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देश में सब तरफ आतंक छाया हुआ है. मर्द बेचारे थर थर कांप रहे हैँ. प्राचीन काल से आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ. अब तक जो अबला, बेचारी, आँचल में दूध किस्म की, सहमी, सकुचाई सी स्त्री थी वह अलोप हो गई. उसकी जगह स्त्री टु पॉइंट ओ आ गई है जो मर्द की भाषा और उसकी जुबान से भी चार कदम आगे है. वह नाचते हुए, प्यार से बतियाते हुए दूसरे मर्द के टुकड़े कर देती है. और ऊपर से भोली भाली मासूम बनती है.
कुछ मर्द तो बाकायदा चेतावनी देकर मरे यूट्यूब पर की भाइयों इनसे सावधान रहना, यह जान लेने जैसे हालात पैदा कर देती हैँ.
कुछ बिना चेतावनी के मारे गए. आपने पढ़ा होगा पाँचवी मंजिल से छलांग लगा ली, फला गुरु ने खुदकुशी कर ली अपनी रुपवती शिष्या के कारण,आधा आश्रम ही मांग रही थी. आइएएस ने गोली मारली खुद को, एक जगद्गुरु को तो विदेश में जेल की हवा खिला दी और आख़िरकार दो महंगी प्रॉपर्टी अपने नाम करके अब वह आराम से रह रही और बेचारे गुरु स्वामी स्वर्ग में.
स्त्री के कारण सदैव पुरुष और लड़कों से अन्याय हुआ. लड़का मार खाता, पिटता और लड़की तो दिल का टुकड़ा, नाजुक, कोमल, दूध की धुली. लडका लड़की दोनों को समान घर, सुविधा, पढ़ाई, खर्चा मिलता. चालीस साल से तो मैंने किसी भी घर में भेदभाव होते नहीं देखा. उलटे यह देखा की पिता, भाई तो कोल्हु के बैल की तरह जुते हुए और पत्नी, बेटी चैन की बंसी बजा रहीं. ऊपर से हवा चला दी इसकी ऐन उलट की हम मजबूर, बेबस और उपेक्षित तो सबकी सहानुभूति इनकी तरफ. विडंबना यह की पुरुष, कानून, पुलिस भी इनकी तरफ.
तो यह ज़ालिम बननी ही थीं, बनी और ऐसी बनी की आज मर्द नीले ड्रम में सीमेंट से पैक कर दिया और खुद योगा कर रही जेल में.
आप कहें यह तो कुछ, लाखों में एकाध होती होंगी हमारी वाली तो गाय है. बिलकुल है और सींग मारने को आतुर गाय है. यह सामान यहाँ क्योँ? वह मेज ख़राब कर दी से लेकर आज यह फ़िल्म तो वह सखी के बच्चे की पार्टी सब में जाती है.नहीं ले जाओ तो "घर का काम करते करते मैं खत्म हो रही हूं". अब पति बेचारा थका हारा और ऊपर से रास्ते मेँ सब्जी लेता हुआ आए और इनके साथ और जाए.साहित्य और सेमिनार में तो आप किसी भी शहर में कभी भी देख लो, श्रीमती जी काव्य पाठ कर रहीं, पेपर पढ़ रहीं, लंच ब्रेक में माइक के आगे फोटो निकलवा रही पति से. पति साहित्य और सेमिनार में काला अक्षर पर दो दिन तक लगातार झेल रहा विद्वानों के व्याख्यान को, बच्चों को बहला रहा क्योंकि स्त्री अपनी राह बना रही, आगे बढ़ रही पर, पुरुष के कंधे और दिल पर पैर रखकर.
समझो यह तो घरेलु स्त्रियों की बात है,कामकाजी को तो भूल ही जाओ, वह दस नहीं सौ कदम आगे आपकी सोच से भी.
तो अक्सर आप इनसे दो चार होते हैँ.जितना आप पुरुष प्रधान व्यवस्था कहते और सुनते हैँ उससे ज्यादा ही व्यवस्था महिला प्रधान होती है परन्तु हम मुर्ख पुरुषों की तरह कोई भी स्त्री चाहे वह पंद्रह की हो अथवा साठ की, गाती नहीं फिरती.बेचारा पुरुष हर तरफ से मारा जाता है.ऊपर से कोई भी, खुद उसके घरवाले भी उसके निर्दोष होने पर यकीन नहीं करते. क्या करे? किधर दुनिया मेँ जाए जहाँ उसकी भी बात हो? होती नहीं तो दो घूंट लगा लेता है. हर स्त्री जानती है की यह घूंट लगाकर आया है.वह होती खुश है की अब मेरे पीछे नहीं पड़ेगा पर दिखाती दूसरा गंभीर, गुस्से वाला चेहरा है. बेचारे मर्द भीगे बिल्लू ( बिल्ली का पुल्लिंग)की तरह पड़ जाता है गिल्ट मेँ. फिर इनकी मनोवल करने इनकी उलटी सीधी दस बातें पूरे हफ्ते मानता है.
