सूखे पेड़ की छाया
कहानी/ Sharovan
***नितिन ने अपने कालेज के समय से ही जिस खुबसूरत, प्यारी सी मौली को हृदय की धडकनों से बढ़कर चाहा, उसे प्यार किया और एक समय आने पर उससे विवाह करने का आमन्त्रण भी दिया, परन्तु ये उसकी किस्मत की लकीरों का फल ही था के एक मसीही युवती ने अपने परमेश्वर की सेवा को पहले सामने रख कर उसके आग्रह और निमन्त्रण को नकार दिया. परन्तु बाद में एक लम्बा अरसा बीत जाने पर जब ज़िन्दगी के किसी भटके हुए मोड़ पर नितिन को वही मौली फिर से मिल गई तो वह उसके बदले हुए रूप को देख कर उसे पहचान भी नहीं सका. लेकिन फिर भी उसने अपने अतीत की यादों को ताजा रखते हुए मौली को जब वही विवाह का आमन्त्रण फिर से दिया तो मौली की ख़ामोशी ने उसके उजड़े हुए चमन में उम्मीदों के चार फूल खिला दिए तो वह खुशी से फूला नहीं समा सका. फिर जब वह इन्हीं फूलों की महक में सराबोर होकर अपने चार वर्षीय पुत्र रिक्की के साथ मौली का हाथ थामने पहुंचा तो मौली की खुशियों के द्वारा उगे हुए पुष्पों को बटोरने के लिए उसके हाथ काँप क्यों गये?
***
खुशियों में झूमते हुए नितिन के कदम जैसे ही मसीही कम्पाउंड के करीब आये तो चर्च के रुक रुक कर बजते हुए घंटों की आवाजें सुनकर उसके कान हतप्रभ रह गये. रविवार का दिन था, मसीहियों की आराधना का समय हो चुका था. चर्च के थम थम के बजते हुए घंटो का स्वर बढ़ने के बजाय ठंडा पड़ गया था. इस प्रकार से ठहर-ठहर कर बजते हुए चर्च के घंटों का एक विशेष अर्थ होता है. आज फिर कोई प्यारा जन इस मायावी संसार की सारी मुहब्बतों से अपना नाता तोड़ कर उस देश की यात्रा को कूच कर गया था जिसकी चर्चा तो प्राय: करते सभी हीं हैं पर इंसानी जीवन में देखा किसी ने भी नहीं होता है.
'कौन हो सकता है ऐसा कि जिसने फिर किसी कब्रिस्थान की आरजुओं और मिन्नतों पर रहम किया हो?' ऐसा ही कुछ सोचते हुए नितिन के कदम स्वत: ही उग्रता में आगे बढ़ते गये. फिर उसने शीघ्रता में रिक्की को अपनी गोद से नीचे उतारा और उसको सम्बोधित करते हुए बोला कि,
'बेटा, जरा जल्दी तो चल. उसके इतना कहने ही भर से उसका पुत्र अपने छोटे-छोटे कदमों से उसके पीछे-पीछे जैसे भागने लगा.
नितिन एक गैर-मसीही युवक था. स्वभाव से एक लेखक और पत्रकार होने के कारण यूँ तो उसे अधिकतर सभी इलाकों की जानकारी रहती थी. यहाँ वह पहले भी कई बार आ चुका आ चुका था, परन्तु आज उसका आने का एक विशेष कारण था. आज वह किसी भी पत्रिकारिता के कार्य से नहीं आया
बल्कि आज उका एक एक व्यक्तिगत कार्य था. कार्य भी ऐसा कि आज उसके जीवन का कोई महत्वपूर्ण निर्णय होने वाला था.
रविवार का दिन और आराधना का समय होने के कारण भी मसीही लोगों का सारा हुजूम चर्च की इमारत की ओर न जाकर उसके पीछे बने हुए बिट्रिश अंग्रेजों के पुरातन कब्रिस्तान की ओर बड़ी ही मायूसी और उदासियों के बढ़ता जा रहा था. ये सब देख कर नितिन की रही-बची शंका का समाधान भी हो गया. उसे पूरा विश्वास हो गया कि अवश्य ही यहां पर किसी की मृत्यु हो चुकी है. इसी बीच उसने अपने पास में से गुज़रते हुए एक व्यक्ति से पूछ लिया. वह बोला कि,
'भाई साहब! आज किसकी मिट्टी उठने वाली है? '
'?' इस पर वह व्यक्ति पहले तो थोड़ी देर को ठिठका, फिर वह नितिन को गंभीरता से निहारता हुआ बोला कि,
'अफ़सोस की बात है, मिस मौली हम सभी को अकेला छोड़कर खुदा के पास चली गईं हैं. कल रात उनको अक्चानक ही दिल का भीषण दौरा पड़ गया था. '
'?'- खामोशी.
मौली की आकस्मिक मृत्यु की दुखद खबर सुनकर नितिन का तो जैसे दिल ही बैठ गया. अचानक ही उसका सारा मन और शरीर का कोना-कोना तक एक विषाद के ढेर सारे बादलों से भर गया. एक साथ ही उसके दिल में अतीत के तमाम सारे चित्र बने और चले भी गए. फिर टूटे मन से अपने दिल की उजड़ी हुई हसरतों और उदास कामनाओं की अचानक से सजी हुई अर्थी का बोझ संभाले हुए उसन मौली के अंतिम संस्कार भाग लिया और बेहद टूटे मन से अपने चार वर्षीय पुत्र रिक्की का हाथ संभाले हुए वापस ओपन घर आ गया.
घर के अंदर इतना शीघ्र कदम रखते हुए जब उसके घर का खाना बनाने वाली जस्सो ने अपने मालिक नितिन को देखा तो पल भर को वह भी आश्चर्य से शंकित हो गई, क्योंकि वह जानती थी की नितिन आज जिस कार्य के लिए उससे कहकर गया था उसके कारण उसका इतना शीघ्र वापस खाली हाथ आने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था. इसलिए उसने ना चाहते हुए भी नितिन से पूछ ही लिया. वह बोली की,
'बाबू जी, क्या बात है जो आप इतना जल्दी वापस आ गए? आप तो रिक्की बेटा के लिए उसकी मम्मी को लेने गए थे? '
'हाँ, गया था. '
'तो फिर लाये क्यों नहीं?'
