Mout Ka Khel - 29 in Hindi Detective stories by Kumar Rahman books and stories PDF | मौत का खेल - भाग- 29

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मौत का खेल - भाग- 29

वनिता


“मैं उस लड़की की बात कर रहा हूं, जिसने थर्टी फर्स्ट की पार्टी में डॉ. वरुण वीरानी के कपड़ों पर वाइन गिरा दी थी।” सोहराब ने कहा।

“ओह अच्छा! मैं उस वक्त वहां मौजूद नहीं था, लेकिन बाद में मैंने सुना था इस बारे में। हां, वह वनिता है... संदीप सिंघानिया की वाइफ।” राजेश शरबतिया ने कहा।

“वह मशहूर इंडस्ट्रलिस्ट संदीप सिंघानिया?” इंस्पेक्टर सोहराब ने पूछा।

“हां वही।” राजेश शरबतिया ने जवाब दिया।

प्रिया नाश्ता ले आई थी। राजेश ने सोहराब से पूछा, “तुम तो एस्प्रेसो लोगे न!”

“पीता तो एस्प्रेसो ही हूं, लेकिन आप तकल्लुफ न कीजिए।” सोहराब ने कहा।

“एक एस्प्रेसो और मेरे लिए आईरिश कॉफी।” राजेश शरबतिया ने प्रिया से कहा। प्रिया चली गई।

एस्प्रेसो ब्लैक कॉफी होती है और आईरिश कॉफी में व्हिस्की मिली होती है।

“वनिता का ख्याल कैसे आ गया?” राजेश शरबतिया ने सोहराब की तरफ कुकीज की प्लेट बढ़ाते हुए पूछा।

“तुम्हारे घर से कार में मैंने उसे ही निकलते देखा था। इसलिए पूछ लिया।” सोहराब ने शरबतिया की तरफ देखते हुए पूछा।

“हो सकता है वो आई हो और मुझे घर पर न पा कर चली गई हो, क्योंकि मैं भी बस थोड़ी देर पहले ही पहुंचा हूं।” राजेश शरबतिया ने सफाई दी।

“इट्स ओके।” सोहराब ने कहा।

तभी इंस्पेक्टर सोहराब को लगा कि कोई खिड़की से उनकी बातें सुनने की कोशिश कर रहा है। उसकी परछाईं उसे खिड़की पर नजर आ रही थी। सोहराब ने जेब से सिगार निकाली और उसका कोना तोड़कर मुंह से लगा लिया। इसके साथ ही वह उठ कर जेब से लाइटर तलाशने लगा। लाइटर तलाशते हुए वह तेजी से खिड़की की तरफ गया और पर्दा हटा दिया। पर्दे के पीछे वनिता खड़ी थी। वह तेजी से वहां से हट गई, लेकिन सोहराब की तेज आंखों ने उसे देख लिया था। दरअसल ड्राइंग रूम में तेज उजाला था और खिड़की के बाहर हल्की रोशनी थी।

सोहराब लाइटर शायद ऑफिस में ही भूल आया था। उसे जेबें टटोलते देख कर राजेश शरबतिया ने कहा, “ड्रेसिंग टेबल की ड्रार में एक लाइटर रखा हुआ है निकाल लो।”

इंस्पेक्टर सोहराब ने ड्रार खोली तो उसमें एक शानदार लाइटर रखा हुआ था। लाइटर पर लगे हीरे रोशनी पड़ते ही चमक उठे थे। सोहराब ने ड्रार से कोई जीच निकाली और तेजी से कोट की जेब में डाल लिया। उसकी पीठ राजेश शरबतिया की तरफ थी। सोहराब की इस हरकत को वह देख नहीं सका। इस के बाद सोहराब आ कर सोफे पर बैठ गया और सिगार सुलगा लिया।

