संस्मरण : हुए ऐसे भी लोग जिनका साया सदैव रहे मुझ पर
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"इनकी आंख का रेटीना खराब हो गया है। कैटरेट बढ़ गया है। आंखों से हमेशा के लिए दिखाई देना बंद हो जाएगा। यदि जल्दी ऑपरेशन नहीं कराया। "
यह सुनते ही आपकी हमारी क्या हालत होती है, सभी परिचित हैं। फिर बताया जाता है भारतीय लेंस, विदेशी लेंस, फोल्डिंग लेंस आदि आदि। जो चाहे ले लो।
कैशलैस इंश्योरेंस है तो बढ़िया पर उसमें केयर कवर होती लेंस नहीं।
डॉक्टर अपना कोटा पूरा करता है। अन्यथा कैंप का इंतजार करें और किसी धर्मशाला के हॉल में लगे अस्थाई हॉस्पिटल में आंखों का ऑपरेशन करवाएं। भले ही दूसरी सही आंख का कर दे। क्योंकि भगवान की तरह डॉक्टर भी व्यस्त होता है। हो गई गलती दोनों आंख से रोशनी गई तो क्या करें? मामूली गलती है, जिंदा तो हो न?
उधर अस्सी साल के बुजुर्ग, फीमर बोन का ऐसा ऑपरेशन किया भगवान के दूत ने की पिताजी की याददाश्त चली गई। पोटेशियम, सोडियम लेवल कम हो गया। क्योंकि अधिक एनेस्थीसिया दे दिया उसी थर्ड डिविजन पास डॉक्टर ने। नतीजतन दस दिन तक सो नहीं पाते। मैंने हाथ जोड़े ठीक कर दो इन्हें कहा तो उसने नींद का भारी इंजेक्शन दिया और नींद में ही सुबह डिस्चार्ज। जिस पांव के ऑपरेशन के लिए लाए थे वह हो गया है। अब यह दूसरी बीमारी है तो इसके लिए अलग से आओ। मैंने कहना चाहा यह समस्या तो आपकी लापरवाही से हुई।
घर गए जैसे ही इंजेक्शन का असर खत्म हुआ वह चिल्लाएं, हमें नहीं पहचाने और रात भर सोए नहीं। उन्हीं के साथ रात भर मां और मैं जगते रहे।
अगले दिन सुबह दस बजे ही तुरंत जनवरी की सर्दी में दूसरे हॉस्पिटल में एडमिट करवाया।
वह लगातार बड़बड़ाते और उठ उठकर कहीं जाने की बात करते रहे। मेरा मन द्रवित हो चला था। क्योंकि अच्छे भले थे चार दिन पहले, पूर्ण स्वस्थ थे। क्योंकि पुराने आदमी हैं एक रुपए किलो देशी घी खूब खाया, पहलवानी की, बचपन में ही पिता का साया छिन जाने से बारह वर्ष की उम्र से काम करने लगे। दो बड़ी बहने और दो छोटे भाई और हमारी दादी। पूरे घर को प्रभु कृपा से अकेले संभाला। अच्छा डीलडोल था तो सोलह वर्ष में रेलवे में अठारह वर्ष आयु लिखवाकर और बहुत भारी वजन उठाकर सफल हो गए भर्ती होने में।
बस खिड़की बंद करते हुए कमरे में गिर गए तो भारी शरीर होने से पिछली हड्डी टूट गई। और खराब डॉक्टर ने मामला और बिगाड़ दिया। मैंने कहा भी था उससे की उम्र अस्सी के ऊपर है तो ऑपरेशन की जगह प्लास्टर लगा दें।
" अरे नहीं, कोई चिंता की बात नहीं। इससे भी बड़ी उम्र के लोगों के ऑपरेशन किए हैं। बेफिक्र रहो आप। " चार दिन आईसीयू में उनके साथ रहा। लेकिन अंदर जब ले जाते हैं ओटी में तो वहां हमें जाने दे तो हम सारा खेल समझ जाएं। कितने पानी में हैं यह डॉक्टर?
