isn't it true in Hindi Anything by prabhat samir books and stories PDF | क्या यह सच नहीं

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क्या यह सच नहीं

डाॅ प्रभात समीर

कल्याणी अपने घर का ताला खोलने ही जा रही थीं कि तभी उनका मोबाइल बज उठा। एक डरी, सहमी, धीमी आवाज़ सुनाई दी। 

-‘मैडम, मैं अनीता.......मार डालेंगें......ये लोग मुझे मार डालेंगे। '

इस तरह के फ़ोन आते ही कल्याणी की त्योरी चढ़ने लगती और वह तुरन्त सक्रिय हो जातीं। अभी भी वह घर में घुसना ही भूल गईं। 

लड़की रोती जा रही थी। कल्याणी लड़की के अस्फुट वाक्यों को कठिनाई से पकड़ पा रही थीं-

-'मैडम, मैं अनीता । मेरा पति पुनीत और मेरी सास मुझे जान से मार डालेंगे। ’

-’जान से ?’ कल्याणी सहम गईं । भूख-प्यास, थकान भूलकर वह घर के दरवाज़े से ही लौट लीं। फ़ोन से ही वह पूरा घटनाक्रम जान लेना चाह रही थीं, लेकिन अनीता तो ढँग से बात ही नहीं कर पा रही थी । कठिनाई से अपने घर का पता बताते हुए उसने धीरे से कहा, ‘मैं कमरे में बन्द हूँ। ’

कल्याणी ने फ़ोन घुमाए, संगठन की सदस्याएँ जुड़ने लगीं । मीडिया को भी सूचना दे दी गई। पुलिस का सहयोग लेना है या नहीं, यह वहाँ के हालात पर निर्भर करता था। कल्याणी ने अपने दल सहितअपनी चाल तेज़ कर दी। अनीता को ससुराल वालों ने बन्द कर रखा है या भयवश वह स्वयं बन्द है, कुछ स्पष्ट नहीं था, लेकिन महिलाओं ने अनीता की यातनाओं और उसे कैद कर लिए जाने का भयानक ख़ाका खींच डाला । 

घरेलू हिंसा की शिकार ऐसी बेसहारा लड़कियों को बचाने के लिए वे लोग किसी भी सीमा तक जा सकती थीं । अभद्र, अपमानजनक भाषा, कभी शांत धरना, कभी उग्र प्रदर्शन, मीडिया, थाना, पुलिस, कानून जैसे सारे तरीके उनके पास थे । असहाय अनीता को सुरक्षित निकाल लाने में उन्हें ज़रा सा भी संशय नहीं था, संशय था समय पर न पहुँच पाने से लड़की का अनिष्ट हो जाने का। 

कल्याणी तो एक नहीं बल्कि कई ऐसे संगठनों से जुड़ी हुई थीं, जिन्होंने महिलाओं के हित को ही अपना एक मात्र लक्ष्य बना रखा था । उन्होंने रास्ता भर ऐसे कितने ही केस याद कर डाले जहाँ उन्हें जूझना बहुत पड़ा, लेकिन अंत में सफल होकर लौटीं। निर्भीक, निडर कल्याणी बेटियों की रक्षा के लिए तुरन्त कार्यवाही और तुरन्त फैसला सुनाकर पुण्य कमाने के भाव से हमेशा ही आत्ममुग्ध होती रही हैं। 

अनीता के पति, सास और परिवार के अन्य सदस्यों से टक्कर लेने की पूरी तैयारी कर ली गयी । लड़के और उसकी माँ की घेराबन्दी, अगर मिला तो आस-पड़ोस का साथ, अनीता को संरक्षण, पूरे घटनाक्रम को अपने ढँग से प्रभावशाली बनाकर जनता के सामने लाने के लिये मीडिया की स्वतंत्रता....तब भी अगर ससुरालवालों के हथकंडे नियंत्रण से बाहर रहे तो पुलिस की मदद....सब कुछ सोच लिया गया था । 

