This [wife murder] shouldn’t happen often anymore in Hindi Book Reviews by Neelam Kulshreshtha books and stories PDF | अब ये अक्सर [पत्नी हत्या] नहीं होनी चाहिए

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अब ये अक्सर [पत्नी हत्या] नहीं होनी चाहिए

नीलम कुलश्रेष्ठ

[ हमारी हिंदी फ़िल्मों ने तो ऐसी फ़िल्में बनाकर अपना दायित्व पूरा किया है जिसमें पति पत्नी की हत्या करके सबूतों के अभाव में साफ़ छूट जाता है. इसी विषय पर बनी फ़िल्म `अक्सर`में दीनू मोरिया [ फिल्म के हीरो ]फ़िल्म में अपनी पत्नी हत्या कर देते हैं. इन्स्पेक्टर इमरान हाशमी सब उनकी चालाकी समझ जाते हैं कि किस तरह सबूत मिटाये गए हैं लेकिन फ़िल्म के अंतिम दृश्य में सिर झटक कर चल देतें हैं, "ये तो अक्सर होता रहता है। "-- इसी संवाद से प्रेरित शीर्षक ]

इक्कीस कहानी संग्रह की लेखिका `दम -बदम `कहानी संग्रह मेरे हाथ में है। सुप्रसिद्ध चित्रकार अमृता शेरगिल की बनाई पेंटिंग की अनुकृति कवर पर है। तीन साधारण औरतें -दुःख से पथराई --सूनी, निष्प्राण आँखें लिए। ग़नीमत है चार औरतों नहीं रची गईं, नहीं तो चारों दिशाओं में औरतों के दम बदम होने का भ्रम हो जाता। दीपक शर्मा की उन्नीस कहानियों के इस संग्रह की एक एक कहानी रीड़ की हड्डी के रोंये रोंये [ पता है ये होते नहीं है ] को सिहराती, दिमाग से उतरकर दिल को झकझोर रही है। कैरोसीन, चाकू, बन्दूक से की गई प्रचलित स्त्री हत्याएं तो हैं ही । ये स्त्री को दरी में लपेटकर घर के कुंए में [हिम्मत देखिये]डुबो देने से लेकर `मुलायम चारा `या`गुलाबी हाथी `समझ सरौंते, पत्थर, ईंट या ज़ोरदार मुक्के के वार से ऊपर पहुंचा देने की कहानियाँ हैं। यहां तक कि किसी स्त्री के विषय में शोर मचा दिया जाता है कि उस पर प्रेत छाया है और उसी प्रेत ने उसकी हत्या कर दी होगी। मैं इनकी एक अविस्मरणीय कहानी `प्रेत छाया `की बात कर रहीं हूँ वह इस संग्रह में नहीं हैं। और हाँ, हत्या से पहले उनके पर्स [प्रतीक धन का] को अपने पूरे कब्ज़े में ले लिया जाता है।

तब मैंने दीपक जी की दो तीन ही कहानियाँ पढ़ीं थीं।इनमें एक साम्य था -पत्नी हत्या। `हंस `में प्रकाशित कहानी `माँ का उन्माद `तो मैंने अपने सम्पादित कहानी संग्रह `रिले रेस `में ली थी। मुझे एक बात विचलित करने लगी कि क्यों हर तीसरी चौथी कहानी उनकी पत्नी हत्या पर होती है। दूसरी बात और अचंभित करती जब भी कथा लेखिकाओं की सूची बनती है या फिर कोई समीक्षक कथा लेखिकाओं पर लेख लिखता है तो एक नाम अवश्य नदारद रहता है वह है - दीपक शर्मा जबकि उनके प्रबुद्ध प्रशंसक ऐसे हैं कि ये नाम देखते ही पहले इनकी कहानी पढ़ते हैं। मैंने पत्नी हत्याओं पर और भी कहानियाँ पढ़ते हुये दीपक जी को सुझाव ही दे डाला कि इस विषय पर कोई कहानी संग्रह समाज को उसका चेहरा दिखाता प्रकाशित होना ही चाहिए। समस्या ये कि कौन इसे प्रकाशित करेगा ? वनिका पब्लिकेशंस की प्रकाशिका डॉ. नीरज शर्मा का नाम भी प्रस्तावित कर ही दिया क्योंकि स्त्री स्थिति के संबंध में वे कुछ विचारशील पुस्तकें प्रकाशित कर चुकीं हैं।

