बड़े क्षेत्र अजय क्षेत्र में रखी गई है ,,, जहां पर उत्तर की ओर महाराज अमरेंद्र सिंह अपने सिंहासन पर विराजमान है जो की जमीन की सबसे ऊंची सतही पर लगाया गया है। उनकी बाई ओर महामंत्री शिवराय विराजमान है और महेंद्र सिंह जी ( महाराज वहीं उनकी दाएं ओर कुलगुरु विराजमान है,,, कुछ दूरी पर सेनापति भीमसेन खड़े हुए हैं और प्रतियोगिता की तैयारी का जायजा ले रहे हैं । वहीं पूर्व की ओर राजवंशी महिलाओं के लिए अलग से बैठने की व्यवस्था की गई है ,,,,वहीं दक्षिण की ओर प्रजा विराजमान है और पश्चिम की ओर सारे राजकुमारों की बैठने की व्यवस्था की गई है । प्रतियोगिता यह है कि राजकुमार को घोड़े पर सवार रहते हुए ही सामने लाल झंडे पर निशाना साधना होगा और तीन तीर एक साथ निशाने पर तीन बार लगाने होंगे।
महाराज अमरेंद्र सिंह अपनी रोबधार आवाज में कहते हैं - " हम आप सभी राजकुमारों का हृदय सहित स्वागत करते हैं आशा करते हैं कि यहां उपस्थित हर एक राजकुमार में योग्यता होगी जो इस प्रतियोगिता के चरण को पार कर सके ।"
महामंत्री ने शंख बजा के प्रतियोगिता का आरंभ किया ,उसी समय ढोल - नगाड़े बजने लगे। तो सबसे पहले राजकुमार उदय सिंह ,जो की प्रतापगढ़ राज्य से है ,,महाराज के आगे आते हैं । उनका अभिवादन करते हैं और पूरे उत्साह के साथ तूणीर में से तीर निकालते है और निशाना साधते हैं। किंतु दूर्भाग्य से उनका एक ही बाण झंडे पर लग पाता है और वो यह प्रतियोगिता हार जाते हैं ।
फिर राजकुमार जय प्रताप राजसमंद राज्य से,,, महाराज के सामने आते हैं और अभिवादन करते हैं और अपना निशाना साधते हैं , परंतु दुर्भाग्य से उनका एक भी तीर झंडे को छू भी नहीं पता है।
फिर अवंतीपुर के राजकुमार राघव सिंह प्रतियोगिता क्षेत्र में आते हैं और महाराज के सामने सर झुककर अभिवादन करते हैं और निशाना साधते हैं पर दुर्भाग्य से उनका पहला तीर ही झंडे के ऊपर से निकल जाता हैं।
ऐसे करते-करते कई राजकुमार अपना साहस दिखाते हैं, पर एक भी प्रतियोगिता को पार नहीं कर पाता । दिन का तीसरा पहर शुरू होने वाला था, पर प्रतियोगिता को किसी ने भी पार नहीं किया था ।अब बारी थी राजकुमार वीरेंद्र की,जो कि स्वयं महाराज के पुत्र हैं । महाराज के सामने आते हैं । (उम्र चौबीस साल , लंबाई सात फुट है, तीखे नैन - नक्श गेहूंवा रंग ,, दिखने में किसी देवता से कम नहीं है ।)
वह प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति लेते हैं और वही दूर से अपनी माँ यानी महारानी सुनैना को प्रणाम करते हैं। फिर वह अपना निशाना साधते हैं और उनका दूसरा बाण सटीक निशाने पर लगता है जिसके कारण प्रजा में रोमांच उमड़ आता है और महाराज गर्व से भर जाते हैं और उन्हें लगने लगता है कि राजकुमार वीरेंद्र ही प्रतियोगीता जीतेंगे वही महारानी सुनैना अपने पुत्र की दूर से ही बलाईयां लेती है , किंतु जब राजकुमार वीरेंद्र तीसरी बार निशाना लगाते हैं तब तीर झंडे के बगल से निकल जाता हैं । जिसके कारण राजकुमार वीरेंद्र प्रतियोगिता हार जाते हैं।
उनके अंदर प्रतियोगिता हार जाने का क्रोध पल्लवित हो जाता है और वह हार और पश्चाताप के मिले झूले भावों को लेकर अपने स्थान पर बैठ जाते हैं। फिर राजकुमार विक्रमादित्य जो की महाराज के छोटे भाई महेंद्र सिंह के पुत्र हैं और राजकुमार वीरेंद्र से बड़े हैं (आयु पच्चीस साल ,,, लंबाई सात फुट, एक बार अगर कोई इन्हें देख ले तो इन पर पहली बार में ही मोहित हो जाए, गहरी काली आंखें, तीखी नाक, सांवला रंग, इनको देखकर तो कामदेव भी शर्मा जाए। ) वो महाराज के सामने आते हैं और प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति लेते हैं। कूल गुरु ,महारानी सुनैना और अपने पिता को भी दूर से प्रणाम करते हैं, और भगवान भोलेनाथ को अपने मन में प्रणाम करते हैं और आशीर्वाद लेते हैं।
भगवान भोलेनाथ को ध्यान में रखते हुए वह अपना पहला निशाना साधते हैं और उनका निशाना इतना। तीव्र और सटीक था की एक बार को तो सभी को समझ ही नहीं आता कि क्या हो गया , पर फिर सब ने देखा कि तीनों तीर झंडे पर है तो , प्रजा ने तालियों की बौछार कर दी और राजकुमार विक्रमादित्य के नारे लगने लगे,,,, महाराज और महारानी भी जो राजकुमार वीरेंद्र के हारने के कारण दुखी हो चुके थे वह भी अब बहुत प्रसन्न लग रहे थे ।