अनीता के घर का दरवाज़ा खुलने में ज़रा देर क्या हुई कि कल्याणी दल धैर्य खोने लगा । तभी एक बहुत शिष्ट, सुदर्शन युवक ने दरवाज़ा खोला। सामने सोफे पर एक सौम्य, सुन्दर प्रौढ़ महिला बैठी हुई दिखाई दीं। घर में अपूर्व शांति थी। दोनों को देखकर कल्याणी की हिंसक मुद्रा थोड़ी देर को थमी और तभी कई एक पाखंडी, बगुलाभगती पति, ससुर, सास, ननदें उनकी आँखों के आगे से घूम गये, जिन पर विश्वास करना उस घर की बहू को बहुत भारी पड़ गया था। अपनी नासमझी और उसके दुष्परिणामों को याद करके कल्याणी सिहर उठीं। उन्होंने उग्र होकर पूछा

-‘आप ही पुनीत हैं ?' फिर सोफे पर बैठी महिला की ओर इशारा किया,

-' यह आपकी माँ हैं?‘ पुनीत को बोलने का मौका दिए बिना कल्याणी ने फिर प्रश्न दागा ’-अनीता, आपकी पत्नी, कहाँ है ?’

-‘कहाँ क्या, घर में है। आप क्यों ............?’

पुनीत को अनसुना करके कल्याणी अनीता को आवाज़ देती चली गईं । संगठन की महिलाएँ भी एक स्वर में बोलीं

- ‘हमें अनीता से मिलना है, कोई बहाना नहीं ........। ’

-‘बहाना कैसा?‘, कहते हुए पुनीत ने फिर अनीता को पुकारा। अब तक सोफ़े पर बैठी महिला भी उठकर आगे आ गयीं, बड़ी मृदुता से बोलीं- ‘आप अनीता को जानती हैं ? कभी आपको देखा नहीं ?’’ कल्याणी का व्यंग्यात्मक स्वर उभरा - ‘अब देख भी लीजिये और पहचान भी लीजिये। ’

अनीता का उत्तर न पाकर, 'अभी तो पार्लर से लौटी है, देखता हूँ...'कहता हुआ पुनीत अनीता के कमरे की ओर बढ़ा। इतनी देर में कल्याणी ने चारों ओर नज़र दौड़ाई और बड़ी तेज़ी से पुनीत के पहुँचने से पहले ही कमरे के आगे जाकर खड़ी हो गयीं । पुनीत अनीता की चुप्पी से नहीं बल्कि इतनी भीड़ देखकर परेशान था । पुनीत की माँ भी बड़े प्यार से ’अनीता बेटा, अनीता बेटा’ पुकारती चली जा रही थी। । कल्याणी को सब कुछ बहुत नाटकीय लगा। उन्होंने उपेक्षा भाव से दोनों को देखा दरवाज़े से सटकर ज़ोर से कहा- ’अनीता, मैं कल्याणी। अब तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। ’

-‘आप ऐसा क्यों कह रही हैं ? अनीता का कोई क्यों कुछ बिगाड़ेगा?’- पुनीत की माँ ने संयत स्वर में कहा। 

दरवाज़ा अभी भी बन्द था। कल्याणी को बुरे ख़्याल आने लगे । पुनीत और उसकी माँ अनीता की इस चुप्पी से अप्रभावित थे। शायद अपने कमरे में बने रहना अनीता की आदत में शुमार था। वृद्वा ने सहजता से कहा- ’कई घण्टे बाद बाहर से लौटी है, थककर सो गई होगी। ’

- ‘सो गई है या कैद कर रखा है ?’ -‘कहीं हाथ और मुंँह तो नहीं बांँध रखे। ’

-'लड़की बेहोश तो नहीं हो गई। ’

- ‘कुछ खिला दिया क्या ?’

-‘कहीं फाँसी तो ......’

पुनीत पहली बार अशिष्ट हुआ- ‘यह कैसी बकवास है। थकी हुई थी, सो गई होगी। ’

-’सो गई या जाग रही है, आपको मालूम ही नहीं है ?’

वृद्धा अचरज में थीं - ‘इसमें मालूम क्या करना जी ?’