सन 1975 के आस पास की बात है। पापा की पोस्टिंग एक गांव में हो गई थी। गांवों की साफ़ सुथरी आदर्श छवि के टूटने के वो दिन थे। एक लड़के ने बताया था कि जो बैलगाड़ी वाला आपको लाया है उसने अपनी पत्नी को गलापाटी करके यानि दो डंडों के बीच उसके गर्दन फंसाकर मार डाला था। "

गाँव के पास हम एक मंदिर के दर्शन के लिए गए थे। खेत के बीच जली हुई काली घास थी, कुछ राख बनी। किसी ने बताया था, " दो दिन पहले फलांने ने अपनी पत्नी यहाँ जला दी थी। " वह गाँव बिचारा भोला नासमझ बना रहा। तब अक्ल कहाँ थी जो ये समझे कि इस वर्ष को क्यों `महिला वर्ष `घोषित किया गया है या गाँवों में, आदिवासियों में पत्नी हत्या ओझा से झाड़ फूंक करने के बहाने कर दी जाती है।। अब इसी विषय पर सन 2021 में में प्रकाशित पत्नी हत्यायों का ये एक दस्तावेज हाथ में आया है -जो सिहरा रहा है कि ये तो सिर्फ़ झलक भर है।

` घुमड़ी `नायिका घुमड़ी तपेदिक की मरीज़ है, उसके पति ने उसका लमछड़ी नाम रख रक्खा है। एक पुरानी हवेली के खस्ताहल मकान में जाने के लिए पैंतालीस सीढ़ियां चढ़नी पड़तीं हैं. इस कहानी के पात्रों, घर के अनुरूप विश्वसनीयत भाषा चमत्कृत करती है और हम काठ हो जातें हैं जब ये पता लगता है कि चूल्हे की तीन लकड़ियों से उसे क्यों जलाया जाता है ? परिवार `निगौड़ी `की नायिका के कूबड़ है। वह किस तरह मनोरोगी बन गई जो कि उसकी हत्या से कम नहीं है। वह पति को बच्चा नहीं दे सकती लेकिन पति पत्नी के परिवार की गोद ली हुई बेटी किरणमयी से संतान उत्पन्न करता है। लेकिन किरणमयी को इज़्ज़त की ख़ातिर कौन मारता है ? एक बहुत मर्मस्पर्शी व कटु यथार्थ है पति ने जब मनुष्य जात की अपनी प्रतिकृति दो बार अन्य औरतों से पा ली थी तो संतानहीन पत्नी का अपनी हॉबीज़ जैसे चिड़ियाँ, मछलियाँ, किताबें, रिकॉर्ड्स, फिल्मों से दिल बहुत बुरी तरह बेज़ार हो गया था।

`हिचर मिचर `की खलनायिका कोकिला चाची उन औरतों में से है जिन्हें ज़हरीली नागिन कहा जाता है। यदि आपने कोई ऐसी औरत न देखी हो तो आप विश्वास भी नहीं कर सकते कि घर के दो मर्दों से शादी बनाकर विधवा हुई कोकिला चाची घर के अकेले विवाहित मर्द पर भी इस कदर ख़ौफ़नाक ढंग से शिकंजा कसा है कि वह सरौंते से अपनी पत्नी की जान ले लेता है।

