जमील चच्चा
जमील चच्चा ने अपनी चालीस साल पुरानी साइकिल के हैंडल पर बड़े प्यार से कपड़ा रगड़ा और पिछले पहिये की हवा चैक करने लगे। पिछला पहिया कुछ दिनों से परेशान करने लगा हैं। पंचर ढ़ूढ़ने के पानी के तसले मे ट्यूब फैलाकर कई दफा बड़ी बारीकी से खोजा है,लेकिन ट्यूब में कोई नुक्स नही निकला और हवा है कि प्रायः निकल जाती है इसमें से। इस वक्त भी हवा कम दिख रही थी।
पंप उठा के उस पर भी जमील चच्चा ने कपड़ा मारा, फिर पिछले पहिये की ढ़िबरी में नली कसकर हवा भरने लगे। पंप पर झुकते समय उनका पाजामा अपनी कमजोरी का सबूत देते हुए एक-दो जगह से चर्र की आवाज से फटा तो उनका दिल दहल उठा।
पास खड़ी जमीला बेगम उन्हें रोज की तरह विदा करने आई थीं और उनके घर से निकलने का इंतजार कर रही थीं।
हवा भरने के बाद चच्चा ने फिर पहिये को दबाकर हवा की जांच की और अब हवा का दबाव सही महसूस हुआ तो संतुष्ट होकर पहिये की ढिबरी मे कसे पेंच को घुमा कर नली निकाली और पंप निकाला और बडे़ एहतियात के साथ जमीला को सौंप दिया। पिछले चालीस साल से यह पंप और साईकिल उनकी लगातार सेवा कर रही है। साइकिल के रख-रखाव की जिम्मेदारी चच्चा उठाते हैं और पंप सँभालने जिम्मा बेगम पर है।
चच्चा ने चबूतरे पर रखा थैला उठाया, फिर पास रखी तेल की शीशियाँ थैले की जड़ी बूटियो के बीच फँसाकर रखने लगे। कैरियर पर थैला रखके चच्चा ने एक पतली डोरी से बांध दिया फिर बड़े संभल के आहिस्ता से अपने प्लास्टिक के जूते पहने और फिर साईकिल का हैंण्डल थाम लिया।
जमीला से आदाब करते हुए उन्होंने साईकिल आगे को धकेली और चलते हुए एक दो बार पैडल का आधा चक्कर पूरा किया, फिर उछलकर सीट पर बैठ गए। साईकिल ने गति पकड़ना शुरू किया तो जमील चच्चा को भीतर से हल्का सा ठसका उठा। शायद मुंह और नाक में हवा तेजी से प्रवेश कर रही थी, इस कारण उन्हे खाँसी आयी थी। वे हलके से एक-दो बार खाँसे और अपनी मंजिल की ओर बढ़ लिये।
उनकी मंजिल मंदिर किनारे का वह ठिया था जहां वे पिछले दस बरस बैठते आए हैं। मरीजांे को उनका यह ठिया मालूम है, इसलिये नियत समय पर जरूरत के मारे तमाम लोग ठिया पर पहँुच जाते हैं। आज उन्हे कुछ देर हो गई। लोग झींकते हुए मन-ही-मन उन्हे गरिया रहे होंगे।
अब गरियायें तो खूब गरियाते रहे। आदमी अपने लिये भी तो कुछ समय सुरक्षित रखेगा न !