सोहराब को देख कर राजेश शरबतिया को भी तलब हो आई थी। उसने जेब में हाथ डाला और सिगरेट की डिब्बी से एक सिगरेट निकाल ली। उसने डिब्बी को टेबल पर रख दिया और लाइटर से सिगरेट सुलगाने लगा। डिब्बी देख कर सोहराब बुरी तरह से चौंक गया। यह सोब्रानी ब्रांड की डिब्बी थी। यह वही ब्रांड था, जिस ब्रांड का बड्स जंगल की राख में मिला था। यह एक इत्तेफाक भी हो सकता है। इंस्पेक्टर सोहराब ने सोचा।

कुछ पल की खामोशी के बाद सोहराब ने पूछा, “रायना और डॉ. वीरानी की मुलाकात कैसे हुई थी?”

“वो डॉ. वरुण वीरानी की इंटर्न थी। कुछ दिनों बाद दोनों में प्यार हो गया और उन्होंने शादी कर ली।” राजेश शरबतिया ने धुंए के गोले छोड़ते हुए बताया।

“दोनों की उम्र में काफी गैप था!” सोहराब ने सिगार का कश लेते हुए कहा।

“कॉर्पोरेट वर्ल्ड में उम्र कहां मायने रखती है। वनिता को ही देख लें, शादी हो गई तो महिला कहलाने लगी, वरना है तो अभी लड़की ही। उसके हस्बैंड की उम्र उससे तकरीबन दो गुनी है।” शरबतिया ने अपनी सिगरेट को ऐश ट्रे में मसलते हुए कहा।

“ये कॉर्पोरेट वर्ल्ड का कमाल नहीं है। यह प्यार और मजबूरी की खरीदारी है।” सोहराब ने कसैले लहजे में कहा।

उस की इस बात पर राजेश शरबतिया ने कुछ नहीं कहा। तभी प्रिया कॉफी ले कर आ गई। राजेश शरबतिया का ध्यान जरा सा भटक गया और सोहराब ने ऐश ट्रे से बहुत तेजी से अपने बाएं हाथ से सिगरेट का बड्स उठा लिया। इसके बाद उसने दाहिने हाथ से सिगार को ऐश ट्रे में बुझा दिया और इस दौरान बाएं हाथ को जेब में ले जाकर बड्स वहां छोड़ दिया।

राजेश शरबतिया ने सोहराब को कॉफी देते हुए कहा, “देखो कैसा टेस्ट है!”

“अच्छा ही होगा। तुम्हारे घर की हर चीज नायाब ही होती है।” इंस्पेक्टर सोहराब ने मुस्कुराते हुए कहा।

उसकी इस बात पर शरबतिया ने हंसते हुए कहा, “नहीं भाई, टेस्ट तो तुम्हारा बहुत जबरदस्त है। तुम्हारे यहां की कॉफी की कोई मुझसे बहुत तारीफ कर रहा था। कभी मौका मिला तो पीने आऊंगा।”

“जब चाहें तशरीफ लाइए। आपका ही घर है।” सोहराब ने कॉफी का सिप लेने के बाद कहा, “नाइस टेस्ट!”

“उस लाश का क्या हुआ।” अचानक शरबतिया फिर डॉ. वरुण वीरानी के मुद्दे पर आ गया।

“लाशघर में अपने रिश्तेदारों का इंतजार कर रही है।” सोहराब ने कहा।

“लेकिन उसे तो रायना डॉ. वीरानी की लाश मानने को तैयार ही नहीं है!” शरबतिया ने कहा।

“उसके मानने न मानने से क्या होता है।” सोहराब ने कहा, “कानून अपना काम करेगा।”

“डॉ. वरुण वीरानी का ब्लड रिलेशन में अपना भी कोई नहीं है, जिससे डीएनए मैच हो सके।” शरबतिया ने कुछ सोचते हुए कहा।

“जब जरूरत होगी, ये साबित हो जाएगा कि वह लाश डॉ. वरुण वीरानी की ही है।” सोहराब का लहजा सपाट था।