पर वह होता नहीं। खैर, दुबारा दस दिन दूसरी जगह आईसीयू में रहे। पांच दिन बाद हालत स्थिर हुई। फिर ठीक होने प्रारंभ हुए। मैं यह सोच रहा था कि ऑपरेशन पांव का हुआ है और आज पंद्रह दिन से पांव बंधा पड़ा है। भीलवाड़ा में तो डॉक्टर नरेश पोरवाल, एक बहुत सफल, सहज और अच्छे आर्थोपेडिक सर्जन उसी दिन मरीज को अपने पांव पर खड़ा कर देते हैं। यहां क्या हो रहा? इनके दिमाग की हालात पर ध्यान दूं तो पांव छूटता है और पांव पर दु तो दिमाग। अजमेर में ऑपरेशन करवाने का एक और गंभीर परिणाम भुगता हमने।
दसों दिन आईसीयू के ठंडे फर्श पर लगातार रहा। रात में पांच छ बार वह जगते, उन्हें देखता। धीरे धीरे ठीक हुए फिर से। घर लाए पर अगले तीन महीने बिस्तर, मेडिकल फोल्डिंग बैड, पर ही रहे। वहीं पोटी आदि वहीं सब कुछ। पर बहुत जिगर वाले, हिम्मती रहे वह, कभी कोई शिकायत या नाराजगी नहीं। यह विश्वास की अपनी हिम्मत और अच्छे कार्यों से इस हालात से भी निकल आऊंगा। मुझ पर बहुत विश्वास और भरोसा की मैं उन्हें कहीं जाने नहीं दूंगा।
एक माह बाद अपने आप उठे, बाहर जाऊंगा, कुर्सी पर बैठे। कैथेड्रल को मैं कुर्सी के पास नीचे टिका देता। वहां अखबार पढ़ते, जरूरी होता तो ही आवाज देते अन्यथा नहीं। समझते सभी व्यस्त हैं अपनी दुनिया में। और घर में था भी कौन? मैं और आदरणीय मम्मी जी, श्रीमती बीना अवस्थी, हम दोनों ताऊजी, जिन्हे ऊपर से बाबूजी, पिताजी कहा है, की सेवा करते, पर यह सेवा नहीं मानता मैं। क्योंकि परिवार के बुजुर्ग और किसी भी सदस्य की बीमारी या आवयश्कता के वक्त उनका ख्याल रखना, उन्हें दवाई और भोजन समय पर देना यह तो हमारा नैतिक दायित्व और कर्तव्य भी है। यही हमारी प्राचीन भारतीय परम्परा भी है। तो पांच महीने बाद ही वह सहारे से छत पर जाने लगे और सुबह नौ से साढ़े दस बैठते। वहीं उनकी चाय, नाश्ता, दवाई मैं दे देता। फिजियोथैरिपी भी प्रारंभ करवाई। अविनाश आता और पचास मिनट उनकी मालिश करके उन्हें टहलने ले जाता। मैं साथ रहता की कहीं गिर न जाए। होली अभी आ रही है पर उनके समय होली आई तो वह कमरे में बैठे हुए ही होली किए। दीपावली का भी नंबर आएगा यह मेरा विश्वास था।
अनुज मनोज, राजीव हाल चाल पूछते देखते। चाचा परिवार, जो पास ही में रहता, आ जाते हालचाल पूछते। बहन सरोज, विकास, बहु आशी कभी कभी आतीं।
जो आए उनका भी आभार जो नहीं आए उनका भी करते हुए धैर्य से मैं इंतजार करता की कब यह अपने सहारे बाहर सड़क तक जाएंगे आएंगे?