ऊपर से इनके पास सदाबहार तीन हथियार हैँ. जो होते पुरुष के भी हैँ पर वह कभी इस्तेमाल ही नहीं कर पाता. कोई भी चीज इनके काबू से बाहर हुई झट से बच्चों का वास्ता. बेटी या बेटे से कह दूंगी की पापा ऐसा कहते हैँ. मम्मी से गंदी बात करते हैँ. पापा सर पकड़कर चुप. फिर कुछ रह गया तो कपड़े भरे अटेची मेँ और बच्चे का हाथ पकड़ा और चलीं मायके. जहाँ उसकी हर गलत, उलटी बात को शह देने वाले बैठे. हर ससुर दामाद को शक की निगाह से देखता भले ही शादी को बीस साल भी क्योँ न हो गए हो. पुरुष कौन से मायके जा सकता है? कहाँ सुनाए अपनी दुख भरी व्यथा? उससे भी दुखी बैठे दूसरे बंदे के पास जाए क्या? कोई मायका न ससुराल उसका. जमीन न आसमान उसका,बस जिसने चाहा, ससुर, सास,बीवी, पुलिस, कानून उसने ठोकर जमा दी. उसी घर मेँ पैदा हुआ, वही कूट कूटकर पढ़ाई की, वहीं शादी और वही चार दीवारें. कुछ तो इतनी ज़ालिम और सख्त होती हैँ की पुरुष से वह सुकून का घर भी छुड़वा देतीं हैँ कि हमारा अपना भी एक घर होगा. दो कमरों के डिब्बे जैसे फ्लैट की पुरुष इएमआई भरता है और यह राज करती पर फिर भी बेचारी और अबला.
और तो और पुरुष फूट फूटकर रोना चाहता, बेबसी बयां करना चाहता तो कर नहीं सकता. क्यों? क्योंकि तुम मजबूत और लोहे के बने. यह तो ऐसा ही है की मारे भी ज़ालिम और रोने भी न दे..
अगला हथियार दाम्पत्य संबंधो को अपनी मर्जी से नहीं निभाना. सदाबहार बहाने सर दुख रहा, थक गई, बच्चों का होमवर्क चल रहा रात के एक बजे तक. पुरुष कुछ कहे तो सुने यह की तुम्हे हर वक़्त यही सूझता है, तुम इसके बिना कुछ सोच नहीं सकते? हर वक़्त? भाई दिन भर काम का दबाब, दूसरी चिंताएं, सामाजिकता फिर महीने भर से बच्चे एक बजे तक पढ़ रहे, तुम्हारे उलटे सीधे धारावाहिक अब बोले भी नहीं पति? जबकि इन सब मेँ कोई अकेला पुरुष शामिल नहीं होता स्त्री भी उतनी ही होती है, विज्ञान ने सिद्ध किया है. पर फिर पुरुष को सबक और अपनी अहमियत कैसे दिखाई जाएगी?
पीड़ित पुरुषो ने जान दी, वीडियो बनाए और कुछ ने तो शादी के चालीस साल बाद साठ वर्ष की उम्र मेँ तलाक ले लिया. इतने दशक घुटता रहा, अब सारी जिम्मेदारी पूरी कर दी तो अब थोड़ा सा मैं भी जी लूँ. तो यह चल रही है उलटबांसी जिसे बहुत सूक्ष्म तरीके से देखने और समझने के बाद ही कोई कोई ही पकड़ पाता है की पीड़ित कोई और है और हल्ला कोई और मचा रहा.ऐसी है यह माया जिसके कारण ईसू ने विवाह नहीं किया, तो विष्णु जी समुन्दर और भोले बाबा कैलाश पर्वत पर विराजे, बुद्ध और महावीर ने राजपाट और घर छोड़ दिया. भटके जंगल जंगल. तो आपकी क्या हस्ती की इन स्त्रियों से पार भी पा सको.
यह खूबसूरत संबंध दोनों की समझदारी और इस ईमानदारी से चले की जो तुम्हे चाहिए बिना मांगे मैं दूंगी या दूंगा. और कोई भी छल नहीं.
पर क्या यह हो पाता है? पूछिए खुद से. कोई रास्ता भी नहीं है. आग का दरिया है और हे पुरुष, तुम्हे ही अपना सर्वस्व स्वाहा करना है.
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(संदीप अवस्थी, जाने माने लेखक और प्रेरक वक्ता हैँ. कई किताबें और देश विदेश से सम्मानित
सम्पर्क 7737407061,अजमेर, राजस्थान )