Bihar Mein Bahar in Hindi Magazine by AMZAD ALI books and stories PDF | बिहार में बहार

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बिहार में बहार

   दिनांक 01 फरवरी को केंद्रीय वित्त मंत्री माननीय निर्मला सीतारमण द्वारा “बिहार” का नाम अपने भाषण में 08 बार लेना काफी आश्चर्यचकित करने वाला है। एक तरफ जहां पूरे बिहार के लोगों में जो उम्मीद की नई किरण का आगमन हुआ है, ये फुले नहीं समा रहा है। कैमूर से लेकर किशनगंज तक, चंपारण से लेकर जिला बाँका तक हर तरफ मानो खुशी की लहर झूम पड़ी है। ऐसा लग रहा है, मानो दिवाली से लेकर छठ सब इसी माह में होली के रंग से रंगने को है। एक तरफ जहां बिहार की दयनीय स्थिति पर एनडीए सरकार की पहली पहल की जहां लोग तारीफ करते नहीं थक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ लोग इसे राजनीति रोटी सेंकने का नाम दे रहें है। मैं अपने इस लेख में विशेष रूप से हर उन पहलू को व्यक्त तथा व्याख्या करना चाहूंगा, जो बिहार में सही मायने में बहार लाने के लिए मील के पत्थर शामिल होंगे।

बिहार का आर्थिक इतिहास:

प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक, बिहार अपनी छवि, व्यवहार, कला–संस्कृति को लेकर भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में अपना लोहा मनवा चुका है। परंतु आज भी भारत का एक बड़ा तबका, क्षेत्रीयता को हावी रख के, बिहार से संबंध रखने वाले “बिहारी” लोगों को काफी घृणा की नजर से देखता है। ये ठीक वैसे है, जैसे हमारे देश के लोगों को पश्चिमी देशों के लोग देखते है।

बिहार शुरू से ही अपनी कृषि को लेकर जाना–माना जाता रहा है। मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत मगध की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर ही निर्भर थी। जिसके कारण राज्य के पास बड़ी मात्रा में कृषि योग्य भूमि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थी। सन् 1540 में, बिहार और उत्तरी भारत के शासक रहे शेरशाह ने विशेष प्रकार के कानून बनाएं, जिसका मुख्य उद्देश्य किसानों के साथ धोखा न होना था।

स्वतंत्रा के बाद, 1947–1979 के बीच में चीनी तथा वनस्पति तेल उद्योग अविभाजित बिहार के समृद्ध क्षेत्र थे। पचास के दशक के मध्य तक भारत के चीनी उत्पादन का 25% बिहार से आता था; बागवानी उत्पादों का 50% उत्पादन यहीं होता था। चावल और गेहूँ लगभग 29% थे और आज़ादी के बाद के दिनों में बिहार वास्तव में एक कृषि शक्ति केंद्र था। 1950 और 1980 के बीच राज्य के उत्तरी हिस्से को औद्योगिक बनाने के प्रयास किए गए: जिसमें बरौनी में एक तेल रिफाइनरी, बरौनी उर्वरक संयंत्र, बरौनी थर्मल पावर स्टेशन, फतुहा में एक मोटर स्कूटर संयंत्र, और मुजफ्फरपुर में एक बिजली संयंत्र, मुजफ्फरपुर और मोकामा में भारत वैगन एंड इंजीनियरिंग आदि प्रमुख है।

1980 से 1990 तक के भारतीय सरकारी डेटा, यह भी दर्शाते हैं कि अविभाजित बिहार के जीएसडीपी में राज्य की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के बावजूद इस अवधि में 72% की वृद्धि हुई। डाटा यह भी दर्शाता है कि 1980 और 1985 के बीच राज्य जीएसडीपी में 49% की वृद्धि हुई, जिसका अर्थ है कि 1980 के दशक की शुरुआत में भी अर्थव्यवस्था देश में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक थी। 1980 में अविभाजित बिहार की आबादी 70 मिलियन थी।

बिहार से झारखंड का विभाजन ( 15 नवम्बर 2000) :

सन् 2000 में, झारखंड का बिहार से अलग होना, बिहार को सबसे ज्यादा चोटिल किया । आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तीनों स्तर पर बिहार को इससे उभरना पड़ा। आर्थिक प्रभाव की बात करें तो, झारखंड में बिहार के प्रमुख खनिज संसाधन (कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, यूरेनियम आदि) स्थित थे, जिनसे बिहार को राजस्व प्राप्त होता था। विभाजन के बाद बिहार इनसे वंचित हो गया। साथ में बोकारो, धनबाद, जमशेदपुर जैसे औद्योगिक हब झारखंड में चले गए, जिससे बिहार में औद्योगीकरण और रोजगार के अवसर कम हो गए। जिसके फलस्वरूप बिहार को वित्तीय संकट और कृषि पर अधिक निर्भरता बढ़ाना पड़ा।

सामाजिक प्रभाव , झारखंड में मौजूद बड़े उद्योगों और रोजगार के अवसरों के चले जाने के कारण बिहार के लोगों को बड़े पैमाने पर अन्य राज्यों में पलायन करना पड़ा और बेहतर शैक्षिक और स्वास्थ्य संस्थान (जैसे- बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रांची और प्रमुख मेडिकल कॉलेज) बिहार से अलग हो गए, जिससे बिहार को नई संस्थाओं की जरूरत पड़ी। जिसके पश्चात असामाजिक संतोष और अपराध दर में काफी वृद्धि हुई।

राजनीतिक प्रभाव की बात करें तो, बिहार में जातीय और क्षेत्रीय राजनीति और अधिक प्रभावशाली हो गई, जिससे विकास योजनाएँ प्रभावित हुईं। इसके साथ प्रशासनिक चुनौतियां, राजनीतिक अस्थिरता देखने को मिली।

केंद्रीय बजट 2025: बिहार राज्य को क्या मिला?

केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026 के बजट में बिहार के लिए कई महत्वपूर्ण पहल की हैं, जिसमें एक नया मखाना बोर्ड, एक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा और मिथिलांचल क्षेत्र में पश्चिमी कोशी नहर परियोजना के लिए वित्तीय सहायता शामिल है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आईआईटी पटना में बुनियादी ढांचे का विस्तार करने और बिहार में राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी, उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान स्थापित करने की योजनाओं का भी खुलासा किया। बजट का एक प्रमुख आकर्षण बिहार में मखाना बोर्ड की स्थापना है। बताते चले कि, बिहार में खास–तौर पे मिथिलांचल मखाना उत्पादन के लिए सुप्रसिद्ध है। साथ में मखाना को जी–आई टैग भी प्राप्त है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पे इसे नई पहचान दिलाती है।

• बिहार में बढ़ती यात्रा मांगों को पूरा करने के लिए सरकार ने राज्य में ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे विकसित करने की योजना बनाई है। इसके अलावा, पटना हवाई अड्डे की क्षमता का विस्तार किया जाएगा और बिहटा में एक ब्राउनफील्ड हवाई अड्डा विकसित किया जाएगा।

• मिथिलांचल क्षेत्र में पश्चिमी कोशी नहर ईआरएम परियोजना को केंद्र से वित्तीय सहायता मिलेगी। इस पहल से 50,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर खेती करने वाले किसानों को लाभ होगा, बेहतर जल प्रबंधन सुनिश्चित होगा और कृषि उत्पादकता में वृद्धि होगी। साथ में बाढ़ में भी राहत मिलेगी।

• केंद्र सरकार ने, उच्च शिक्षा और शोध सुविधाओं को मजबूत करने के लिए, बजट में आईआईटी पटना में छात्रावास और बुनियादी ढांचे की क्षमता के विस्तार के लिए भी धन शामिल किया है।

• पूर्वी राज्यों के विकास पर केंद्रित सरकार की “पूर्वोदय” योजना के अनुरूप, बिहार को राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी, उद्यमिता और प्रबंधन संस्थान मिलेगा। सीतारमण जी ने कहा कि संस्थान खाद्य प्रसंस्करण गतिविधियों को बढ़ावा देगा, किसानों के लिए बेहतर आय के अवसर प्रदान करेगा और युवा उद्यमियों के लिए कौशल विकास करेगा।

बताते चले कि, जुलाई 2024 के बजट में, केंद्र सरकार ने बिहार में तीन एक्सप्रेसवे, एक पावर प्लांट, हेरिटेज कॉरिडोर, नए हवाई अड्डे और खेल बुनियादी ढांचे सहित परियोजनाओं के लिए 60,000 करोड़ रुपये से अधिक की घोषणा की थी। इस साल के अंत में राज्य में चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में नवीनतम बजट आवंटन बिहार की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए सरकार के प्रयास को दर्शाता है।

बिहार और भ्रटाचार

बिहार के झारखंड से अलग होने के तत्पश्चात बिहार में भ्रष्टाचार का उदय, बिहार को अंदरूनी स्तर पर कमजोर पड़ गया है। जिसका हर्जाना आज तक बिहार के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। आज भी इस बात का डर है कि जो बजट बिहार के लिए पास हुआ है, कही वो बड़े भ्रष्टाचारी मछली के भूख का शिकार न बन जाए। आज भी नाले के फंड से लेकर इंदिरा गांधी आवास योजना तक, सब में भ्रष्टाचार इतना घुल चुका है कि उन लोगों तक सरकारी योजना पहुंच ही नहीं पा रहा, जिन्हें इसकी काफी आवश्यकता है। ये तो छोटे स्तर की बात है, अगर बड़े स्तर की बात करे तो न जाने कितने बड़े – बड़े मगरमच्छ जनता के पैसे को पचाने का मंसूबा तक तैयार कर लिए होंगे। केंद्रीय सरकार को हर संभव इसे रोकने का प्रयत्न करना चाहिए और इसमें लिप्त हर इंसान पे कठोर से कठोर करवाई करनी चाहिए।

निष्कर्ष:

अंत में, मै ये अपील करूंगा कि बिहार में शुरू होने वाले नई योजनाओं में जितना संभव हो सके उतना ही यहां के स्थाई लोगों को रोजगार के रूप में रखा जाएं। मजदूर से लेकर इंजीनियर, इंजीनियर से लेकर ठेकेदार, जहां तक हो सके बिहार के लोगों को अवसर मिले। सही मायने में “बिहार में बहार” तभी आ सकेगा जब यहां के लोगों को को यही पे रोजगार मिलेगा। अंत में,

दिनकर की रश्मिरथी है, है वो बुद्ध बिहार की भूमि में,

है आर्यभट्ट की खोज शून्य, कौटिल्य बिहार की भूमि में।

इस भूमि में गोबिंद सिंह और महावीर सा दृढ़ ज्ञानी,

है कुंवर सिंह की बहादुरी, राजेंद्र बिहार की भूमि में।

                            🖊️अमजद अली

                                (विधि छात्र)

                                अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी