nakl ya akl - 36 in Hindi Fiction Stories by Swati Grover books and stories PDF | नक़ल या अक्ल - 36

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नक़ल या अक्ल - 36

36

पेपर क्लियर

 

नन्हें थके कदम से सोमेश के पास वापिस आ गया, उसका उतरा  हुआ मुँह  देखकर नन्हें  ने पूछा,

 

भैया, क्या हुआ? किताब नहीं मिली?

 

किताब तो मिल ही जाएगी, पर लगता है कुछ और खो गया है ।

 

क्या !!

 

यही तो समझ नहीं आ रहा, ।

 

भैया खुलकर बतायें, ऐसे पहेलियाँ नहीं बुझायें। तभी नंदन भी वही आ गया और नन्हें को गंभीर देखते हुए बोला,  “कुछ हुआ है क्या?”

 

पता  नहीं, यह भैया, क्यों अजीब-अजीब सी  बातें कर रहें  हैं । अब वह  भी नन्हें की तरफ देखने लगा  तो उसने कहा, “सोनाली और राजवीर  फिल्म देखने जा रहें हैं।“

 

तो इसमें कौन सी बड़ी बात है, वह तो पहले भी जा चुके हैं।

 

क्या !!! कब? नन्हें हैरान है।

 

अरे !! यार  ये सब लोग साथ गए थे,  सोना, रिमझिम वो राजवीर, उसके दोस्त रघु हरिहर और माधुरी।

 

कहाँ गए थे ?

 

अपने गॉंव के बाहर जो सिनेमा है, वही गए थें ।

 

क्या ज़रूरत थी? नन्हें की त्योरियाँ चढ़ गई ।

 

देख !! यार, वो हमारे दोस्त है, ग़ुलाम नहीं है और पिक्चर देखने में क्या बुराई है।  नंदन ने आराम से बैठते हुए कहा।

 

बुराई है, इस बार सिर्फ सोना और राजवीर जा रहें है और मुझे उस कमीने राजवीर की नीयत  ठीक नहीं लगती।  निहाल अब भी गुस्से में है। 

 

नन्हेंतू कहना क्या चाहता है? अब नंदन भी सोच में पड़ गया। 

 

अब उसने पेड़  के पास सुनी बात उसे बताई। 

 

अच्छा !! इसका मतलब राजवीर सोना पर चांस मारना चाहता है।

 

नहीं चांस से ज़्यादा, नंदन तू पता कर, दोनों कब और कहाँ जा रहें हैं। 

 

अरे वाह नन्हें  भाई। आप तो अभी से पलिस बन गए। सोमश बोल पड़ा।

 

मैं तुझ पता लगाकर बता भी दूँ तो तू क्या करेगा? सोना तेरे साथ तो रिश्ते में नहीं है, क्या पता उनके बीच कोई चक्कर चल रहा हो। 

 

नन्हें ने उसे बुरी तरह घूरा।  “मैं नहीं मानता कि उनके बीच कुछ है, बस तू  पता लगा, बाकी सब मैं देख लूंगा।“  नंदन ने हाँ में सिर  हिला दिया।

 

नन्हें के घर में बुआ जी को छोड़कर, बाकि सभी रिश्तेदार जा चुके हैं। सरला खाना बना रही है और काजल उनकी मदद कर रही है । राधा सबकी थाली  में खाना परोस रही है। जब सब खाना खाने बैठे तो किशोर ने हिम्मत करकर अपने बापू से कहा,

 

बापू मैं नैनीताल जाने की सोच रहा हूँ। 

 

“क्यों? खेत के बीज लेने हैं।“  अब निहाल बोल पड़ा, “बापू  भाई भाभी को लेकर घूमने जाना चाह  रहें हैं।“ अब बुआ जी बोली, “यह फ़िल्मी ड्रामे कबसे शुरू कर दिए।“  “जीजी बिलकुल ठीक कह रही है। यह सब शहरी चोंचले है। 

 

“जब हम शहर जाकर पढ़ाई कर सकते है तो यह भी कर सकते हैं और मैं तो अपनी बीवी को ज़रूर घुमाने लेकर जाऊँगा।“  नन्हें के मुँह से यह सुनकर किशोर को थोड़ा होंसला  हुआ।  “बापू चार दिन की बात है, मना मत करो।“ किशोर ने अनुनय विनय के स्वर में कहा तो लक्ष्मण प्रसाद ने हाँ सिऱ हिला दिया।  किशोर खुश हो गया तो घूँघट में छिपे राधा के चेहरे पर भी रौनक आ गई। 

 

भाई! कब जाने का ईरादा है?