`कार्टून` में एक प्रसिद्द कार्टूनिस्ट हमेशा अपनी माँ की दी हुई सीख से कार्टून बनाती है क्योंकि वे उससे कहतीं थीं, "कागज़ पर चेहरे ऐसे लाओ जैसे तुम्हें नज़र आतें हैं। ऐसे नहीं जैसे लोग उन्हें पहचानते हैं। "वे बिचारी अपने पति को अच्छी तरह जानती थी लेकिन अनन्नास काटने वाली छुरी के वार से अपने को कहाँ बचा पाई ? `हमिंग बर्ड्स` में वह बदमाश जीजा भी है जो दो वर्ष में दूसरी बार विधुर हुआ है लेकिन पत्नी की मृत्यु के कुछ दिन बाद ही छैल छबीला बनकर घर से बाहर जा रहा है। कहानी में इन चिड़ियों के माध्यम झलक दिखाता संकेत है कि जीजी की हत्या कैसे हुई होगी और क्यों ? ` मिर्गी `कहानी दिलचस्प है जो ये बताती हैं कि माँ काम से बचने के लिए मिर्गी का स्वांग करती है, तो बेटी भी उसकी नक़ल कर सकती है। पढ़िये इस कहानी में कि माँ की हत्या पिता क्यों कर देता है।

मूल विषय से अलग कुछ कहानियाँ है `ऊंची बोली` जिस में आज के बाज़ार में उतरी अपनी बोली लगाती कस्बाई औरत है। घर में बढ़ते ऐशो आराम के कारण पति व सास होंठ सीये हैं लेकिन ऐसी औरतों की हत्या का कारण हो जाता है उनका किसी और से गर्भवती होना, यहाँ तो हत्या इतनी निर्मम है कि शरीर को दो टुकड़ों में काटकर चेहरा बिगाड़कर अलग अलग स्थान पर फेंका जाता है, वह तो भला हो डी एन ए टेस्ट का वरना सुराग ही नहीं लगता कि ये शरीर किसका है। गर्भवती तो एक एस. पी .से `नौ, तेरह बाईस ` [ मुहावरे का अर्थ --असली बात होशियारी से छिपाकर दूसरी बातों में उलझ लेना ] की उस कसबे में अकेली रहकर नौकरी कर रही युवा लड़की के लिए ख़तरनाक साबित हो जाता है जिस पर वह क्रश करती थी । `उसे अपने घर में सामान जलाने की आदत हो गई थी `--पुलिसवाले के लिए कौन सी बड़ी बात है ऐसे झूठे सबूत जुटा लेना, उसे जला देने के बाद ? पिता चाहे तो अपनी लड़ाई जारी रख सकता है. इस संग्रह में अलग तरह की `भूत बाधा `है जिसमें एक किशोर बच्ची की लाश नाले में पड़ी मिलती है। कहना न होगा कि आज भी परिवार वालों की ज़रा सी असावधानी से बच्चियां गायब कर उनके साथ क्या व्यवहार किया जाता है। ?, `बंधी हुई मुठ्ठी `में बेटी के प्रेमी की हत्या कनेर, आक के डंठल, हुर हुर पीसकर उसे खाने में मिलाकर कौन करता है ? इन चीज़ों के विषैले पन की जानकारी भी नई बात है.

इन कहानियों की पढ़ना ऐसा है कि आप किसी तिलस्मी दुनियां में गोल गोल घूमती भाषा से गुज़रते प्रवेश कर रहे हैं। रास्ते में आपको शोध मिलेंगे, चाहे वह तपेदिक या मिर्गी के विषय में हो या ट्रक की तकनीकी जानकारी हो या बर्मा [आज का म्यांमार ] में चावल का व्यापार हो या सफ़ेद, काले कपड़ों के पहनने वाले की बात हो ---. मनुष्य की `भीमरथी `[कहानी -`कबीर मुक्त दीवार संकरा --` हत्या में पति के साथ सास की भी मिलीभगत ]अवस्था क्या है ? सिर्फ़ मारपीट से अचेत हुई स्त्रियां चिता तक पहुंचा दी जातीं हैं। इस तरह इतनी गूढ़ बात कहती तिलिस्मी कहानी सिर्फ तीन चार पृष्ठ में आपको सकते की हालत में डालकर चुप। इतने कम शब्दों में कहानी कहने का ये हुनर सिर्फ़ अप्रतिम कथाकर दीपक शर्मा जी का हो सकता है।

