Sabaa - 10 in Hindi Philosophy by Prabodh Kumar Govil books and stories PDF | सबा - 10

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सबा - 10

राजा कुछ बेचैन सा था। दोपहर बाद जब ग्राहकों की भीड़ कुछ कम हुई तब वह कौने वाले शोरूम तक पहुंच कर एक छोटा सा सुंदर पर्स खरीद भी लाया था और उसे सुंदर सी पैकिंग में भी डलवा लाया था। उसे ये तो नहीं मालूम था कि बिजली के पास इस पर्स में रखने लायक पैसों की बचत कब तक होगी लेकिन वो ये ज़रूर जानता था कि इसे देख कर बिजली बेहद खुश ज़रूर हो जायेगी।
जन्मदिन पर प्रेमिका प्रेमी से कुछ पाकर खुश होती ही है। और उसकी इस खुशी से राजा को ये मौक़ा हासिल हो जायेगा कि तत्काल उसे बांहों में कस कर चूम ले।
राजा के भीतर सरे शाम से ही ये खलबली मची हुई थी कि जैसे ही ड्यूटी ख़त्म हो, वो जल्दी से जाकर बिजली से मिले।
आज बिजली का जन्मदिन था। कल थोड़ा शरमाते सकुचाते हुए बिजली ही उसे बता बैठी थी कि आज उसका जन्मदिन है। तब राजा ने हुलस कर उसे कहा था कि तब शाम को हम दोनों कहीं घूमने चलेंगे और खाना बाज़ार में कहीं साथ में खायेंगे।
बिजली राजा के इस प्रस्ताव पर शरमा कर लाल हो गई। आज तक तो उसका जन्मदिन इस तरह कभी मना नहीं था। ज़्यादा से ज़्यादा कभी हुआ तो मां घर में गुड़ का हलवा बना देती और मन जाता था जन्मदिन। आज राजा की बात सुन कर बिजली फूली न समाई। बल्कि राजा तो चाहता था कि आज बिजली को सिनेमा दिखाने ले जाए। पर ये तो बहुत दूर की कौड़ी थी। बिजली को इतनी रात गए तक घर से बाहर कौन रहने देता? रात गहराते ही चमकी चुगली करती और दोनों मां - बेटी उसे ढूंढने निकल पड़तीं। बापू से सारी बात छिपाई जाती।
इससे तो अच्छा था कि राजा और बिजली कहीं कुछ खा- पी कर आ जाएं। इतनी देर राजा के साथ रहेगी यही क्या कम था।
लेकिन अब ये नई मुसीबत आ पड़ी। राजा की दुकान के सुपरवाइजर ने दोपहर बाद ही राजा को बता दिया कि आज उसे किसी ज़रूरी काम से बाहर जाना है इसलिए जब तक वह वापस लौट कर न आ जाए राजा वहीं रहे।
बस इसी बात को लेकर राजा शाम से परेशान था। ये मैनेजर न जाने कब वापस आए और राजा को न जाने कितनी देर तक वहां इंतज़ार में बैठे रहना पड़े। राजा सुपरवाइजर को सिर्फ़ मैनेजर साहब कहता ही नहीं था बल्कि उसे उनका हर हुकुम मानना भी पड़ता था। उनकी बात न मानना राजा की नौकरी के लिए बड़ा जोखिम था। यही कारण था कि राजा बेचैन था।
राजा को यह भी अच्छी तरह मालूम था कि अगर वह ऐसी बात बिजली को फ़ोन से भी समझाएगा तो वो बिल्कुल नहीं मानेगी। हो सकता है कि बिजली फ़ोन लाई ही न हो। क्योंकि जब उसे शाम को थोड़ा देर से घर लौटना था तो फ़ोन रखना अच्छा नहीं था। एक तो चमकी फ़ोन के लिए उसका इंतज़ार करती रहती, दूसरे कहीं से भी फ़ोन करके बिजली की खोज खबर लेती रहती। चमकी जैसी चालू लड़की के लिए फोनों की कोई कमी थोड़े ही थी। पास पड़ोस में उसके दोस्त और सहेलियां बहुत थे। फांदेबाज़ जो ठहरी।
तय था कि बिजली फ़ोन लाई ही नहीं होगी।
राजा की बेचैनी ने उसकी उस छोटी सी खुशी को भी कम कर दिया था जो उसे बिजली के लिए गिफ्ट के रूप में पर्स खरीद कर मिली थी।
वह बैठा- बैठा कसमसा रहा था। दुकान के शीशे के दरवाज़े के पार से उसकी निगाह सामने वाली सड़क पर ही लगी हुई थी जहां से हर आने वाला स्कूटर उसे मैनेजर साहब का स्कूटर ही दिखाई देता था। शाम को देर हो जाने के कारण दुकान में ग्राहकों का आना - जाना तो बंद हो चुका था पर अकेला राजा सड़क की ओर टकटकी लगाए देखता हुआ बैठा था।
लो, मैनेजर साहब का तो अभी कहीं अता - पता नहीं था लेकिन सामने से उसे बिजली ज़रूर आती हुई दिखाई दी। शायद देर हो जाने से उसे ढूंढती हुई चली आई।