एक शाम, चाय का प्याला लिए बैठा था, तभी देखा कि सामने दूर सड़क पर एक भिखारी और एक नवयुवक आपस में झगड़ रहे थे। पता नहीं क्या बात होगी, मगर एक धुंधला सा ख़याल आया कि इसकी वजह क्या हो सकती है? मुझे कहीं उम्मीद नज़र नहीं आई, सिर्फ़ एक संभावना। थोड़ा सोचने पर समझ आया कि नवयुवक रोज़ उसी रास्ते से जाता था और उस गरीब भिखारी को देखता था। उसे लगता था कि वह उसकी मदद कर सकता है, और उसने वैसा ही किया।
अगले दिन से वह अपने घर से उसके लिए कुछ खाने को लाने लगा। वह भिखारी खुश हो जाता, क्योंकि जहां कई दिनों तक लोगों के आगे गिड़गिड़ाने के बाद भी उसे एक पैसा नहीं मिलता था, वहां यह नवयुवक बिना बोले ही रोज़ खाना लाने लगा। यह सिलसिला कई दिनों तक चला। धीरे-धीरे भिखारी ने लोगों के आगे हाथ फैलाना भी बंद कर दिया। अब वह सिर्फ़ उस नवयुवक के इंतजार में बैठा रहता, सोचता कि अब उसका आने का समय हो गया है—वह आएगा, तो मेरी भूख मिटेगी।
फिर अचानक, एक दिन वह नवयुवक उसके लिए खाना लाना बंद कर देता है। वह रोज़ उसी रास्ते से जाता है, मगर अब न ही उसकी तरफ़ देखता है, न ही कुछ कहता है—जैसे कोई दुर्गंध हो, जो उसे परेशान कर रही हो। भिखारी गुस्से में उससे झगड़ने लगता है, क्योंकि अब वह उसके लिए खाना नहीं लाता। भिखारी चिल्लाता है, "अगर मैंने कुछ नहीं खाया, तो मर जाऊंगा!" लेकिन नवयुवक कुछ बोले बिना आगे बढ़ता जाता है।
भिखारी लगभग 250 मीटर तक उसे इसी तरह परेशान करता रहा। थककर उसने उसे गालियां देनी शुरू कर दीं, उसे कोसने लगा—जैसे वही नवयुवक उसकी मृत्यु का कारण बनने वाला हो, जैसे वही उसकी दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार हो। यह सब देखकर मेरा हृदय सोच में डूब गया, मुझे लगा जैसे मैं किसी दूसरी ही दुनिया में चला गया हूँ।
मैं सोचता हूँ…
जिस व्यक्ति ने तुम्हें रोटी दी, उसने तुम्हारी ज़िंदगी के भले ही चार दिन अच्छे बनाए हों, मगर बनाए तो थे! भिखारी ने न तो यह पूछा कि उसने रोटी देना क्यों बंद कर दिया, न ही उसे कोई मौका दिया अपनी बात कहने का। उसे सिर्फ़ अपनी भूख की चिंता थी। उसने एक उम्मीद पाल ली थी और अपने कर्म को छोड़ दिया था।
अगर वह भिखारी उस नवयुवक से पूछता, तो उसे पता चलता कि वह एक बावर्ची था, जिसकी नौकरी चली गई थी। जितने दिन वह खिला सका, उसने खिलाया। मगर जब खुद की हालत बिगड़ गई, तो वह दूसरों की मदद नहीं कर सका। मगर भिखारी उसका शुक्रिया अदा करने के बजाय उसे गालियां दे रहा था, उसे कोस रहा था।
कहते हैं, इंसान की फितरत ही ऐसी होती है…
जब तक तुम्हारा फ़ायदा होता है, तुम अच्छे इंसान हो। मगर जब फ़ायदा मिलना बंद हो जाता है, तो तुम उसके लिए कुछ नहीं हो। एक बार किसी को फ़ायदा पहुँचा दो, और फिर अचानक वह बंद कर दो—तो तुम्हारे जैसा बुरा इंसान कोई नहीं होगा।
ख़ैर, मेरी चाय खत्म हो गई है।
मिलते हैं फिर किसी अगली कहानी में, किसी और शाम को…
मैं, अभिषेक कुमार, आपसे विदा लेना चाहूंगा।
धन्यवाद। 🙏