'वह मुझसे पहले ही वापस चली गई. ' नितिन गहरी सांस लेता हुआ सोफे में ही धंस गया. नितिन की इस अप्रतियाशित बात पर जस्सो पहले तो किचिन में गई और जल्दी से उसने एक गिलास में पानी भरा और फिर नितिन को थमाते हुए बोली,
'बाबू जी, क्या मैं पूछ सकती हूँ की वे कहाँ चली गईं हैं? '
'अपने जीजस के चरणों में बड़ी ही शान्ति की नींद सो रही है वह. '
'?'- सुनकर जस्सो के भी दिल पर जैसे कोई पानी से भरा कांच का गिलास टूट पड़ा. इस प्रकार कि वह बड़े ही असमंजस और हैरानी के साथ नितिन का और कभी रिक्की का चेहरा ताकने लगी. पल भर में ही उसका सारा मुखड़ा एक अनकहे दर्द से भर गया. फिर थोड़ी देर पश्चात वह अपने उदास स्वरों में नितिन से बोलीकि,
'सब तकदीर के लिखे की बात होती है बाबू जी. सोच लीजिये कि आप और रिक्की बेटा के भाग्य में उनका सुख ही नहीं था. मैं तो अब यही कहूंगी कि अपने प्रभु का भजन कीजिये और अपन पुत्र का पालन कीजिये. यही सच्चे जीवन की सेवा है.'
जस्सो की इस बात पर नितिन कुछ भी नहीं बोला. वह चुप हो गया और बे-मन से अपने कमरे की दीवारों में अपने अतीत के उन चित्रों को ढूंढ़ने लगा जिनमें उसके जीवन के अब तक के जिये हुए दिनों का हरेक दर्द संजोकर भरा गया था. हांलाकि, नितिन इस तथ्य को समझता था कि संसार में जीवन और मरण तो इस दुनियां जीवनचक्र का ही एक रूप है. न जाने कितने अच्छे लोग प्रति दिन ही इस संसार से उठ जाते हैं. जिसने भी इस संसार में जन्म लिया होता है उसे एक न एक दिन तो यहां से कुछ करना ही है. यह ठीक है कि, आज मौली चली गई है, परन्तु जिन परिस्थितियों में मौली की अर्थी उठी थी वह सचमुच अपने आप में एक दुखद घटना थी. मौली को वह तब से जानता था जबकि वह उसके साथ ही पढ़ा करती थी. तब वे दोनों एक ही कक्षा के सहपाठी थे और सोनागिरि के एक कालेज में पढ़ा करते थे. इतना सोचते हुए स्वत: ही नितिन की आँखों के समक्ष उसके जीवन की वे घटनाएं और दिन एक चलचित्र के समान आने लगीं जिनमें उसके अतीत के दुःख और दर्द का जैसे सारा अफ़साना ही लिखा हुआ था . . .'
. . .अभी कुछ ही दिनों की ही तो बात है कि जब न जाने कितने अरसे के पश्चात उसकी अचानक से सब्जी मंडी में सब्जी खरीदते समय मौली से भेंट हो गई थी. पूरे सोलह वर्षों के पश्चात जब उसने मौली को यूँ अचानक से मौली को देखा था तो वह उसे पहली दृष्टि में पहचान भी नहीं सका था. समय की हवाओं ने न जाने कितने ढेर सारे चित्रों का हरेक रूप मौली के चेहरे पर सजा दिया था. कितना अधिक परिवर्तन आ चुका था मौली के इस रूप में? उसकी सूरत, खूबसूरती, उसकी वह ढेरों-ढेर चंचलताएं जो उसने कालेज के दिनों में मौली में देखीं थीं, सब की सब न जाने कहाँ जाकर विलीन हो गईं थीं? तीस वर्ष की अवस्था में ही वह किसी भी वृद्ध महिला से कम नहीं दिख रही थी.
वह जानता था कि मौली को किसी विदेशी ईसाई मिशनरी ने गोद लेकर अपनी पुत्री बनाकर पाला था, इसलिए वह आरम्भ से ही एक मसीही युवती थी. मिशनरी के यहां सुख और संम्पन्नता क नाम पर किसी भी वस्तु की कमी नहीं थी. मौली की तब समस्त इच्छाएं सहज ही पूर्ण हो जाया करती थीं. इसलिए जो लड़की सदैव ही हरेक प्रकार के सुख और सम्पन्नता में पली- बढ़ी हो साथ ही पढ़ी- लिखी और स्नातक भी हो, वह अचानक ही जीर्ण- शीर्ण अवस्था में एक प्रकार से अभावों में जूझती दिखे उसके लिए नितिन तो क्या किसी के लिए भी आश्चर्य करना बहुत स्वाभाविक ही था.
दोनों की भेंट का सिलसिला एक अजीब ही तरह से आरम्भ हुआ था. मौली सब्जी मंडी के अंदर एक दूकान से आलू खरीद रही थी. दुकानदार ने आलू इस प्रकार से उसके थैले में डाले थे कि उनमें से अधिकतर आलू थैले में न जाकर भूमि पर बिखर गए थे. नितिन भी तब उसके पीछे खड़ा आलू खरीदने की प्रतीक्षा कर रहा था. टी ज आलू ज़मीन पर गिर पड़े तो मौली उन्हें एक- एक करके उठाने लगी थी. एक वृद्ध महिला को इस दशा में देख कर नितिन ने सहर्ष ही उसकी सहायता कर देनी चाही और बिखरे हुए आलू भूमि पर से उठाकर मौली के थैले में डालने लगा. इस पर तब मौली ने कृतज्ञयता उससे खा था की,
'थैंक यू बाय. गॉड बिलेस यू'.
'?' - ये सुनकर नितिन क्षण भर को अचरज से मौली का मुख ही देखता रह गया था. इस प्रकार की कभी वह उसके चेहरे को देखता तो कभी उसकी जीर्ण- शीर्ण सी दशा को, क्योंकि मौली ने अपने कहे हुए जिन अंतिम शब्दों को बोला था, वह उसका एक प्रकार से तकिया कलाम था. इसी कारण नितिन को संदेह हो गया था की उसने अवश्य ही इस महिला को पहले भी कहीं देखा है? तब उसने अपने संदेह को दूर करने के लिए उससे पूछ लिया था की,
'मुझे क्षमा करें. ऐसा लगता है कि जैसे आपको मैंने पहले भी कहीं देखा है? क्या मैं जान सकता हूँ कि आप कहाँ रहती हैं?'