बीच में दाढ़ी केश के लिए नाई डबल कीमत तीस सौ रुपए में आता। वह भी दूर से क्योंकि आसपास के सेलून, भले ही छोटी सी गुमटी हो, आने में आनाकानी करते, भगवान भला करे उनका, तीन तीन बार कहने जाता पर वह नहीं आते। आज भी मेरे फोन में उन लोगों के नंबर सुरक्षित हैं।
जब ठीक होने लगे तो वॉकर के सहारे हमारे बरामदे तक आते और वहां खड़ी मेरी नैनो कार में बैठ जाते और वैसे ही मैं कार नीचे उतारता। फिर उन्हें लेकर जाता सेलून। आराम से बाल दाढ़ी बनवाते और कारीगर की तारीफ करते। वहां से उन्हें सावधानी से गाड़ी में बैठाकर घर नहीं बल्कि कुछ दूर बाजार घुमाने ले जाता। रामगंज बाजार, जॉन्सगंज, केसरगंज थोड़ा जूस पिलाकर ले आता। इतने बढ़िया और राजा इंसान की एक एक पैसा खुद का व्यय करते। उल्टे मुझ पर भी खर्च करते। मैं कहता कमाता हूं, मेरे पास है, नहीं चाहिए। नहीं मानते हर चीज के पैसे पहले देते। महीने में दो बार कैथेड्रल बदलवाने जाना पड़ता। सिलिकॉन का अच्छा होता है कम नुकसान करता है। यह सब तभी जाना मैंने। फिर अप्रैल से वह सब हट गया।
ठीक होने लगे। बुलंद आवाज पूरे घर में गूंजने लगी। मुझे निराला का विराट व्यक्तित्व और जय शंकर प्रसाद का पहलवानी वाला शरीर याद आता। बुलंद आवाज और मजबूत शरीर, बीमारी के बाद भी कमजोर नहीं हुए, हड्डियां नहीं दिखीं। ईश्वर की इतनी ही कृपा रही। इरादा था कि जल्द अच्छे हो जाएंगे तो उन्हें अहमदाबाद छोटे भाई डॉ.राजीव अवस्थी, जुलु घर का नाम, के पास ले जाऊंगा। पहले भी चार पांच वर्षों से उन्हें कभी वाराणसी बुआजी के लड़के दिवाकर शुकुल के यहां, तो कभी भोपाल जब भाई वहां था, अहमदाबाद भी ले गया हूं। ताई जी, श्रीमती शकुंतक देवी जिनका मुझ पर मातृतुलय से भी अधिक स्नेह था, मुझे कहकर गई थी, " संदीप अपने अऊआ का ख्याल रखना lयह जो मांगे इन्हें देना, जहां जाना चाहे तू लेकर जाना। जो तुम खाओ वहीं इन्हें भी खिलाना। " ताई जी बुढ़ापे में कैसे खाएगे जो हम खाते हैं ? मेरे मासूम सवाल पर वह हंसी और स्नेह से बोली, " यह सब खा लेंगे तुम बस दे देना इनको। " उस वक्त मैं समझा, कुछ नहीं समझा कि ताई ऐसा क्यों कह रहीं? अच्छी भली हैं। वर्ष दो हजार पांच था।
पर अगले ही वर्ष वह आंगन में बात करते करते ही चली गईं। कोई भी सुख, आनंद देखे बिना। क्योंकि तब तो दोनों छोटे भाईयों का विवाह भी नहीं हुआ था। ताऊजी का मोन दर्द अब समझ आता है। जब एक मात्र साथी चली जाए बीच में छोड़कर। पर वह मजबूत और आत्मविश्वास से भरपूर थे। क्योंकि बचपन में ही उन्होंने बाबा को कंधा दिया, फिर एक बुआ को भी, तो दुख कभी भी जाहिर नहीं करते। पर ताई जी उनकी पीछे से देखभाल का पक्का इंतजाम कर गईं थी। मैंने पूरी ईमानदारी से जो कुछ भी मैं खाता पीता, घूमता उन्हें भी देता। पूरी ईमानदारी से। हमेशा उन्हें पहले देकर आता। मेरी मम्मी जी, मुस्कराते हुए कहती यह तो हमारा भी खाने का हिस्सा अपने ताऊजी को दे आएगा। सारा घर यह पिछले अठारह वर्ष में समझ गया कि ताऊजी यानि संदीप और संदीप यानि ताऊजी।
हर बात, हर चीज का समाधान था उनके पास।
रेलवे में भर्ती हुए आजादी के पूर्व फिर अपनी मेहनत और लगन से रेलवे के दबंग अफसर, बनकर सेवानिवृत्त हुए। जनसंघ के समय से जुड़े रहे l। सन चौहेतर की जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में हुई रेल की चक्का जाम स्ट्राइक में भाग लिया। इंदिरा सरकार ने लाखों रेल कर्मियों को डराया। काफी ने समझौता किया काम पर लौट गए। पर श्री राम प्रसाद अवस्थी जी, मेरे ताऊजी, पिताजी पीछे नहीं हटे। जब तक दिल्ली में मांगे नहीं मांगली गईं।