कुछ दूर आगे चले तो अपना चाट का ठेला ढकाता आ रहा जयदीप मिला। रोज की तरह उसने चच्चा को सलाम किया तो चच्चा ने उसे खुले दिल से ’खुशहाल’ रहो का आशीर्वाद दिया।
वे सोचने लगे कि काश वजीर ऐसा ही ठेला लगाकर चाट बेचना शुरू कर देता, पर उन सबके दिमाग में तो नौकरी का भूत सवार है धंधा कहा पुसाएगा उन्हें। लगा तो दिया था उन्होंने नजीर को भी बाबूगिरी की नौकरी पर, लेकिन प्रदेश के चालीस हजार दूसरे दैनिक वेतनभागी कर्मचारियों की तरह उसकी भी किस्मत खराब निकली। सरकार ने फिजूलखर्ची रोकने के नाम पर जब दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी बर्खास्त किए तो लोक निर्माण विभाग में लगा नजीर भी बर्खास्त हो गया। जमील चच्चा के यहा तो दो दो लोग बर्बाद हो गए इस आदेश से। उनका मंझला बेटा वजीर भी इसी आदेश से घर बैठ गया। उसकी तो ग्यारह साल की नाकरी हो गई थी ब्लॉक ऑफिस में, पर सरकारी बुलडोजर चला तो नई-पुरानी सबकी सब रोजन्दारी वाली नौकरियाँ चली गई।
जमील चच्चा को बड़ा बेटा ठीक लगता है-आठवीं में था, तभी से छोटा-मोटा काम शुरू कर दिया था। अपने चाचा के साथ जाकर सब्जी मंडी में सब्जी की आढ़त करने लगा था। बाद में तहसील में चपरासी की भर्ती हुई, तो बिना लिहाज और शर्म के चपरासी पद पर बहाली ले ली थी। नौकरी करते उसने इंटर पास किया, ट्रेनिंग ली और आजकल ठाठ से पटवारी बना बैठा है।
जमील चच्चा खुद शुरू में स्कुल में कमाठी थे। बच्चों को पानी पिलाना और घंटी बजाना काम था उनका। बुढ़ापे में जाकर हायर सेकण्ड्री पास की और रिटायरमेंट के ठीक दो साल पहले बाबू बने और इसी पद पर रिटायर हुए हैं। रिटायरमेंट के बाद खाली बैठे बुरा लगा तो अपनी जवानी के दिनो का उनका पहलवानी का शौक याद आया।
बचपन में वे कल्लूराम पहलवान से कुश्ती लड़ना सीख गए। वे सिखाया करते थे कि किसी की हड्डी चटक जाए या नस हट जाए तो ऐेसे पंच बांधकर ऐसे मालिश करना चाहिए। सरसों, खोपरा, और तिली के तेल में जड़ी-बूटी डालकर मालिश के लिए तेल जैसे बनाया जाता है, वो उन्हें जवानी के दिनों का वह फार्मूूला भी याद है। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने मंदिर किनारे की एक गुमटी को अपना ठिया बनाया है-वहीं बैठ कर हड्डी के दर्द और टूट-फूट के मरीजों का इलाज करते हैं। पड़ोसी बुद्धा खवास का बेटा मंगल बड़ी रूचि से सीखने आता है उनसे। वह ठिया पर आ चुका होगा, यह याद आते ही उन्होंने जल्दी-जल्दी पैडल मारे।
पुरानी साईकिल तेज रफ्तार भला कहां से पकड़ती एक बार तो पैडल बिना ताकत लगाए ही पूरा घूम गया लग रहा था फ्राईवल खराब हो गया है। पैडल जल्दी-जल्दी घुमा तो पेट में झटका सा लगा औश्र साईकिल के साथ साथ वे भी खाँसने लगे। पुरानी साईकिल, पुरानी देह आखिर कब तक साथ देगी।
पूरे सत्तर साल के हो गए थे वे।
ठिंयें पर तीन-चार आदमी बैठे थे, मंगल भी आ चुका था। साईकिल का हैंडल संभालकर उसने जमील चच्चा के थैले में से दवा की पोटली और तेल की शीशियां निकाल कर जमाना शुरू कर दी ।