'मुझे?' एक आश्चर्य से मौली नितिन का चेहरा ताकने लगी थी. फिर गौर से उसको देखते हुए बोली थी कि,
'हो सकता है? लेकिन मैं आपको अभी तक नहीं पहचान सकी हूँ?'
'कहाँ की रहनेवाली हैं आप?' नितिन ने तब उससे आगे पूछा था.
'यहाँ तो मैं डालीगंज में रह रही हूँ. कुछ दिनों पहले ही मैं यहां पर आई हूँ. वैसे मूलरूप से मैं सोनागिरि की रहनेवाली हूँ. '
'सोनागिरि? नितिन तब अक्चानक ही चौंक गया था. फिर उसने मौली का चेहरा गहराई से निहारते हुए कहा था कि.
'कहीं आप मौली सिम्पसन तो नहीं हैं?'
' जी. . .जी . . .हाँ. मगर आप?' दूसरे के मुख से अपना नाम सुनकर मौली आश्चर्य से भर गई थी.
' मैं नितिन सक्सेना हूँ. आपके कालेज के समय का सहपाठी.'
'ओह! तुम नितिन? यानी की, काका हो?' मौली बार- बार आश्चर्य के साथ नितिन का मुख देखने लगी. वह तब एक गहरी सांस लेते हुए बोली,
'ओह माई गॉड? कितना बदल गए हो तुम? पहले किसकदर दुबले- पतले थे, और अब देखो, कैसे लम्बे और हेल्थी भी हो गए हो? रंग भी कितना अधिक साफ़ हो गया है तुम्हारा? गोरा- चटटा, हैंडसम?'
'तुम में भी तो कितना अधिक परिवर्तन आ चुका है? देखो तो मैं भी तो नहीं पहचान सका था तुम्हें? नितिन ने कहा था.
फिर दोनों की वार्ता स्वत: ही आप से तुम पर आ गई थी. मौली तो नितिन से मिलकर अत्यधिक प्रसन्न हो गई थी और अब नितिन के बहुत मना करने के उपरान्त भी वह उसे अपने निवास स्थान पर एक प्याला चाय पिलाने के लिए साथ ले आई थी. तब नितिन ने देखा था कि मौली का रहने का स्थान क्या था? एक छोटा सा कमरा - वह भी इतना छोटा कि उसमें केवल एक छोटी चारपाई ही समा सके. कमरे के सीमेंट का फर्श भी उधड़ चुका था और उसमें से जगह- जगह पर टूटी हुईं ईंटें अपनी बिगड़ी हुई दशा का राग अलाप रहीं थीं. मौली की घर-गृहस्थी की वस्तुओं के नाम पर कोने में एक सदियों पुरानी अटैची ही रखी हुई थी. दूसरे कोने में उसके थोड़े से बर्तन थे. फिर भी उसने हरेक वस्तु को ढंग से सज़ा कर रखा हुआ था. एक छोटे से स्टूल पर यीशु मसीह की तस्वीर तथा बाइबल रखी हुई थी, जिसके पास एक अधजली मोमबत्ती रखी हुई अभावों और तन्हाईयों में रोज़ाना गलती हुई किसी इंसानी ज़िंदगी का भरपूर संकेत दे रही थी. नितिन ये सब देखते ही ये तो समझ गया था कि मौली आर्थिक तंगी के भीषण दौर से गुज़र रही है, पर वह ये नहीं जान सका था कि मौली के इस बदले हुए हालात का सबब क्या हो सकता है?
मौली ने घर में आते ही स्टोव पर चाय का पानी गर्म होने के लिए रख दिया था तथा अन्य कामों को करते हुए उससे बोली थी कि,
'तुमने अपने बारे में तो कुछ बताया ही नहीं? कहां हो आजकल? क्या कर रहे हो? तुम तो एक दम से गायब ही होकर रह गए?' मौली के ढेर सारे प्रश्नों में उसके प्रति शिकायत भी थी.
'मैंने तो लेखन को ही अपनी रोज़ी- रोटी का साधन बना रखा है.'
'मतलब? '
'दिल्ली से प्रकाशित होने वाले दैनिक पत्र 'अंतिम युग' का संवाददाता हूँ. कुछेक पत्रिकाओं में कहानियां आदि भी लिखता हूँ. इसक अतिरिक्त पॉकेट बुक्स में भी उपन्यास छाप जाते हैं. बस दाल- रोटी चल जाती है.'
'?'- नितिन न कहा तो मौली कुछेक क्षण मौन रह कर धीरे से उसको चाय क प्याला पकड़ाते हुए बोली थी कि,
'और . . . शादी वगैरह . . .?'
'माँ के प्रभाव डालने पर मैंने अपना विवाह तो कर लिया था और किसी तरह से अपने आपको समझा कर समय से समझौता भी कर लिया था, परन्तु रिक्की के जन्म के पश्चात ही मेरी पत्नी रोमी साथ छोड़ कर चली गई. सो अब अपने चार वर्षीय पुत्र के सहारे किसी प्रकार से ज़िंदगी बसर करने की कोशिश कर रहा हूँ.'
ये सुनकर मौली कुछेक क्षणों के लिए फिर से गंभीर हो गई. नितिन ने केवल अनुमान ही लगाया था कि शायद मौली को उसकी कहानी सुनकर कुछ अच्छा नहीं लग सका था. फिर उसकी खामोशी को निहारते हुए नितिन ने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाया. वह मौली से बोला कि,
'मैं तो एक पुरुष हूँ. जैसे- तैसे अपनी जीवन- नैया को संसार के सागर में खे रहा हूँ, मगर तुम . . .? तुमने अपनी ये क्या दशा बना रखी है? मुझे ये सब देख कर विश्वास भी नहीं होता है कि कल की हंसने- चहकने वाली लड़की अचानक से निराश कामनाओं की अर्थी क्योंकर बन गई है? '
'?'- ये सुनकर मौली अचानक ही गंभीर हो गई. पल भर को उसकी सूखी और निराश आँखें कमरे की बे- जान दीवारों को बे- मतलब ही ताकने लगीं. फिर उसने जैसे बड़े हे उदास स्वरों में कहा कि,
'काका, मैं जानती थी कि, तुम अवसर मिलने पर मुझसे यही सब कुछ कहोगे. इसलिए अब मुझे तुम्हें सब कुछ बताने में कोई ऐतराज़ भी नहीं है. मौली ने नितिन के घर का निक नाम लेकर बात आरम्भ की. वह पहले तो थोड़ी देर को चुप रही, फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उससे बोली कि,
'तुम्हें तो मालुम ही है कि, बी. ए. करने के पश्चात जब मैं आगे पढ़ने की सोच रही थी तभी मेरी मां का निधन हो गया था. तब तुम भी उनके अंतिम संस्कार में सम्मलित हुए थे और मुझे तसल्ली देने आये थे. ये भी जानते हो कि, मेरा अपनी मां के अतिरिक्त इस भरे संसार में कोई भी अपना नहीं था. इस कारण उनका साया मेरे सिर पर से उठते ही मैं हताश ही नहीं हुई थी बल्कि एक प्रकार से बुरी तरह से टूट भी गई थी. उनके जाने के बाद अब मैं पूरी तरह से इस दुनिया में नितांत अकेली थी. ये और बात थी कि, माँ के द्वारा वसीयत में छोड़ा हुआ मेरे पास हर तरह का सुख था. आवश्यकता की हरेक वस्तु घर में मौजूद थी. काफी पैसा भी वह छोड़ गईं थीं, परन्तु इतना सब होने के बाद भी न जाने क्यों मैं अपने आपको बे- सहारा होने के साथ- साथ इस संसार में हर तरह से अकेला और तन्हा महसूस करने लगी थी?