जिन्होंने समझौता किया था उनके लड़कों को रेलवे में नौकरी दी गई। पर यह मजदूरों के हक में खड़े रहे। फिर तब से आखिरी सांस तक बीजेपी के सक्रिय कार्यकर्ता रहे। हर जगह अपने निशान और अपनी ईमानदारी की छाप छोड़ी। हमें कभी पता नहीं चलने दिया कि यह हमारे बाबूजी इतनी बड़ी हस्ती हैं। वह तो बीमार पड़े तो लोग देखने आए तो उन्होंने बताया कि, बाबूजी ने बूथ लेवल के कार्यकर्ता के रूप में दस लोकसभा और बारह विधानसभा चुनाव में जिम्मेदारी निभाई। कभी भी कांग्रेस के फर्जी वोटो को पड़ने नहीं दिया। यह वह दौर था जब जनता पार्टी दो से तीस सीटों पर थी। उसका संगठन इतना मजबूत नहीं था। कांग्रेस के पास फौज थी, मसल पावर थी। एक घटना का जिक्र करूंगा जब वह ठीक हो रहे थे तो एक कार्यकर्ता आया दिलीप शर्मा, बाबूजी के पैर छुए और जो कहा मेरी आँखें भीग गईं, बोला, " बाबूजी तो हमारे आदर्श रहे हैं। हम पंद्रह बीस वर्ष के थे और कोने में रहते, सीखते पर अवस्थी बाबूजी दबंग, निडर। फर्जी वोट जब आते यह बेधड़क एतराज करते रुकवाते। एक बार नहीं रुके क्योंकि उस वक्त डबल इंजन की सरकार कांग्रेस की थी। तो जब कलेक्टर राउंड पर आया तो आप एक सहयोगी साहनी जी को लेकर
कलेक्टर की गाड़ी के आगे लेट गए की यह धांधली बंद करो। मेरी पार्टी इस बेइमानी को सहन नहीं करेगी। "
कार्यवाही हुई। सारे बूथों की गड़बड़ी बंद हुई। भले ही भयंकर और ताकतवर कांग्रेसी उन्हें घूरते और देख लेने की धमकी देते रहे पर वह निडरता से सामना किए।
आज दो हजार पच्चीस है जब मैं यह लिख रहा हूं। दो वर्ष पूर्व ही यह सब मुझे पता चला अन्यथा घर में कभी कोई जिक्र नहीं। बाहर की बातें बाहर घर में आते ही वह हमें आशीर्वाद देते, हमारी पढ़ाई, लिखाई पूछते। अपनी पोती, प्राची अवस्थी को घुमाने ले जाते। मूल्य बचे थे और आंख की शर्म बाकी थी तो कोई हमला बमला नहीं हुआ उन पर। पर बीजेपी पार्टी ने इनकी निष्ठा और हौंसले की कद्र की। जो अजमेर से विधायक, मंत्री बने नवल राय, झमनानी, श्रीकिशन सोनगरा, अनीता भदेल, वासुदेव देवनानी सभी तक इनकी चर्चा और पहुंच रही। आज जो आप देखते हैं कार्यकर्ताओं को छोटे छोटे काम के लिए इधर उधर धोक लगाते वह कभी भी उन्होंने नहीं किया। राजनीति में निस्वार्थ आए थे, किसी भी काम या लाभ के लिए नहीं।
चार बार टिकिट ऑफर हुआ
________________________अपने देश, नगर, वार्ड और लोगों की बेहतरी हो तो सबका विकास होगा। उन्हीं सब में मेरा भी विकास निहित है। ऐसी सार्वभौमिक सोच के धनी श्री रामप्रसाद अवस्थी जी कई बार अटल बिहारी वाजपई से वन टू वन मिले वह भी अस्सी के दशक में। बस ऐसे ही। क्योंकि वह भी कान्यकुब्ज ब्राह्मण और हम भी। बहुत कम लोग जानते हैं कि कानपुर में अटल जी को एम ए में जिन प्रोफेसर ने पढ़ाया था वह कौन थे? अटल जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह घटना सामने थी। प्रोफेसर मदन मोहन पांडे, हमारे सगे फूफाजी और बाबूजी के बड़े जीजाजी थे। उन्होंने अटल जी को एम ए राजनीति विज्ञान में पढ़ाया था। उनके सुपुत्र डॉ.राधे श्याम पांडेय, फैजाबाद में चालीस वर्षों से पांडेय नर्सिंग होम चला रहे। क्योंकि यह संस्कार पांडेय जी, फूफाजी ने दिये की विदेश से एमबीबीएस करने के बाद भी गांव और देश के लोगों को अच्छा इलाज मिले, तो यही भारत में रहो। और करीब आधी शताब्दी पूर्व के फैजाबाद में उन्होंने जाने का फैसला किया और आज भी राम लला ने उन्हें वहां खूब जमा रखा है। गरीबों का दशकों से निःशुल्क इलाज करते हैं। अब तो उनके बेटे बहु भी वहीं सेवा दे रहे।
