Kutiya - 1 in Hindi Animals by Baalak lakhani books and stories PDF | कुतिया - 1

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कुतिया - 1

इस दिवाली की रात शायदा करीब करीब 2/3 बजे होंगे मेरी नींद खुल गई थी मे कमरे से बाहर निकला सोचा कुछ टहल के फिर बिस्तर पर गिरा जाए ताकि सुबह तक आंख ना खुले, हमारे प्लांट के कंपाउंड में चक्कर काट रहा था, दूर से बड़ी गाड़ी के हॉर्न की ओर दूर मिलों की सायरन बजती, कभी कभी तिमरो धुन बड़ी जोर पकड़ लेती थी तभी मेरे कानो मे कुछ दर्द से छटपटा रहा हो वैसी आवाज सुनाई थी मेने ध्यान लगाकर सुना कहा से ये आवाज आई देखा तो हमारे स्टोर रूम की तरफ से आ रही थी और वोह आवाज एक कुतिया की थी (कुतिया बड़ा ग़ज़ब का शब्द हे हमारा समाज अक्सर स्त्री को सुनाता रहेता है) लगा कुछ भारी समान के नीचे दब गई होंगी, वहा वेसे भी बहोत सा कबाड़ रक्खा हुआ है, तो एसा लगना मुजे लाजमी है, मे भागता हुवा ऑफिस की तरफ गया और वोह स्टोर रूम की चाबी लेकर आया और ताला खोला, और जेसे ही अंदर प्रवेश किया वोह कुतिया जोर जोर से भौंक ने लगी मुजे पर मानो उछल कर हमला ही कर देगी, पर मे वहीं खड़ा रहा उसे देखते हुवे, उसकी आवाज़ मे डर और दर्द दोनों महसूस हुवे मुजे, तो मेने उसे वहीं खड़े खड़े पूछकारा दो तीन बार तो, उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी सी हुई जेसे वोह जान चुकी हो के मे उसे आहत नहीं करूंगा पर दर्द के मारी चुप भी नहीं होती थी वोह मेरी और एक तस देख रही थी मेरी आंखे भी उसकी आँखों को देख रही थी आँखों मे आंसू थे उसकी, मे थोड़ा आगे बढ़ा सिटी बजते हुवे उसके नजदीक पहुंचा तो देखा तो वोह प्रसव की पीड़ा से दर्द मे थी वोह बच्चे को जन्म दे रही थी मेरा रोम रोम खड़ा होगया मेने ये नजारा कभी नहीं देखा था   कुछ एहसास को बया करने के लफ़्ज़ मेरे पास नहीं आप अंदाजा लगा लो, एक एक करके 6 पिल्लों को जन्म दिया मे तब तक धीमी धीमी सीटी बजाय खड़ा देख रहा कभी कुतिया पे तो कभी पिल्लों पे इतने छोटे छोटे ट्यूब लाईट की रोशनी में बड़े प्यारे लाग रहे थे वोह सारे पिल्लै दिल तो कर्ता था और नजदीक जाकर अपने हाथो मे उठालू, पर उसकी माँ की आँखों मे डर साफ साफ दिख रहा था उसके पिल्लों की सुरक्षा को लिये, मे मेरे मुह से सिटी बजा कर उसे शांत कर रहा था कि तुम्हें कुछ नहीं करूंगा नहीं तुम्हारे पिल्लों को ये बात शायद वोह मेरी आँखों मे पढ़ पा रही थी, तो वोह शांत हो रही थी, जानवर इतनी जल्दी हमारी आँखों को पाढ़ लेते हैं, जो इंसान कभी नहीं पढ़ पता, फिर बाहर आया कहीं से बोरी ढूंढ कर उसको उसके पास बिछा दिया, और दो कदम पीछे हट कर देख रहा था, क्या प्रतिक्रिया दे रही है ये सोच कर, कुछ देर में वोह खड़े होने की शक्ति जुटाकर खडी हुई और एक एक करके अपने पिल्लों को मुह मे दबोच कर उस बोरी मे रख दिया, मेरे मन मे तब डर लगा कि कहीं खुद के बच्चे को खा ना ले, पर माँ तो माँ होती है, इंसान हो या जानवर ममता मे कोई अन्तर नहीं होता, फिर मे वहा से दरवाजा एसे ही खुला छोड़ कर रूम मे अपने बिस्तर पर लौट चाला पर नींद तो मेरी कुतिया और उसके पिल्लों ने लूटी थी, आए कहा से सुबह होने का इंतजार मे करवट बदलता रहा,, सुबह की पहेली किरण निकली ही थी मेरे पेर वहीं चल पड़े मेरे पैरों की आहट सुनकर कुतिया ने भौंकना शुरू किया पर जब उसके सामने सिटी बजते पहुंचा तो शांत हो गई, वोह पहचान चुकी थी ये दुश्मन नहीं दोस्त है, उसके नजदीक जाकर बैठा कुछ देर हम दोनों एक दूसरे की आँखों मे झांकते रहे फिर मेने पिल्लों की ओर देखा बड़ा प्यार आ रहा था उन पर, वहा से निकला और बावर्ची को बताया अब मेहमान हे हमारे प्लांट पे तो उसके लिए खाना रखना रोज, गाड़ी की चाबी ली और दुकान की ओर गया दूध की थैली लाकर बर्तन मे खाली कर के कुतिया के सामने खड़ा रहा, वोह उठकर आई और लपक से दूध पीने लगी, बहोत भूख थी उसे सारा का सारा चाट कर गई