मेरी माँ मुझे समाज सेविका या मसीही प्रचारिका, दोनों में से कोई भी बनाना चाहती थीं. तब उनकी इसी इच्छा को ध्यान में रखते हुए मैंने पहले आरम्भ में ईसाई बच्चों का एक अंग्रेजी कान्वेंट स्कूल खोलना चाहा था, पर उसके लिए ना ही तो मिशन में और ना ही अन्यत्र समुचित स्थान मिल सका था. इसके अतिरिक्त जहां मैं रहती थी वहां पर मिशन में एक स्थान पर कुछ भूमि खाली पड़ी थी, तो मैंने वहां पर अपना स्कूल खोलना चाहा भी, परन्तु मिशन के अधिकारी वर्ग ने ना तो वह भूमि ही मुझे बेची और ना ही उसमें स्कूल खोलने की अनुमति दी. जब मैंने इसका कारण पूछा तो मुझे बताया गया कि, मिशन वालों का वहां पर चर्च के पास्टर के लिए रहने को मकान बनवाने का इरादा है, क्योंकि पहलेवाले पास्टर सेवानिवृत होने के बाद भी उसी पास्टर हाउस में रह रहे थे जिसे उन्हें कायदे से सेवानिवृत होने के बाद खाली करना था. तब मैंने इस धारणा को अपने मन में से निकाल दिया था कि मैं भी अपना स्कूल खोलूंगी. लेकिन बाद में मुझे ये जानकार अत्यंत दुःख भी हुआ था कि, आज वहीं पर उस माने हुए बिशप का अपना निजी स्कूल चल रहा है. इस घटना के बाद मैंने प्रचारिका का कोर्स करना चाहा पर उसके लिए भी बात नहीं बन सकी थी, क्योंकि वहां के स्थानीय पास्टर ने मेरे प्रार्थना पत्र को आगे बढ़ाने में आना- कानी की थी कि महिलाओं को पास्टर बनने की अनुमति नहीं है. हक़ीक़त में उनका इरादा अपने इकलौते हाई- स्कूल फेल बेकार लड़के से मेरी शादी कराने का इरादा था. इसलिए वे ये कभी भी नहीं चाहते थे कि, मैं उनका स्थान और शहर छोड़कर कहीं भी बाहर जाऊं. फिर एक दिन जब वह पादरी साहब सचमुच अपने पुत्र का रिश्ता लेकर मेरे पास आ गए तो मैंने उनको स्पष्ट मना कर दिया था और कहा था कि, 'ये विवाह तो क्या मेरा तो भविष्य में कभी भी अपना विवाह करने का इरादा नहीं है. ' क्योंकि मैं अपने को इस लायक नहीं समझती थी कि, किसी के बच्चे की माँ भी बन सकूं. उन पास्टर महोदय ने मेरी इस विवशता का कोई दूसरा ही मतलब निकाला था. तब इस घटना के पश्चात पास्टर का व्यवहार मेरे प्रति एक दम से विरोधी प्रवृति का हो गया था. इसी कारण मैं अपनी माँ के जिस मकान में रह रही थी उसका भी किराया लगाए जाने की कोशिशें मिशन की तरफ से होने लगीं थीं. इस प्रकार से जब मुझे कहीं भी सफलता नहीं मिली तो अंत में मैंने कुछ अनाथ बच्चों को आश्रय देने और उनका पालन- पोषण करने के लिए इरादा बना लिया था. पैसे की मेरे पास कोई भी कमी नहीं थी. माँ का दिया हुआ सबकुछ मेरे पास अभी तक सुरक्षित था, सो शीघ्र ही मैंने ऐसे पांच बच्चों को जो लगभग एक ही उम्र के थे एक अनाथालय से कानूनी तौर पर गोद ले लिया और फिर उनकी संरक्षिका बनकर उनका पालन- पोषण करने लगी थी. उन बच्चों में तीन लड़कियां और दो लड़के थे. सो इस प्रकार से उन अनाथ बच्चों की परवरिश में, मैं दुनिया का हर दुःख भूल गई थी. सचमुच मैं एक माँ बन कर उनको पालने लगी थी.