हुए ऐसे लोग जिनकी ईमानदारी, निष्ठा और सेवा भावना का साया हम पर भी रहा। सदैव अपने बूते और योग्यता के बल पर ही आगे बढ़ना है । जो अपने पास है उसी में संतुष्ट और सुखी रहना है। कभी दूसरों के घर में तांका झांकी नहीं। हमेशा शाम को घर के अंदर रहो। कोई ऐब नहीं। कभी पान तक नहीं खाया। डैडी जी श्री रामगोपाल अवस्थी से बहुत बनी और ऐसी बनी कि करीब पैंतालिस वर्ष पूर्व से ही ताई जी मम्मी जी का एक ही चूल्हा रहा। वह अपनापन हमेशा बना रहा। चाचा जी श्री रामचंद्र अवस्थी से भी स्नेह रहा। मेरा उनके साथ जन्म से अब तक रहा। जिसे मैं सौभाग्य मानता हूं।
दो बातों का खास जिक्र। आप आजादी के वक्त करीब उन्नीस वर्ष के थे। निसंदेह जो बताया मैने, तबके युवा, पहलवानी करते, रेलवे में नौकरी करते दबंग स्वभाव के इन्होंने निसंदेह आजादी की लड़ाई में योगदान दिया। अंग्रेजों का विरोध किया गांधी बाबा का साथ दिया। पर कभी भी, जब भी केंद्र सरकार ने मांगी सूची या आवेदन आपने नहीं किया। कई इनसे चार पांच साल छोटे लोग जो आजादी के वक्त दस वर्ष के रहे होंगे वह तिकड़म भिड़ाकर स्वतंत्रता सेनानी का ताम्र पत्र, अन्य लाभ और पेंशन आजीवन लेते रहे। इन्होंने कभी परवाह नहीं की, न ही उन लोगों पर व्यंग्य किया। बोलते गरीब हैं, उन्हें जरूरत होगी तो आजादी की कीमत वसूल रहे। हमें ईश्वर ने जो दिया उसमें हम संतुष्ट रहे, यही मेरी मां (दादी जी )ने सिखाया। और यह आज सोचता हूं कुछ करना नहीं था। क्योंकि आजादी की लड़ाई का प्रमाण उस वक्त कौन कैसे रखता? किया यह लोगों ने देश भर में की, आयु प्रमाण पत्र, जो उनका रेलवे की नियुक्ति का था, दूसरे उसे डिप्टी कलेक्टर द्वारा सत्यापन, जो व्यक्ति को देखकर करता की हां, व्यक्ति सही कह रहा, आज अस्सी का है तो इस वक्त रहा होगा। बस वह प्रस्ताव ऊपर भेजता और दो माह में ताम्र पत्र समेत सब सुविधाएं। यह वास्तव में ऐसी ही मिट्टी के बने थे कि कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं। अक्सर कहते, आजादी की लड़ाई और स्वाधीनता की कोई कीमत होती है? कोई मातृभूमि की सेवा स्वार्थ के लिए करता है?
ऐसे रहे । और दूर क्यों जाएं यह बात अभी अभी दो वर्ष पूर्व पता चली कि पार्टी ने चार बार पार्षद टिकिट ऑफर किया। वह टिकिट जिसके लिए दस वर्षों से लोग मारामारी करते। जगह जगह धोक देते फिरते, भेंट पूजा करते पर नहीं मिलता। आपको ऑफर हुआ और चारों बार बस्ती के ही अन्य लोगों को दिला दिया खुद नहीं लिया। मैं पार्टी में सेवाभाव से आया हूं, अपने स्वार्थ के लिए नहीं। यह अलग बात है वह चारों, एक को दो बार मिला, चुनाव हारते गए जीते नहीं। पर उनके लिए भी निस्वार्थ और दिल से पार्टी के लिए सेवा की।
आज भी दिल्ली और जयपुर तक कई विधायक, मंत्री गण अवस्थी जी, एक ईमानदार पार्टी कार्यकर्ता के रूप में उनका सम्मान करते हैं। होता है न कि इज्जत कमाने में दशकों लगते हैं पर इन्हें तो जीवन भर मान सम्मान मिला। एक बेहतरीन ईमानदार, शुचिता और मूल्यों के पक्षधर रहे वह।
उनसे जुड़ी इतनी दिलचस्प और रोचक बातें हैं कि पूरी किताब बन जाए। पर फिर कभी आगे।
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(डॉ संदीप अवस्थी, आलोचक, कथाकार और मोटिवेशनल स्पीकर। देश विदेश से कई पुरस्कार प्राप्त ।
संपर्क 7737407061, राजस्थान )