[ हमारी हिंदी फ़िल्मों ने तो ऐसी फ़िल्में बनाकर अपना दायित्व पूरा किया है जिसमें पति पत्नी की हत्या करके सबूतों के अभाव में साफ़ छूट जाता है. इसी विषय पर बनी फ़िल्म `अक्सर `में दीनू मोरिया [ फिल्म के हीरो ]फ़िल्म में अपनी पत्नी हत्या कर देते हैं . इन्स्पेक्टर इमरान हाशमी सब उनकी चालाकी समझ जाते हैं कि किस तरह सबूत मिटाये गए हैं लेकिन फ़िल्म के अंतिम दृश्य में सिर झटक कर चल देतें हैं, "ये तो अक्सर होता रहता है। "-- इसी संवाद से प्रेरित शीर्षक ]

इस सिहराने वाले डायलॉग को मैं कभी नहीं भूल पाती। `दम -बदम `का अर्थ है बकौल दीपक जी - एक के बाद एक .यदि सोचा जाए कि कुछ पत्नियाँ बमुश्किल सांस लेते लेते यानि दम लेते लेते ऊपर पहुंचाकर बेदम कर दे जातीं हैं।।सच ही कस्बे, शहर, महानगर में होतीं एक के बाद एक पत्नी या स्त्री हत्यायों के कितने अपराधी जेल तक जा पाते हैं ?मीडिया, राजनीति या व्यवसायियों के कुछ चेहरे आपके सामने घूम गए होंगे । मैंने विदेशी साहित्य तो अधिक नहीं पढ़ा इसलिए दीपक शर्मा जी के नए कहानी संग्रह `पिछली घास `के गगन गिल के लिखे ब्लर्ब के अंश को यहां दे रहीं हूँ :

" मुझे दीपक शर्मा सन 1990 की अपनी पहली कहानी से अब तक लगातार विचलित करती रही हैं । इतना स्तब्ध और विमूढ़ मुझे केवल सआदत हसन मंटो ने किया है या अर्जेंटीना की अद्वितीय कथाकार सिल्विना ओकैम्पो ने या अमेरिका की फ्लैनरी ओकोनर ने। हमारे यहाँ स्त्री विमर्श जिस भी पीड़ा और दंश में से निकला हो, उसे ऐसी सर्वव्यापी परिघटना में जिस तरह दीपक शर्मा ने अंकित किया है, उसका कोई जोड़ नहीं। उनकी कहानियां इतनी नुकीली हैं, इतनी मर्मभेदी, कि उनके असर से, उनकी अविस्मरणीयता से आप अछूते नहीं रह सकते। वह उन गिने-चुने हस्ताक्षरों में हैं जिनके बिना हिंदी साहित्य का समकालीन स्त्री विमर्श असम्भव है-गगन गिल."

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पुस्तक --`दम -बेदम `[कहानी संग्रह ]

लेखिका --श्रीमती दीपक शर्मा

प्रकाशक -वनिका पब्लिकेशंस, देल्ही

मूल्य --160 रु

समीक्षक --नीलम कुलश्रेष्ठ

पता -- सी 6--151, ऑर्किड हारमनी, 

एपलवुड्स टाउनशिप

एस.पी . रिंग रोड, शैला

शान्तिपुरा सर्कल के निकट

अहमदाबाद -380058 [ गुजरात ]

Mo. N. -09925534694

e-mail –kneeli@rediffmail.com