साथी महिलायें चीखीं - ‘ इन्हें पुलिस में दो। ’ कल्याणी अनीता से मिलने को व्यग्र थीं। 

पुनीत और उसकी माँ हक्के-बक्के खड़े थे। अनीता को तो घर में रहते हुये खूब सोने की आदत ही है तो आज उसकी नींद पर इतना बवाल क्यों? यह सब मजा़क था या कोई बहुत बड़ी साज़िश!'....सोचते हुए पुनीत के मुंह से निकल पड़ा- ‘यह कैसा फ्राॅड है ?’

महिलायें मधुमक्खियों सी पुनीत से चिपट गईं - ‘देखा, फ्राॅड की बात जुबान पर आ ही गई। ‘

पुनीत किसी आशंका से काँंप उठा। उसे अपने इर्द-गिर्द कोई शिकंजा कसता हुआ दिखाई देने लगा। अनीता के कहे ‘तगड़ा बैंक बैलेंस ‘शानदार गाड़ी’ ’नये ढंग का फ्लैट’ ‘विदेश यात्रा’ ’महंगी शराब, सिगरेट’ ' माँ और पुनीत से पैदा होती जाती ऊब'.....जैसे कई शब्द और मुद्राएं उसे याद आने लगे। अनीता की ऊँची उड़ानें, उसके महँगे शौक, उसका बढ़ता चला जाता असन्तोष और अपनी सामान्य पारिवारिक, आर्थिक स्थिति के बीच असंतुलित होकर वह भटकता रहा है। अनीता आए दिन उसमें, उसकी माँ में और शादी के इस बन्धन में ही अपनी अरुचि और विरक्ति दिखा चुकी है। मज़ाक- मजा़क में कई बार अपना जीवन-दर्शन सामने रख चुकी है - 'पुनीत मैं सिर्फ और सिर्फ पैसे से इंसान को आँकती हूँ । पैसा है तो इंसान भी भगवान है....'

लेकिन ये सब तो बन्द कमरों की बाते हैं, उन सबका अनीता की नींद से क्या लेना-देना ?

बदहवासी और शर्म माँ बेटे को घेरती चली जा रही थी फिर भी पुनीत को अनीता पर भरोसा था। अनीता के कमरे से बाहर आते ही वह सबकी बदसलूकी और बदतमीज़ी का जवाब देगा । अनीता की चुप्पी सभीकी परेशानी का सबब बन रही थी। पुनीत की माँ भी घबराकर बोलीं - ‘अनीता नींद की तो पक्की है पर फिर भी ----’ कल्याणी ने फटकार लगाई -’ चुप रहिये, अब हमें करने दीजिये। ’

दरवाज़ा तोड़ने और पुलिस को फ़ोन करने का निर्णय लिया गया कि तभी अस्त-व्यस्त, पसीने में लथपथ, रोती हुई अनीता सामने आकर खड़ी हो गई। सबने उसे घेर लिया और प्रश्नों की झड़ी लगा दी । अनीता न देख रही थी, न सुन रही थी। उसके शरीर पर जगह-जगह चोट के निशान थे, कई जगह नील पड़े हुये थे। वह एकदम मौन थी। सदमे में थी। मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के सारे सबूत कल्याणी के सामने थे। उसकी बदहाली उसकी सारी कहानी बयां कर रही थी । 

पुनीत,उसकी माँ हैरान थे, परेशान थे - ‘अनीता ये क्या हाल----’ कल्याणी ने धक्का देकर उन्हें एक तरफ़ किया--- ‘हमदर्दी छोड़िये। अनीता अब हमारे संरक्षण में है। हमें देखने दीजिये। ’ पुनीत और माँ फिर भी अनीता को संँभालने को आगे बढ़े। 

कल्याणी अनीता के मुँह से पूरा सच जानना चाहती थीं। सुबकती हुई अनीता एक ही वाक्य रुक -रुक कर बोलती जा रही थी---

-'मार डालेंगे, मुझे मार डालेंगे’। 

पुनीत की माँ फिर नहीं रुक पायीं---‘बेटा, कौन मार डालेंगे ?’