उन्हीं दिनों तुम्हारा लिखित एक उपन्यास,'अकेला मैं' दिल्ली के प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था. उसको जब मैंने पढ़ा था तो तुम्हारे लेखन से बहुत ही प्रभावित भी हुई थी. बहुत ही दुःख और उदासियों से भरी कहानी लिखी थी तुमने. तब उसको पढ़कर मैंने तुमको एक पत्र भी लिखा था. फिर उसके कुछेक दिनों के बाद ही तुम मेरे पास मिलने भी आये थे. मुझसे काफी प्रसन्नता से तुम मिले भी थे और की दिनों तक तुम सोनागिरि में रुके भी रहे थे. उस समय मैंने जीवन में पहली बार महसूस किया था कि, तुम मुझे अपने मन से भी काफी चाहने लगे हो और बहुत चाहने के बाद भी अपने घर वापस नहीं लौट पा रहे हो. तब उन्हीं दिनों तुमने मुझसे कहा था कि,
'मौली, जीवन के सफर में यदि कोई साथी मिल जाता है तो रास्ता बहुत अच्छा कटता है. '
'तुम ठीक कहते हो काका. मगर मुझे अपने राह- ए - सफर में दूर- दूर तक कोई भी हमसफ़र नजर नहीं आता है. ' मैंने तब बहुत उदास होकर कहा था तो तुमने मुझसे जैसे सवाल किया था. बोले थे कि,
'कभी तुमने मेरी आंखों में भी झाँक कर देखा है मौली? कभी तुमने इस विषय पर मेरे बारे में भी गहराई से विचार किया है कि, इतनी उम्र बीत जाने पर भी मैं अभी तक अकेला क्यों भटक रहा हूँ? सच तो ये है कि, मैं तुम्हारे लिए अपना सब कुछ त्याग सकता हूँ. मैं तुम्हारी खातिर अपना धर्म छोड़कर जीजस को भी अपना लूंगा. सचमुच में मैं तुम से विवाह करना चाहता हूँ मौली. '
'मैं जानती थी कि, तुम मुझसे ऐसा ही कुछ कहोगे. तब मैंने तुमको खूब सोच और समझ कर उत्तर भी दिया था. मैंने तुमको एक प्रकार से समझाया ही था. मैं बोली थी कि, पहली बात तो य है कि, इंसान का किसी भी चीज़ के लिए लालच करना हमारे मसीही धर्म में पाप बताया गया है. तुम मेरी खातिर एक लालच को अपने मन में बसाकर मसीही धर्म को विवश होकर अपनाओ और जीजस को केवल इसलिए ग्रहण करो कि, मैं तुमको मिल जाऊं, तो तुम तो पाप के भागीदार बनोगे ही साथ में मैं भी अनन्त जीवन की ज्वाला में हमेशा को जलती रहूंगी. तुमने ये सोच कैसे लिया कि, मैं एक मसीहवी लड़की होकर तुमको ऐसा करने में साथ दूंगी? तब मेरी इस बात पर तुम केवल मेरा मुहं ही देखते रह गए थे अउ एक शब्द भी नहीं बोल सके थे. उसके बाद तुम्हारी खामोशी को देख कर मैंने सोचा था कि तुमको अब और अँधेरे में रखना मेर लिए मूर्खता ही होगी, इसलिए बेहतर होगा कि तुमको अब साफ़- साफ़ सब कुछ बता दिया जाए. तब मैंने तुमसे आगे कहा था कि, भावनाओं में बहकर वास्तविकता से अपना मुहं मोड़ने की भूल मत करो काका. कैक्टस के पेड़ में हाथ लगाने से केवल कांटे ही हाथ लगा सकते हैं, फूल नहीं. मैं तुम्हें अब और अधिक अंधकार तथा अन्य किसी झूठी आस पर नहीं रख सकती हूँ. सच बात तो ये है कि, मेरा आजीवन किसी से भी विवाह करने का इरादा नहीं है, क्योंकि मैं विवाह करने के लायक ही नहीं हूँ. अच्छा होगा कि तुम मेरा ख्याल ही छोड़ दो और अपने माँ के कहने पर अपना विवाह कर लो तथा अपने गृहस्थ जीवन में व्यस्त हो जाओ. '
तब मेरी इस बात पर तुमने बड़े ही आश्चर्य से मुझसे कहा था कि,
'मौली, पुरुष के बिना स्त्री का जीवन अधूरा ही नहीं बल्कि एक बोझ भी बन जाता है. क्या मैं जान सकता हूँ कि, तुमने अपने जीवन का ये कठोर पथ यूँ अकेले काटने का निर्णय क्यों लिया है? '
तुम्हारी इस अप्रत्याशित बात पर तब मैंने कोई भी आश्चर्य नहीं किया था बल्कि कुछ भी कहने के लिए विवश जरूर हो गई थी. मगर बाद में मैंने सोचा था कि, तुमसे स्पष्ट कर देना ही उचित होगा और कहा था कि,
'काका, कुछ बातें ऐसी होती हैं कि जिन्हें मुख से नहीं कहा जा सकता है, केवल मन और आँखों की भाषा के द्वारा ही समझा जा सकता है. किसी भी सूखे पेड़ के तले कोई भी समझदार व्यक्ति शरण नहीं लिया करता है. ऐसे वृक्ष से तो मौसमी हवाएं तक अपना दामन बचाकर निकल जाया करती हैं. तुम तो एक लेखक, पत्रकार की हैसियत रखते हो, क्या इतना भी नहीं समझ पा रहे हो? '
उसके पश्चात तुमने मुझसे फिर कुछ भी नहीं कहा था और बाद में बड़े ही निराश और उदास होकर मेरे पा से चले गए थे. फिर तुम्हारे जाने के बाद मैं खुद भी काफी दिनों तक उदासीन और निराश बनी रही थी. कभी सोचती थी कि, तुमको खाली हाथ लौटाकर कहीं मैंने अपने जीवन की कोई बड़ी भूल तो नहीं कर दी है? तब इस विषय पर मैं बहुत दिनों तक सोचती भी रही थी. बाद में मेरी विवशताओं के तहत बहने वाले आंसूं रुक तो नहीं सके थे पर समय की हवाओं ने उन्हें सोख अवश्य लिया था. मैं फिर से सामान्य हो गई थी. इसी बीच मैंने तुम्हारा पत्र आने की प्रतीक्षा भी की थी, पर तुमने तो मुझे पत्र लिखना तो दूर अपने सकुशल पहुंचने की सूचना भी नहीं दी थी. मुझे तब यही लगा था कि तुम मुझसे बेहद नाराज़ ही नहीं बल्कि खिन्न भी हो चुके हो.
उसके पश्चात धीरे- धीरे समय बढ़ता गया. दिन बदलते चले गए. ज़िंदगी की सभी भूली- बिसरी स्मृतियाँ यादों की गर्द में दबती चलीं गईं. मेरे पाँचों बच्चे बड़े होते चले गए. वे स्कूल की दीवारें लांघ कर कालेज की चारदीवारी के छात्र बन गए. लड़कियां तीनों ही काफी समझदार और पढ़ने- लिखने में तेज थीं. बड़ा लड़का भी अपनी पढ़ाई में ठीक ही था, परन्तु छोटा वाला कालेज में पहुंच कर बिगड़ गया था. वह आवारागर्दी करने लगा था. अपने बिगड़े हुए आवारा मित्रों के साथ वह शराब, जुए तथा अन्य बुरी बातों का आदी भी हो चुका था. अक्सर वह घर में भी शराब पीकर आता और गाली- गलौज के साथ अपने अन्य भाई- बहनों के साथ बुरा व्यवहार भी करने लगा था. इसके साथ- साथ अवसर मिलते ही वह घर के कीमती सामानों की चोरियां भी करने लगा था. प्राय: वह घर में से पैसे चुरा लिया करता था. तब उसके इस रवैये से घर में कोई न कोई कीमती वस्तु गायब हो जाती थी. धीरे- धीरे जब उसके आचरण में अपनी अन्य तीनों बहनों के प्रति मुझे खोट नज़र आने लगी तो समय की नाजुकता को देखते हुए मैंने शीघ्र ही तीनों लड़कियों के विवाह करने की योजना बना ली; क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि छोटे लड़के की असमाजिक गति विधियों के कारण मेरे अन्य बच्चों के भावी जीवन पर कोई अंकुश लगे. वैसे भी सभी लड़कियों ने अब तक अपनी इंटर कली परीक्षायें तो पास कर ही लीं थीं और वे सभी बी. ए. क अंतिम वर्ष में थीं. इस प्रकार मैंने अपनी तीनों लड़कियों का एक ही दिन में विवाह कर दिया. वे सब आज अपने- अपने घरों में प्रसन्न भी हैं. मेरे सबसे बड़े लड़के ने इंटर करने के पश्चात एक्स -रे रेडियो तकनीशियन का प्रशिक्षण लिया था, सो वह थोड़े दिनों तक भारत के एक अस्पताल में काम करने के बाद कनाडा चला गया है अउ वहीं काम कर रहा है. मुझे उसके बारे में ये भी सुनने में आया है कि उसने वहीं किसी लड़की से अपना विवाह भी कर लिया है.
अब केवल छोटा ही लड़का मेरे पास बना हुआ था. मैं भी उसे बराबर समझाती ही रहती थी और चाहती थी वह भी सुधर जाए और अपना घर बसा ले. कभी वह मेरी बातो को मान भी लेता था, मगर महल्ले वालों ने उसे सारी वास्तविकता से पहले ही परिचित करा दिया था कि मैं उसकी सगी माँ और उसकी बहनें सगे नहीं हैं. शायद यही कारण ऐसा था कि, वह अपनी बिगड़ी हुई आदतों के कारण अपनी बहनों पर भी बुरे नज़र रखने लगा था. मेरे बहुत कहने- सुनने पर कभी वह थोड़े समय के लिए संभल जाता था वरना अवसर मिलते ही अपनी आदतों से बाज़ नहीं आता था. फिर जब एक दिन उसने मेरी सोने की सलीब को उसकी जंजीर के साथ बाज़ार में बेच डाला तो मैंने उसे खूब डांटा-फटकारा और गुस्से में उसे अपने घर से सदा के लिए बाहर निकाल दिया था तब वह काफी समय के लिए घर से बाहर ही रहा और एक बार भी घर पर नहीं आया.
लेकिन एक दिन जब वह आया और मुझसे क्षमा मांगनें लगा तो मुझे भी उसकी दशा देख कर उस पर तरस आ गया और मैंने उसे फिर से अपने गले से लगा लिया. परन्तु शायद यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी. वह फिर से एक बार मेरे साथ ही घर में रहने लगा था. मगर एक दिन मौक़ा पाकर वह मेरी माँ के रखे हुयी सारे जेवर और गहने तथा अन्य कीमती सामान लेकर भाग गया और आज तक उसका ये पता नहीं है कि वह कहाँ पर है? उसके ऐसा करने पर फिर मैंने जैसे- तैसे अपने आपको संभाला और समय से समझौता करके जीने लगी थी. कोई जीविका तो मेरे पास थी नहीं, लड़कियों के विवाह आदि करने के पश्चात केवल थोड़े से पैसे ही मेरे पास बचे हुए थे सो वे भी धीरे- धीरे समाप्त होते गए. साथ ही मैं भी समय- असमय बीमार रहने लगी थी. ऐसे में स्थानीय मिशन के अधिकारियों ने मुझसे किराए की भी मांग करनी शुरू कर दी थी क्योंकि मैं अभी तक अपनी माँ के मिशन के मकान में ही रह रही थी. तब इस प्रकार से एक दिन मैं आर्थिक रूप से बे-हद कंगाल हो गई और जब मकान का किराया भी नहीं दे सकी तो मिशन वालों ने मुझे मकान खाली करने का नोटिस दे दिया. तब मैंने अपना सब कुछ ऊपर वाले के हाथ में छोड़कर सारा निर्णय उसी की हाथों में सौंप दिया और एक दिन वह मकान खाली करके उसका रहा- बचा सामान वहीं की एक गरीब महिला को देकर अपनी लड़कियों के पास चली गई. मगर अफ़सोस, वहां पर भी मुझे उपेक्षा का शिकार होना पड़ा. फिर कनाडा में रह रहे अपने बड़े लड़के को न जाने कितनी ही पत्र लिखे होंगें, लेकिन उसकी तरफ से किसी भी सहायता की बात तो अलग, उसने मेरे एक पत्र का भी उत्तर नहीं दिया. तब इस प्रकार से मैं इस भरे संसार में आश्रय और आर्थिक, दोनों ही रूप से बे- सहारा थी. ना तो रहने को स्थान ही था और ना ही खाने को दो रोटियां थीं. तब एक दिन मेरे एक आर्य समाजी मित्र ने मेरी परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए अपने एक मित्र के नाम एक पत्र सहायता करने के लिए लिख कर दिया तो उनके मित्र ने अपने स्कूल में मुझे पढ़ाने के लिए रख लिया है. रहने के लिए यहां के मिशन कम्पाउंड के पास्टर ने मेरी मदद की और एक ये छोटा सा कमरा दे दिया है. सो इस तरह से मैं यहां आ गई हूँ. यहां आये हुए मुझे अभी दो सप्ताह भी नहीं हुए हैं कि आज अचानक से तुम मिल गए हो. '
मौली ये सब कह कर काफी उदास और गंभीर हो चुकी थी. उसके चेहरे पर बनते और बिगड़ते हुए उसके अतीत के धुंधभरे चित्र इस बात के सूचक थे कि, सचमुच में उसने अपनी ज़िंदगी के हरेक रूप को बहुत समीपता से अनुभव ही नहीं किया था बल्कि विवशताओं के तहत दिल की गहराईयों से भोगा भी था.
'बहुत दुखभरी कहानी है तुम्हारी मौली? 'क्या सोचती होगी तुम भी अपने जीवा की इस बिगड़ती हुई तस्वीर के बारे में? ' नितिन ने दुखित होकर कहा.