चच्चा ने वहां बैठे मरीजों से बातचीत शुरू की तो पता लगा कि उनका इन्तजार कर रहे चार जन में से दो लोग मरीज हैं और दो लोग उनके टहलुआ हैं। दोनांे मरीज पुराने हैं, पहले दिखा चुके हैं उन्हें। एक ही मर्ज है दोनों का कि पीठ के नीचे कमर के आखिरी गुरिया में दर्द है उन दोनों को। अस्पताल में एक्स-रे कराके तमाम तरह की सिकाई और पट्टे बांध कर दो-दो हजार फूंक आए हैं, पर दर्द मे पैसे भर भी फर्क न था। जब पहली बार आये और जमील चच्चा का हाथ लगा तो दर्द घटकर बारह आना हो रह गया था, पहले ही दिन। आठ दिन मे पूरा दर्द जड़मूल से चला जाएगा ऐसा विश्वास है उन्हें।
दोनों मरीज मालिश के बाद रोेज की तरह दस दस रूपये देकर चले गए तो जमील चच्चा फिर उसी उहापोह मे डूब गए कि इस तरह उस्ताद के बताए हुनर से किये जाने वाले इलाज का पैसा लेना ठीक है, या गलत। शुरूआत में तो वह किसी से कुछ नही लेते थे, पर ऐसा कब तक चलता? मालिश के तेल और दवाई तैयार करने में पैसा तो खर्च होता ही है। तो जड़ी-बूटी और तेल की दिनोदिन बढ़ती कीमत ने उन्हें हर मरीज से कुछ-न-कुछ लेने को मजबूर कर दिया जिसे अब वे दस रूपया फी मरीज रोज तय कर चुके हैं। आज सोचते हैं कि अच्छा रहा कि पहले से उन्होंने पैसा लेना शुरू कर दिया, नही तो आज छाती पर बैठे दो लड़के और उनके परिवारो का खर्च उनकी जरा सी पेंशन मे से कहा चल पाता।
मंझला बेटा बजीर बचपन से कसरती रहा है, वह चाहे तो जमील चच्चा से हुनर सीख सकता है पर वह नही आना चाहता यहाँ। उसे बेज्जती सी लगती है किसी की मालिश करने में।
वैसे भी दूसरो की खिदमत करके जस कमाने की बात इस नई पीढ़ी को नही सुहाती है। दूसरोे की खिदमत क्या अब तो आवाम और खुदा की इबादत से जुड़े कामों में भी सबको झिझक होने लगी है। मोहर्ररम के साथ ताजिया के साथ अखाड़ा चलने के रिवाज से भी लगाव नही है उनके तीनों बच्चों को। जमील चच्चा के घर में खानदानी अखाड़ा चलता आ रहा जो वे आज भी कुश्ती सिखा रहे है। सुबह शाम आठ दस पट्ठों को कुश्ती के दांव पेंच निःशुल्क सिखाते हैं, फिर मोहर्ररम के समय उन चेला के करतब दिखाते हुए बड़े फख्र से गलियों में निकलते हैं। फूल डोल के विमान के साथ भी उनका अखाड़ा चलता है। कई बार छब्बीस जनवरी को बड़ी परेड में कस्बे के आला अफसरों के सामने उनके चेले करतब दिखाते रहे हैं तो क्वांर व चैत महीने की दोनों नवरात्रि के मेले में पुलिस की मदद करने के वास्ते जमील चच्चा के पट्ठों को बहुत विश्वास और एहतराम के साथ याद दिया जाता है। ऐसे जनता से जुड़े काम के उस वक्त उनका सीना फूलकर चौड़ा हो जाता है। जो भी देखता है उनकी सराहना करता है कि वे आज के स्वार्थी जमाने में भी निःस्वार्थ भाव से युवको को शरीर को चुस्त-दुरूस्त बनाए रखने को प्रेरित करते हुए इस कस्बे की पुरानी परम्परा को जीवित बनाए हुए हैं। धन्य है वे। शाबास है उनके चेले-जो बदन से मुचण्डा दिखते हैं लेकिन व्यवहार में महाजनों की तरह झुकेझुके।
मंगल भी ऐसे ही कसरत सीखने लगा था, बाद में उसकी रूचि मालिश वालिश में बढ़ गई। कई बाद दुख होता है कि यह हुनर उनके घर के बेटे उनके चाहने पर भी न सीखे और पराया बेटा मंगल उनकी खुशामद करके सीख रहा है।