महिलायें पुनीत की माँ पर टूट पड़ीं। 

पुनीत और उसकी माँ के निर्दोष चेहरे और हाव-भाव की गिरिफ़्त में कल्याणी आतीं कि उससे पहले ही अनीता ने उन्हें अपनी पकड़ में ले लिया । उनसे चिपटकर वह थर- थर कांँपने लगी। कल्याणी का विवेक और विचारशक्ति अनीता के चक्रव्यूह में फंँसकर रह गये। 

अनीता को सहारा देकर घर से बाहर ले जाया जाने लगा। पुनीत और उसकी माँ ने रोकने का असफ़ल प्रयास किया, दोनों ही रोते हुए बोले,

---'बता तो अनीता, हुआ क्या है? हम तो तेरे लिए कुछ भी करने को तैयार हैं....'

अनीता ने उनकी ओर देखा तक नहीं । कल्याणी ही किसी शिकारी की तरह झपटीं -'ओह, कुछ भी करने को तैयार!'कहते हुए कल्याणी ने अनीता को पूरी तरह अपने संरक्षण में ले लिया । 

अखबारों, लोकल और राष्ट्रीय चैनलों ने भी मिर्च-मसाला लगाकर अनीता के केस को खूब उछाला । अनीता के पास पुनीत को दोषी सिद्ध करने के पूर्व नियोजित षड्यन्त्र के तहत जुटाए गये प्रमाण थे, महिलाओं का पूरा हुजूम था, मीडिया और पुलिस की धमकियांँ थीं । पुनीत के पास निरुत्तरता, हतप्रभता और भावनाएं थीं । पुनीत और उसकी माँ बहुत कच्चे और कमजो़र सिद्ध हुए । 

संगठन के खाते में एक और सफ़ल केस दर्ज हो गया । कल्याणी ने अपना दायित्व बख़ूबी निभाया । कुछ भी हो अब इस काम को वह एक खेल मानने लगी थीं, जिसे खेलते रहने में उन्हें बड़ा सुख मिलता था । कल्याणी की प्रसिद्धि और व्यस्तता दोनों ही बढ़ते चले जा रहे थे । 

आज भी वह थकी हुई घर के लॉन में निढाल पड़ी थीं । शरीर से ज़्यादा उनका मन थक जाता है । चोट किसी भी लड़की को लगे दर्द वह महसूस करने लगती हैं । 

कल्याणी कुछ उनींदी हो चली थीं कि तभी घर का गेट खुला । सामने से एक वृद्ध महिला आती हुई दिखाई दीं। महिला का चेहरा इतना गरिमामय था कि कल्याणी के हाथ स्वतः अभिवादन के लिए जुड़ गए ---'जी, मैं आपको पहचान नहीं पाई...?'

---' हमारे जीवन में इतनी महान भूमिका निभाकर आप ही हमें भूल गईं? वृद्धा ने क्षीण आवाज़ में कहा । 

---- 'महान भूमिका! ज़रा याद दिलायें ....'कल्याणी गर्व से भर उठीं । 

उनके लिए इस तरह के आभार कुछ नये नहीं थे । अक़्सर लड़की,उसके परिवार के लोग उनके प्रति कृतज्ञ रहते थे । उन्होंने वृद्धा को गौर से देखा । उसके चेहरे पर अजीब उदासी और दर्द था । आँखों में आभार और धन्यवाद की जगह उलाहना और दबा-छिपा क्रोध झलक रहा था । कल्याणी ने पिंड छुड़ाना चाहा ---

--- 'आप ही जल्दी से याद दिला दें,बताएं कि....'

----'हम जैसे दुष्कर्मी, अपराधी याद नहीं, न सही...हमारे ज़ुल्मों की मारी अनीता तो याद होगी ही...'

---'अनीता! जो कमरे में कैद थी!'

----'आप अनीता की सास,जिसने...'कल्याणी को सब याद आने लगा । 

----',बस, करें अब। आप बहुत कह चुकीं और कर चुकीं...'

कल्याणी को गुस्सा आने लगा ---'इसमें मेरा क्या दोष? आपने कहने और करवाने लायक काम जो किये। आप यहा खड़ी दिखाई दे रही हैं, इसका मतलब है कि आपको अपने किये की सज़ा बहुत कम मिली है ...'