सोहराब के इस जवाब और लहजे पर राजेश शरबतिया उस का चेहरा देखने लगा। सोहराब ने कॉफी खत्म की और उठ खड़ा हुआ।

“बैठो न कुछ देर और... कहां आते हो रोज! साथ में डिनर करते हैं फिर चले जाना।” शरबतिया ने कहा।

“नहीं, कुछ जरूरी काम है। फिर कभी डिनर साथ करेंगे।” सोहराब ने कहा और चलने लगा। शरबतिया भी उसके साथ-साथ बरामदे तक छोड़ने के लिए आया। शरबतिया ने विदाई शेकहैंड किया और सोहराब सीढ़ियों से नीचे आ गया। पार्किंग लाट पहुंच कर उसने ड्राइविंग सीट की तरफ का गेट खोला और फैंटम स्टार्ट करके चल दिया। कोठी से बाहर आ कर उसने कार को रफ्तार दे दी।

उम्मीद के मुताबिक ही सोहराब की कार का पीछा शुरू हो गया था। सोहराब ने कुछ दूर जाने के बाद ही यह बात महसूस कर ली थी। इसके बावजूद वह बेपरवाह बना रहा। उसका दिमाग काफी उलझा हुआ था। पीछा करने वाली कार लगातार उसके पीछे लगी रही। वह ब्लैक कलर की कार थी। रात के अंधेरे में सोहराब यह तो नहीं देख सका कि उसे कौन ड्राइव कर रहा है, लेकिन वह उससे बेखबर नहीं था। सोहराब ने कार से एक खास दूरी लगातार बनाए रखी थी।

सोहराब ने फैंटम को खुफिया महकमे की तरफ मोड़ दिया और पीछा करने वाली कार आगे बढ़ती चली गई। गेट की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद सोहराब सीधे लैब पहुंचा। वहां शरबतिया की सिगरेट की बड्स डीएनए करने के लिए दे दिया। साथ ही पिछली बड्स के डीएनए से उसकी मैचिंग भी करने के लिए कहा। ये काम खत्म करने के बाद वह कार को टर्न देकर वापस गेट की तरफ चल दिया। रिमोट से गेट खोला और फिर बाहर आ गया। उसके बाहर पहुंचते ही गेट फिर से बंद हो गया।

खुफिया विभाग का गेट ऑटोमेटिक था। इसके बावजूद कार निकलने के वक्त कोई आदमी चुपके से अंदर जा सकता था। इस संभावना को खत्म करने के लिए न सिर्फ गेट की सीसीटीवी से निगरानी होती थी, बल्कि गेट पर चार हथियारबंद गार्ड हमेशा तैनात रहते थे।

सोहराब सुबह काफी जल्दी दफ्तर आ गया था। इस वक्त वह थकान सी महसूस कर रहा था। अब फैंटम का रुख गुलमोहर विला की तरफ था। कुछ आगे जाने के बाद उस की कार का फिर से पीछा शुरू हो गया। इस बार सोहराब ने उन्हें कोई मौका नहीं दिया और एक्सीलेटर पर पैर का दबाव बढ़ाता चला गया। नतीजे में पीछा करने वाली कार काफी दूर हो गई। फैंटम का पिकअप इतना जबरदस्त था कि वह तीन सेकेंड में सौ किलोमीटर की रफ्तार पा लेती थी।

गुलमोहर विला पहुंच कर सोहराब फैंटम को सीधे पार्किंग की तरफ ले गया। वहां घोस्ट देख कर उसने अंदाजा लगा लिया कि सार्जेंट सलीम कोठी पर ही है। फैंटम को पार्क करके वह ड्राइंग रूम पहुंचा। वहां सलीम झाना के साथ बैठा शतरंज खेल रहा था। सोहराब को देखते ही झाना तो नौ दो ग्यारह हो गया। सलीम सोहराब की तरफ ध्यान दिए बिना मोहरों को आगे-पीछे करने लगा।