जैसे ही राजकुमार विक्रमादित्य प्रतियोगिता जीतते हैं तो डोल नगाड़े बजने लगते हैं और नारे लगने लगते हैं : राजकुमार विक्रमादित्य की जय हो!!! राजकुमार विक्रमादित्य की जय हो!!!राजकुमार विक्रमादित्य ने मन ही मन भगवान भोलेनाथ का धन्यवाद किया ।
महाराज अमरेंद्र सिंह - " हम राजकुमार विक्रमादित्य की तीव्रता और प्रतियोगिता में दिखाए गए प्रदर्शन से बहुत खुश हैं हम राजकुमार विक्रमादित्य को प्रतियोगिता जीतने की बधाई देते हैं। "
राजकुमार विक्रमादित्य महाराज के चरण स्पर्श करते हैं महाराज उनके सिर पर हाथ रखते हैं और आशीर्वाद देते हैं - "सदा चेतना से भरपूर रहो।"फिर राजकुमार विक्रमादित्य कुलगुरु के चरण स्पर्श करते हैं तो कुलगुर उन्हें आशीर्वाद देते हैं - " आयुष्मान भव"
फिर महारानी सुनैना के चरण स्पर्श करते हैं । महारानी सुनैना उनके गालों पर अपने दोनों हाथ रखती है और कहती है -" पुत्र हमें तुम पर बहुत गर्व है तुमने हमारे पूरे राज्य को गौरवान्वित किया है । मातारानी हमेशा तुम्हारे ऊपर कृपा बरसाती रहे। "
राजकुमार वीरेंद्र नाखुश थे अपनी हार से और राजकुमार विक्रमादित्य की जीत जाने से तो वह जल्दी से प्रतियोगिता स्थल से चले जाते हैं। कुछ समय बाद राजकुमार विक्रमादित्य , राजकुमार वीरेंद्र को तलाशते हैं पर उन्हें वह कहीं दिखाई नहीं देते।
फिर राजकुमार विक्रमादित्य को इनाम दिया जाता है जो की एक श्वेत रंग का घोड़ा था पर इस घोड़े की खास बात थी कि यह अपने स्वामी को खुद चुनता था और आसानी से किसी के काबू में नहीं आता था। जैसे ही राजकुमार विक्रमादित्य घोड़े के पास जाते हैं तो ,घोड़ा जोर से हिनहिनाता है और ऊंची ऊंची छलांग लगाने लगता है। एक बार को तो विक्रमादित्य भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं कि कोई घोड़ा भी इतनी ऊंची छलांगे लगा सकता है।
अब तो राजकुमार विक्रमादित्य को भी घोड़े को देखकर धुन सवार हो चुकी थी ,, कि वह इस घोड़े को काबू में करके ही रहेंगे। वह बड़ी तीव्रता से घोड़े के ऊपर चढ़ जाते हैं जब घोड़े को एहसास होता है कि उसके ऊपर कोई चढ़ चुका है तो वह बहुत तेज दौड़ने लगता है और बेकाबू हो जाता है। अचानक हुए इस हादसे से घोड़ा अपनी दिशा बदल देता है और राजसी महारानियों के हिस्से में चल जाता है।
शीघ्र ही राजकुमार घोड़े की लगाम खींचते हैं और घोड़े को दूसरी तरफ कर लेते हैं। घोड़ा बहुत ऊंची ऊंची छलांगे लगाता है ताकि राजकुमार उसके ऊपर से हट जाए पर राजकुमार टस से मश नहीं होते,, अब तो थक कर घोड़ा भी अपनी रफ्तार कम कर लेता है।
जैसे ही राजकुमार को लगता है कि घोड़ा थक चुका है तो राजकुमार घोड़े के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हैं। तो घोड़ा अपना सर झुका लेता है मतलब वह कहना चाहता है कि राजकुमार विक्रमादित्य को उसने अपना मालिक मान लिया है।
राजकुमार विक्रमादित्य:- घोड़े को प्यार से कहते हैं कि तुम आसमांन को छूने कि चाह रखते हो, और तो तुम इतनी ऊंची - ऊंची छलांग लगाते हो । इसलिए आज से तुम्हारा नाम अंबर है। घोड़ा नाम सुनकर खुशी से हिनहिनाता है जब सबको यह लगता है कि घोड़े को राजकुमार ने काबू कर लिया है तो सब की जान में जान आ जाती है और महाराज प्रतियोगिता समाप्त करने का आदेश देते हैं।
महामंत्री कुछ सैनिकों को,, जो घोड़े ने विनाश किया था उसको वापस व्यवस्थित करने के लिए कहते हैं।
महारानी सुनैना राजकुमार वीरेंद्र को ढूंढ रही थी तभी राजकुमार विक्रमादित्य आते हैं और महारानी से घोड़े के साथ सैर पर जाने की आज्ञा मांगते हैं।
तो चलिए देखते हैं आगे क्या होगा ?
कहाँ गए हैं राजकुमार वीरेंद्र?
क्या राजकुमार वीरेंद्र का क्रोध शांत हो पाएगा?
आगे जानने के लिए पढ़ते रहिए हमारी नोवेल "विक्रमसंहिता " सिर्फ पॉकेट नोवेल, मातृभारती, प्रतिलिपि और स्टोरीमिरर पर!! जिसे लिखा है अंजली साहू और सम्पादन (edit) किया है सुश्री कथाकार ने ।