----'हमारा दोष, हमारी सज़ा की बात करती हैं?सज़ा तो आप जैसों को, आपके संगठन को मिलनी चाहिए। हमारी बर्बादी का बीज अनीता ने बोया, आपने उसे खाद और पानी दिया। '

--'अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाना किसीकी बरबादी का बीज बोना हुआ?'--वृद्धा का शरीर काॅंप रहा था। वैसे भी वह बहुत निस्तेज और शिथिलकाय लग रही थीं। चेहरे की आभा फीकी पड़ गई थी । कुछ ही वर्षों में वह उम्र से कहीं ज़्यादा बूढ़ी लगने लग गई थीं, शायद इसीलिए कल्याणी उन्हें पहचान नहीं पाई थीं। 

वृद्धा की आवाज़ सुनाई दी । आवाज़ क्या मानो प्रलाप कर रही हों---

'कुछ दिन! सिर्फ़ कुछ दिन की शादी और मेरे बेटे की जवानी ही ख़राब कर गयी! और आप! सिर्फ़ एक टेलीफ़ोन, एकतरफ़ा शिकायत! हमसे कुछ पूछने की ज़रूरत भी आपने नहीं समझी और पूरी भीड़ ही जुटाकर चली आयीं आप?'

कल्याणी को सब याद आने लगा और वृद्ध महिला के लिए पैदा हुआ थोड़ा बहुत भी आदरभाव फुर्र हो गया। ---'अनीता की कैद, उसकी चोटें, उसकी मरणासन्न अवस्था...सब याद है मुझे । एक लड़की को इतनी यातना देकर....'

---'कैसी यातना?' वृद्धा बिफ़र उठीं। 

----'जेल हमने देख ली,नौकरी हमने खोयी,कंगाल हम हो गए। अपमान, तिरस्कार, बदनामी ...हमने झेली, समाज से हम कट गए । ..'

कल्याणी को सुनकर बहुत अच्छा लग रहा था । वह कहना चाहती थीं कि जो कुछ अनीता के साथ उन्होंने और उनके बेटे ने किया, उस हिसाब से तो उनकी सज़ा दोगुनी होनी चाहिए थी । 

वृद्धा को होश नहीं था, वह कहती जा रही थीं --

----'हमारा दोष था कि हमने एक ऐसी लड़की को चुन लिया जो शादी के बंधन में विश्वास ही नहीं रखती थी....'

वृद्धा की रुलाई में उनके शब्द दबते जा रहे थे। वह देर तक रोती रहीं । रोना कुछ कम हुआ तो कल्याणी ने अवि श्वास से उनसे पूछा---

---'अनीता के शरीर पर पड़े चोट के निशान?..'

---'चोट के निशान!'---वृद्धा ने हिकारत से दोहराया और बोलीं--

'चलिए,अभी चलिए मेरे साथ...मैं दिखाती हूं लोभ और लालच की वह फैक्ट्री जहाँ हम जैसों की तबाही के लिए ऐसे निशान आए दिन बनाए जाते हैं। हैं कुछ डिग्रीधारी लेकिन अमानवीय.... ऐसे भी लोग । 'वृद्धा की पीड़ा और भी बढ़ गई थी। 

आसमान से ज़मीन पर आ गिरी कल्याणी को अभी भी भरोसा नहीं हो रहा था

---- ' कोई लड़की अपना घर तबाह क्यों करेगी?'

----'उसकी कैसी तबाही? वह घर बनाने को आई ही नहीं थी । वह मेरे बेटे पुनीत के लिए नहीं, पैसों के लिए आई थी। 'वृद्धा की आवाज़

दूर किसी गुफा से आती हुई सी लग रही थी। 

-----' अनीता उस दिन पाॅर्लर गयी ही नहीं थी । मारपीट और चोटों के निशान.... और बहुत से झूठे सबूत बनाने और जुटाने को ही ऐसी किसी फैक्ट्री में गई थी । तभी तो आपको लगातार फ़ोन....'