'क्या सोचती हूँ मैं? यही सोच कर संतुष्ट हो लेती हूँ कि, उगते हुए सूर्य को तो सभी प्रणाम करते हैं. जब तक खेत हरे- भरे रहते हैं तो लोग उसकी प्रसंशा करते हैं और जब वही खेत अपनी हरियाली से मोहताज़ हो जाते हैं तो कोई भी उनकी तरफ देखता भी नहीं है. यही इस दुनिया का चलन है. मेरे जीवन की भी ऐसी ही दशा है जब तक मेर पा सब कुछ था, सबने पूछा, चाहा और सम्मान भी दिया. परन्तु जब मेरे पास कुछ भी नहीं बचा तो मेरे बच्चों ने भी मेरी ओर से अपनी आँखें फेर ली हैं. जब उनका समय निकल गया तो एक- एक करके सब उड़ गए और मेरा बनाय हुआ घोंसला खाली ही नहीं हुआ बल्कि उजड़ भी गया है. सच ही तो है कि, अब तो मैं एक सूखा हुआ पेड़ हूँ. ऐसे वृक्ष के तले किसको राहत की छाया मिल सकेगी? ऐसे पेड़ से तो ज़मान की मौसमी हवाएं तक अपना दामन बचाकर निकल जाती हैं. '
मौली की दर्द भरी कहानी सुन कर नितिन ने महसूस किया कि, उसका चेहरा दर्द और विषाद का बादल बन कर फट जाना चाहता है. कितनी दुखभरी कहानी है मौली की? किसकदर आंसुओं डूबा उसका अफ़साना? एक ऐसा जीवन कि जिसके हरेक रूप में कोई भी अपने जीवन अक्स भली-भांति देख सकता है. तब नितिन को सोचना पड़ गया कि क्या ईश्वर ने मनुष्य की रचना इसीलिये की थी कि उसके बदन पर इस मायावी ज़माने की हरेक ऊंच- नीच का बखान लिखा जाता रहे? क्या मनुष्य एक ऐसा खिलौना है जिससे जब चाहे जो खेलता रहे?
नितिन की खामोशी देखते हुए मौली ने उससे आगे कहा कि,
'काका?'
'हां?'
'अब क्या सोचने लगे हो तुम? '
'यही कि, तुमने इतने दुःख उठाये, मगर क्यों? चलो, मैं तो एक हिन्दू लड़का था. तुम्हारे जीजस के बारे में इतना कुछ जानता भी नहीं हूँ. तुम तो अपनी जाति में किसी भी ईसाई लड़के से विवाह करके अपना घर बसा सकतीं थीं. क्या आवश्यकता थी तुम्हें ये सब करने की? क्या तुम्हारे अपने धर्म में ईश्वर की सेवा का कार्य करने के लिए स्त्री को कुंआरेपन की तन्हाईयों से भरी ज़िंदगी से लड़ना पड़ता है? मैं नहीं समझता हूँ कि, तुम्हारा अपना भगवान जिसे तुम सब ईसाई लोग अत्यंत दयालु और अनुग्रहकारी कहते हो, तुम जैसे लोगों को इस प्रकार का कष्टमय जीवन देकर अपना कार्य करवाता होगा? '
'?'- नितिन ने इस प्रकार से कहा तो मौली कुछेक क्षणों को गंभीर हो गई. वह बड़ी देर तक नितिन का मुख ही देखती रही. फिर जैसे अपने को संभालती हुई उससे बोली कि,
'अब मैं तुम्हे कैसे समझाऊँ? याद है कि मैंने तुमसे परोक्ष रूप में पहले भी कभी कहा था कि मैं इस लायक नहीं थी कि किसी से भी अपना विवाह करके अपने होनेवाले पति को उसके बच्चों का कोई भी सुख दे सकती. मैं तो आरम्भ से ही एक बाँझ स्त्री हूँ. विवाह के पश्चात मैं किसी की पत्नी तो बन सकती थी लेकिन उसके होनेवाले बच्चों की माँ कभी भी नहीं. मैंने तुमसे पहले भी कभी कहा था कि, कैक्टस के पेड़ में केवल वे कांटे होते हैं, जो अपनी ही तरह के फूलों के मोहताज़ होते हैं. मैं इस बात को अच्छी तरह से जानती हूँ कि इस पाप भरी दुनिया में आज का इंसान फूलो से अधिक मासूम कलियों की बात ज्यादा करता है.'
मौली की इस बात को सुनकर नितिन उससे बोला कि,
'ये तुम्हारा अपना दृष्टिकोण था मौली. तुमने मुझे समझने में भूल की है और स्वयं अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है. संसार के सारे पुरुष एक से ही नहीं होते हैं. भले ही तुममें शारीरिक रूप से कितनी ही बड़ी कमी ही क्यों न थी, फिर भी उसे छुपाकर तम्हें उसे अपने तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए था. तुम्हें शायद इस बात का एहसास भी न हो कि कैक्टस के पेड़ में भले ही कांटे क्यों न होते हों पर उन काँटों के साथ उनमें हरीतिमा भी तो होती है. तुम अपने आपको किसी सूखे पेड़ या कैक्टस की संज्ञा देती हो तो क्या इन कैक्टस के काँटों पर मेरा और मेर पुत्र का कोई भी अधिकार नहीं है? क्या हम दोनों जिसमें एक अपने जीवन के हमसफ़र से महरूम है और दूसरा अपनी माँ की ममता को पाने के लिए मजबूर होकर दिन- रात अपने हाथ मलता है, क्या इस सूखे पेड़ की टूटी- फूटे छाया के तले खड़े होने की भी हैसियत नहीं रखते हैं? ज़रा सोचो कि, हम दोनों एक ही शहर से, कालेज के समय से एक-दूसरे को जानते, पहचानते और समझते आये हैं. सही मायनों में देखा जाए तो हम दोनों एक ही मार्ग के दो भटके हुए पथिक हैं. ये और बात है कि हम पास रह कर भी सदा अलग ही रहे हैं. लेकिन अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, सब कुछ संभाला जा सकता है. जो नष्ट हो गया है उसे जाने दो, पर जो बच गया है उसे तो संभालकर रखा जा सकता है. तुम्हारे ही जीजस की बात कहता हूँ कि बालू की नींव पर बनाये हुए घर स्थिर नहीं होते हैं. यदि इस बार भी तुमने बालू की नींव पर अपने घर को बनाने की कोशिश की तो तुम खुद समझ सकती हो हश्र क्या हो सकता है? वैसे मैं ये जानता हूँ कि जब तक ऊ पर वाला किसी घर को न बनाये तो बनाने वाला अपना घर कभी भी नहीं बना सकता है. फिर भी कोशिश और परिश्रम तो इंसान ही करता है. कोई नहीं जानता है कि तुमने यदि आज मेरी बात मान ली तो कल को आने वाले समय में तुम्हारे द्वारा मेरा हुए मेरे बच्चे का उद्धार हो जाए. मेरे पुत्र को माँ की आवश्यकता है, और हम दोनों को एक-दूसरे के सहारे की, तो क्यों न हम दोनों एक- दूसरे का दुःख बांटकर इस बोझ को उठायें और अपने जीवनों को सुखमय बनाने की कोशिश करें? इस तरह से हो सकता है कि वक्त की दिन-रात चलनें वाली हवाएं हमारे आंसूं पौंछेंगी तो नहीं तो कम से कम सूखा तो अवश्य ही देंगीं.'