 

कल दोपहर तक निकल जायेंगे।  किशोर का ज़वाब सुनकर बुआ जी बोली, “अरे!! मैं तो कहती  हूँ मेरे साथ  पटना चलो।“ 

 

“पटना तो आते रहेंगे बुआ जी, अभी तो इन्हें यही जाने दो।“  निहाल ने ज़वाब दिया तो बुआ जी ने मुँह बना लिया। 

 

रात  को नन्हें को नींद नहीं आ रही है, अब छत पर सिर्फ काजल और वो ही सो रहें हैं। चाँद से नज़रें हटाकर निहाल ने मोबाइल में समय देखा तो रात के एक बजे हैं, “यह नंदन तो अब तक सो गया होगा।  इस नमूने ने अभी तक मेरा काम नहीं किया।“ यह सोचकर उसे गुस्सा आने लगा।

 

बिरजू  अपने घर की छत पर लेटा हुआ है, एक वही है जी छत पर सोना पसंद करता है।  बाकी  तो कूलर की हवा में  सोते हैं। उसे खुले आसमान के नीचे  सोना  अच्छा लगता है।  वह फ़लक पर बिखरे  चाँद-सितारों में अपना गुज़रा  हुआ अतीत देख रहा है। तभी उसे आसमान में एक चेहरा नज़र आता है और उसकी आँख में आँसू आ जाते हैं। "मैं बहुत जल्द तेरे पास आ जाऊँगा, फिर हम हमेशा साथ रहेंगे।" बिरजू ने धीरे से कहा, मगर उसकी आवाज़ छत पर गूँजने  लगी।  

 

सुबह जब बिरजू गोदाम में जाने के लिए घर से निकलने लगा तो उसके  बापू गिरधारी चौधरी ने उसे टोकते हुए कहा,

 

बिरजू तेरे काम का क्या हुआ?

 

आज जगह देखने ही जा रहा हूँ। 

 

शाबाश !! छह महीने में मुझे ऐसा काम जमाकर दिखा कि सारे गॉंव को पता चल जाए कि तू गिरधारी का बेटा है। उसने हाँ में  सिर  हिला दिया। उसके जाते ही मुरली तीन किसानों के साथ जमींदार के घर के बाहर आकर खड़ा हो गया। एक नौकर ने उसे, उनके आने के बारे में बताया तो उसने उन्हें अन्दर लाने के लिया कहा। अंदर आते ही मुरली ने उसके आगे हाथ जोड़े और बाकी किसानों ने भी सिर हिला दिया।

 

क्यों रे मुरली, आज सुबह सुबह  यहाँ का रास्ता कैसे भूल गया?

 

 किसानो को अपनी ज़मीन के कागज़ वापिस चाहिए। 

 

इन्होंने म्हारे से कर्जा लिया है। 

 

वही वापिस करने आए हैं।  मुरली के यह कहते ही उसके साथ आए तीन किसानों ने पोटली उसके सामने रख  दीं ।  

 

क्यों क्या कोई लॉटरी लगी है?

 

“सरकारी बैंकों ने किसानो के लिए योजना निकाली है, उस योजना की वजह से इन्हें बैंक से लोन मिल गया इसलिए आपका कर्जा वापिस करकर, अपनी ज़मीन पर ख़ुद खेती करेंगे।“ जमींदार की त्योरियाँ चढ़ गई, न चाहते हुए भी उसने मुंशी जी को कागज़ लाने के लिए कहा तो वह तीनों किसानों के ज़मीन के कागज़ ले आया और उसने वे कागज़ किसानों को पकड़ा दिए । अब मुरली और वे किसान हाथ जोड़कर  वहाँ से निकल गए।  यह सब राजवीर और सुधीर भी देख  रहें हैं। सुधीर गुस्से में बोला, “मैं न कहता था कि एक तारीख डाल दो कि इतने तक कर्जा नहीं लौटाया तो ज़मीन अपनी, मगर आपने मेरी एक न सुनी।“ “अपना मुँह बंदकर बावली भूत, अपने बाप को मत सीखा कि करना क्या है।“ उसने सुधीर को बुरी तरह डाँटा तो वह मुँह बनाते हुए वहाँ से निकल गया, “एक बार अपना राजवीर पुलिस में लग जाए तो सारे गॉंव वालों की हेकड़ी निकाल दूँगा। ऐसा केस बनवाकर, इस मुरली को जेल में डलवाऊँगा कि जेल में तेरी सारी नेतागिरी निकलजाएगी। मेरे से ज़्यादा तो बापू मेरे पुलिस में जाने का सपना देख रहें हैं, मगर क्या मेरा पेपर क्लियर होगा??? वहीं खड़ा राजवीर यह सोचते हुए परेशान होने लगा।