वृद्धा अपने अतीत में खो गयी थीं । कुछ देर बाद बोलीं ---

----'आप हमेशा अनीताओं के बारे में सोचती रही हैं! अच्छा है। पुण्य का काम है पर कभी किसी पुनीत की ओर से भी किसी घटनाक्रम को आँककर देखा है?'.... वृद्धा सम्भल नहीं पा रही थीं। ज़रा सी देर में वह और ज़्यादा बूढ़ी और अशक्त लगने लगीं। वह उठ खड़ी हुईं, आगे बढ़ीं और ठिठक गईं । --

---'एक बात और....' कहते हुए वह बुरी तरह काँपने लगीं और लगभग गिरने को हुईं। कल्याणी ने उन्हें संभाला और बड़ी दमदार आवाज़ में कहा ---

--'अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाना किसीकी बरबादी का बीज बोना हुआ?'

वृद्धा का शरीर काॅंप रहा था। उनके निस्तेज और शिथिलकाय चेहरे की आभा और भी फीकी पड़ गई । वृद्धा की आवाज़ क्या थी प्रलाप था---

'कुछ दिन! सिर्फ़ कुछ दिन की शादी और मेरे बेटे की जवानी ही ख़राब कर गयी! और आप! सिर्फ़ एक टेलीफ़ोन, एकतरफ़ा शिकायत! हमसे कुछ पूछने की ज़रूरत भी आपने नहीं समझी और पूरी भीड़ ही जुटाकर चली आयीं?'

वृद्धा अपने अतीत में खो गयी थीं । लग रहा था कि ज़रा सी देर में वह और ज़्यादा बूढ़ी और अशक्त हो गई थीं । वह उठ खड़ी हुईं, आगे बढ़ीं और ठिठक गईं । ---

---'एक बात और....'कहते हुए वह बुरी तरह काँपने लगीं और लगभग गिरने को हुईं। कल्याणी ने उन्हें संभाला। वह काॅंपती जा रही थीं, उनकी आवाज़ ऑंसुओं से रुंधी हुई थी, भर्राए गले से वह बोलीं---

---'मेरा जवान बेटा अपना मानसिक संतुलन खो चुका है । कमाई का अब कोई साधन नहीं है....'वह फिर रोने लगीं और रोते हुए ही बोलती चली गयीं----'निराशा, अपमान, अवसाद से लुंजपुंज हो चुके निर्दोष, निरपराध मेरे बेटे जैसों के लिए भी कोई संगठन बनाया है क्या?'

कल्याणी के पास अब कहने को कुछ भी नहीं था,वृद्धा कुछ सुनना भी नहीं चाहती थीं । वह गेट से बाहर निकल रही थीं, कल्याणी साथ तक आकर गेट बंद करने को हुईं कि तभी अपना सारा दर्द समेटकर वृद्धा ने मुड़कर कहा---

-----'अनीता ने अपने बॉयफ्रेंड से शादी कर ली है । वह हमारे घर में सिर्फ़ पैसा समेटने आयी थी....'

कल्याणी के मुह से बोल नहीं निकल पा रहे थे। उनके महिला मंडल, महिला मोर्चा, महिला सेना, महिला समिति....जैसे अनेकों संगठन और सब में किसी न किसी तरह से उनका योगदान, सम्मान, पुरुस्कार...और उन सबसे उभरता उस वृद्धा का बताया एक नया सच । अपने जिस नैतिक दायित्व की वह दुहाई देती थीं, उनसे उभरता एक अलग नैतिक दबाव । शोषण और उत्पीड़न पाने के झूठे प्रदर्शन के नाम पर घिनौना खेल खेलने वाले कुछ अमर्यादित चेहरे उन्हें मुह चिढ़ाने लगे। अधिकार और कानून की आड़ में स्वच्छंदता और उद्दंडता का नाटक खेलती कुछ एक अनीताऍं उन बेबस और लाचार महिलाओं का मज़ाक उड़ाती दिखाई देने लगीं, जिन्हें वास्तव में ही कल्याणी जैसों के सम्बल की ज़रूरत है। 

अगर अनीता है तो वह निर्दोष ही होगी और पुनीत है तो वह दोषी ही होगा, क्या मालूम उनकी इस मानसिकता ने कुछ और पुनीतों को भी ऐसे ही मन और शरीर से निकम्मा करके और समाज से काट के छोड़ दिया हो। 

कल्याणी निढाल होकर पड़ गयीं । 

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