घर में भी जनीमान्स में भी सबके अपने-अपने नखरे हैं। नजीर और वजीर की बहुंए घर के बर्तन मांजती व पूरे घर को बुहारती हैं, लेकिन शुरू मे वे अपने-अपने कमरो में झाड़ू लगाती थीं और कचरा उठा कर आंगन मे फेंक दिया करती थी। आंगन से लेकर बाहर के चबूतरो को बुहारने का जिम्मा उनकी सास जमीला बेगम का है-घर के बर्तन भी वे मांजती थी। अब साठ साल की बूढ़ी देह इतनी मेहनत-मशक्कत के लायक तो है नहीं, पर घर में एका रहे, इस कारण खांसती-कराहती वे जुटी रहती थीं। लेकिन इन दिनों जमीला दिन भर आराम करती है। बर्खास्तगी के पहले तक नजीर और वजीर अलहदा खाना बनाते थे पर अब सबका खाना शामिल-शरीक है। बड़ा बेटा जरूर घर की ऊपरी मंजिल पर अलग रह रहा है। वैसे भी उसके बच्चे बड़े हो रहे हैं-शामिल शरीक होने में दिक्कतें ही दिक्कतें थीं। रोज घर लौटकर चच्चा पहले यही टोह लेते हैं कि घर में शांति है या नहीं। वे और कुछ नही सिर्फ शांति चाहते हैं। बाकी तो सब वही होगा जो अल्ला ताला चाहेंगे।
वे कई दिन से दोनो बेरोजगार बेटो को प्यार से समझा रहे हैं कि अब वे सरकारी नौकरी का इंतजार न करें, कोई प्रायवेट नौकरी खोज या कोई काम-धंधा डाल लें। जमील चच्चा का छोटा भाई नासिर सब्जी का थोक व्यापार करता है, गांव से सब्जी लेकर आए किसानों के माल की नीलामी बोली लगाकर दस पैसे रूपये का कमीशन भी कमाता है, उसके दोनो बेटे भी यही कर रहे हैं। जमील की इच्छा है कि वजीर भी इसी काम में लग जाए। दसवीं पास वजीर की नौकरी से वह पहले भी संतुष्ट नही थे। वह चपरासी था। यदि यह काम करने लगेगा तो बाबू से ज्यादा पैसे कमाएगा, कहां लगती है चपरासी की वेतन। पर वजीर नही मानता। नजीर बी.ए. पास है और वह बाबूगिरी कर चुका है, इस कारण उन्होंने उससे कभी भी सब्जी के धंधे की बात नही की। वैसे भी बड़े-बड़े अफसर अहलकारों के बीच रहने के कारण वह समझदार है, और खुद नौकरी ढूढ़ रहा है। पर उसकी पसंद को कौन क्या करे, वह या तो वकील का मुंशी बनना चाहता है या फिर किसी फैक्ट्री में क्लर्क। इस छोटे से कस्बे में ऐसी नौकरी मिलना आसान भी तो नहीं। बारह-गांव भेजे तो खर्च कहा से आएगा ? और फिर बाहर भेजे भी तो किस आसरे से ? यही सोचकर परेशान होते है वे।
तब एक बजा होगा, कि पीली बत्ती लगी जीप उनके ठिए के पास आकर रूकी। सहमे हुए से जमील चच्चा ने कनखियों से उधर देखा-क्या लफड़ा आ गया ?
एक चपरासी उतरा और उनके पास आकर अदब से बोला, “चच्चा आदाब।”
“आदाब जनाब” चच्चा ने थोड़े ऊँचे स्वर मे जवाब दिया।
पता लगा कि तहसीलदार साहब के पेट मे दर्द है, सो जमील चच्चा को याद किया गया है। चच्चा के पास कई बार ऐसे बुलौए आते हैं।
उन्होंने अपना थैला संभाला और मंगल को गुमटी पर बिठा कर वे जीप में जा बैठे। जांच की तो पता लगा कि तहसीलदार साहब के पेट की धन हट गई है चच्चा ने उन्हें पीठ के बल लिटाया और पेट की मालिश शुरू कर दी। एक शीशी लेकर अंजुली में थोड़ा तेल लिया और हल्के हाथ से मालिश करने लगे।
कुछ देर बाद ही पेट का दर्द कम हो गया था, तो तहसीलदार साहब के मुंह पर मुस्कान झलक उठी थी।
चच्चा ने पानी मँगाकर हाथ धोए और चलने को तत्पर ही थे कि तहसीलदार साहब ने उनसे कुछ देर रूकने का अनुरोध किया। वे अन्यमनस्क से बैठ गए तो तहसीलदार साहब ने भीतर चाय बनाने का हुक्म भेज दिया।
“कल मैं फिर आ जाऊँगा, जनबा!” चच्चा ने यूँ ही बोल दिया।
“मैं जीप भेज दूँगा चच्चा, आप यहाँ तक आते-आते परेशान हो जाओगे।”
“जैसी आपकी मर्जी“ चच्चा गद्गद भाव से कह रहे थे। कुछ देर सोचते रहे फिर बोल उठे, “एक अर्जी थी हुजूर। इजाजत हो तो!”