“कॉफी बनवाओ... फ्रेश हो कर आता हूं।” सोहराब ने कहा और अपने रूम की तरफ चला गया।

सलीम ने झाना को आवाज दी। वह तुरंत ही आ गया। उसे देखते ही सलीम ने कहा, “बेटे ये चाल भी तुम हार गए हो। अब तुम्हें कान पकड़ कर दस बार जोर-जोर से कुकड़ू कूं... कुकड़ू कूं बोलना होगा।”

झाना ने कान पकड़ा और जोर-जोर से कुकड़ू कूं बोलने लगा। सोहराब अभी अपने रूम के दरवाजे पर ही पहुंचा था। ये अजीब सी आवाज सुन कर वह पलट पड़ा। झाना की पीठ सोहराब की तरफ थी। वह बहुत मस्ती में बोले जा रहा था। सोहराब उसके पीछे रुक गया और उसने कहा, “ये तो मुर्गा बना हुआ है... अब आप मुर्गी की तरह कटकट कटाक की आवाज निकालिए।”

सोहराब की आवाज सुन कर झाना की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। उसकी आवाज हलक में ही फंस कर रह गई और वह शांत खड़ा हो गया। मानो पत्थर का हो गया हो। जब उसे सोहराब के जाते हुए कदमों की आवाज सुनाई दी तो वह जरा हिलाडुला।

“बेटे, सोहराब साहब बहुत नाराज हो कर गए हैं। जाओ जल्दी से अच्छी सी कॉफी बनाकर लाओ। वरना आज खैर नहीं है।” सलीम ने कहा।

सलीम की बात पूरी होने से पहले ही झाना वहां से फरार हो गया।


पर्ची


सोहराब फ्रेश हो कर आया तो सार्जेंट सलीम को पाइप पीते पाया। शतरंज उस ने हटा दी थी। वह इस तरह मासूम सी सूरत बनाकर बैठा हुआ था कि सोहराब नाराजगी भूल गया। वह उसके सामने सोफे पर बैठते हुए बोला, “क्या किया आज दिन भर? ऑफिस भी नहीं आए?”

“रोज ऑफिस जाने का चक्कर खराब है। वैसे मैं आज आउट डोर ड्यूटी पर था।” सलीम ने उसी भोलेपन से जवाब दिया।

“ये कौन सी ड्यूटी होती है?” सोहराब ने मुस्कुराते हुए पूछा।

“एक होती है। मेरे साथ कुछ दिन काम करेंगे तो जान जाएंगे।” सलीम ने मासूमियत से कहा।

“रिपोर्ट!” सोहराब ने कहा।

सलीम ने सिंड्रेला से मुलाकात और उस से लाश के कपड़ों की पहचान कराने के बारे में सब कुछ बता दिया। ये भी बता दिया कि वह दो दिन में बता देगी कि वह कपड़े किस के हैं। वह कपड़ों की पहचान अलग रखने के लिए एक मैकेनिज्म यूज करते हैं।

सलीम की बात सुनने के बाद सोहराब ने कहा, “गुड! अगर कपड़ों की पहचान हो गई तो ये हमारे लिए काफी अहम सुराग साबित होगा।”

सोहराब ने जेब में हाथ डाला और एक पर्ची निकाल ली। उस पर्ची को उसने मेज पर खोल कर रख दिया। उस पर्ची पर लिखी इबारत को देख कर सोहराब चौंक पड़ा। सलीम आश्चर्य से कभी उस पर्ची पर लिखी हुई इबारत को देख रहा था और कभी सोहराब को।


*** * ***


आखिर उस पर्ची में ऐसा क्या लिखा था?
बड्स के डीएनए रिपोर्ट में क्या निकला?

इन सवालों के जवाब जानने के लिए पढ़िए कुमार रहमान का जासूसी उपन्यास ‘मौत का खेल’ का अगला भाग...