नितिन की इतनी ढेर सारी बातों को सुनकर मौली कुछ भी नहीं कह सकी. उसकी आँखों में स्वत: ही आंसूं झिलमिल मोतियों के समान झलकने लगे. वह कभी नितिन की आँखों में देखती तो कभी कमरे की उन दीवारों को निहारने लगती थी कि जिनके बदन पर उसके अतीत के हरेक दर्द का कटरा टपक रहा था. मौली अभी तक मौन थी और नितिन उसके उत्तर की प्रतीक्षा में गंभीर बैठा हुआ उसको बार- बार निहार लेता था. नितिन ने तब ये जान लिया कि मौली की खामोशी ही उसकी मौन स्वीकृति है तो उसने आगे उससे कहा कि,
'मैं और रिक्की अगले रविवार को बाकायदा तुमको लेने आएंगे. तबतक तुम खूब सोच लेना कि मेरा कहना कहाँ तक सही है? '
यह कह कर नितिन वापस अपने निवास स्थान पर आ गया था और मौली उसको चुपचाप जाते हुए देखती रही थी.
मौली ने उसके कथन पर क्या सोचा था? क्या निर्णय लिया था? नितिन तब कोई निश्चय नहीं कर सका था. लेकिन फिर भी मौली की मौन भाषा के पीछे छिपी उसकी अनकही स्वीकृति पर नितिन को एक विश्वास अवश्य ही हो गया था कि मौली को उसकी बात मंज़ूर है. इसी विश्वास को अपना आधार बनाकर जब वह आज अपने पुत्र रिक्की के साथ मौली के पास फिर से आया था तो चर्च के दम तोड़ते हुए घंटों की सिसकती हुई आवाज़ों ने उसके विश्वास की जमी हुई सारी परतों को उधेड़कर रख दिया था. मौली उसके पास आने से पूर्व ही इस संसार को सदा के लिए छोड़ कर चली गई थी. लोगों के द्वारा मिली सूचना के अनुसार पिछली रात्रि ही अचानक से हृदयगति बंद हो जाने के कारण उसका देहांत हो चुका था. ये उसकी किस्मत का ही एक सिला था कि कहाँ वह उसकी डोली सजाने के लिए दिल में न जाने कितने ही अरमान सज़ाकर आया था लेकिन समय की बे- मुरब्बत विधि ने उसके दामन में मौली की अर्थी के फूल सजा दिए थे. वह फूल जो उसकी खुशियों के दीप बनने से पहले ही उसके दिल के कांटे बन कर रह गए थे.
ये बात किसकदर वास्तविकता को दर्शाती है कि, मनुष्य अपनी कोशिशों और सांसारिक ताकतों के बल पर तब तक अपने सपनों के महल की एक ईंट तक नहीं रख सकता है जब तक कि विधाता उस पर अपनी दया और अनुग्रह की बारिश नहीं करता है. सोचते- सोचते नितिन का मन दर्द और विषाद के कारण मलिन हो गया. वह अपने अतीत की स्मृतियों से हटकर वर्तमान में आ गया. एक बार उसने चारों ओर देखा. जस्सो किचिन में काम कर रही थी. रिक्की उसके पास ही बैठा हुआ उइसकी मनोदशा से बे- खबर किसी खिलोने के साथ खेलने में मग्न था. तभी नितिन ने उसकी तरफ देखा तो रिक्की अपना खेलना छोड़कर उसके पास आ गया. आ गया तो नितिन प्यार से उसके सर पर अपना हाथ फेरने लगा. अपने पिता का प्यार पाया तो रिक्की ने नितिन ने पूछा कि,
'पापा मम्मी कहाँ हैं? '
'?'
नितिन ने सुना तो उसे लगा कि, अचानक ही उसके पैरों से धरती खिसक गई है. सहसा ही उसे ख्याल आया कि पिछले दिन ही तो उसने अपने पुत्र से कहा था कि वह आज उसकी मम्मी को लेने जाएगा. इसी कारण उसके पुत्र ने उससे ऐसा सवाल किया था. रिक्की फिर से उससे आगे पूछता उससे पहले ही नितिन ने उसे अपनी गोद में भर लिया और उसको प्यार करते हुए बोला कि,
'तुम्हारी मम्मी हेवन में अपने जीजस के पास रहने को चली गई हैं. '
'मुझे नहीं चाहिए अपनी मम्मी हेवन में. मम्मी मुझे यहां पर ही चाहिए. ' उसके पुत्र ने कहा तो नितिन अपनी आँख के आंसू पौंछते हुए भरी आवाज़ में उससे बोला कि,
'बेटा, तुम्हें कैसे समझाऊँ कि सारी बातें मनुष्य के हाथ में नहीं होती हैं. अगर होतीं तो मनुष्य ईश्वर के आस्तित्व पर विश्वास कैसे करता? '
तभी जस्सों ने आकर रिक्की को गोद में उठा लिया और उसको बाहर ले जाते हुए बोली,
'पापा को यूँ हर समय हैरान नहीं किया करते हैं. चलो हम दोनों बाहर खेलेंगे.'
उसके जाने के पश्चात नितिन ने कहीं दूर सूने आकाश की ओर निहार कर देखा तो उसे लगा कि, जैसे फिर कोई तारा टूट कर किसी सूखे पेड़ की डालियों में उलझ कर रह गया है.
-समाप्त.