“हाँ, हाँ बोलिए।”
“मेरे दो बेटे सरकारी नौकरी में थे जनाब, कच्चे में। सरकार ने उनकी नौकरी खत्म कर दी है, अगर हुजूर की कृपा हो जाए तो उसे रोजी-रोटी मिल जाये!”
“नही चच्चा, नौकरी के बारे में हम कोई मदद नही कर पाएंगे।”
चच्चा निराश हो गए। तब तक चाय आ गई थी। जोर से फूंक मारते हुए वे एक एक घूँट पीने लगे।
ठिंया पर लौटते-लौटते तीन बज गए थे। मंगल अपने घर पर जा चुका था। पड़ोसी के पास चाबी थी,अब अगर घर जाते तो घंटा-भर बाद चार बजे दोबारा उन्हे ठिंया पर लौटना था, शाम के लिए। सो घर जाने का विचार त्याग दिया उन्होंने। गुमटी में ही अधलेटे हो गए और थोड़ी देर आराम करने की चाह में आँखे मूँद लीं।
पर आँखों में नींद न थी। विचारों की कशमकश जारी थी। उनकी सरकारी नौकरी की वजह से घर में बच्चों ने नौकरी को शान की चीज समझा। काश, उन्होंने भी शुरू से सरकारी नौकरी न की होती, और छोटे भाई जैसा कोई धंधा डाल लिया होता। तो आज छोटे भाई जैसा पक्का तिमंजिला मकान भले न होता, छोटा-मोटा मकान जरूर होता। जिन्दगी-भर से वे किराए के मकान में दिन काट रहे हैं। आशा थी कि बच्चे बड़े होकर रोटी रोजगार से लगेंगे तो अपना झोंपड़ा भी बनाएँगे। अब ये आशा पूरी तरह से निराशा में बदल गई, उलटे दो जवान बेटों के लिए रोजगार तलाशने का भार भी है उनके पास। नौकरी क्या करी घर-भर के मन में यह भाव बैठ गया कि वे धंधेवालों से कुछ ऊँचे हैं। इसी गलतफहमी न तो परेशान किया है उन्हें। अगर छोटे-मोटे मजूर या व्यापारी होते तो बच्चे कुछ भी कर लेते, शर्म-संकोच में फंसे न रह जाते। बड़े लोगो को किसी बात की कमी नहीं, छोटे को किसी चीज की शर्म नही, मरना तो बीचवालों का है। वे भी क्या खाक बीचवाले हैं-हैं तो असल में नीचेवाले ही पर बीच के होने के भ्रम में जी रहे हैं।
इसी भ्रम के कारण खुद उन्होंने बच्चों को छोटा धंधा नही करने दिया। सच तो यह है कि अभी नौकरी छूटी तो मायूस वजीर ने कई बार जिद की कि वह हाथ ठेला पर सब्जी लादके गली-गली बेचना चाहता है लेकिन जमीन चच्चा ने कभी इजाजत न दी। नजीर ने मन मार के मायूसी से कहा कि वो किसी दुकान पर नौकरी करना चाहता है न होगा तो ग्राहको को मान तौलता रहेगा, पुड़िया बाँधता रहेगा, पर चच्चा को भला कहाँ से सुहाता पढ़े-लिखे लड़के का नौकरी करना। सो उन्होने कतई मना कर दिया। मंगल को शुरू सिखाना शुरू किया तो उसी के साथ वे वजीर या नजीर का यह हुनर मन से सिखाना चाहते थे, पर बच्चो की बेरूखी के कारण हाथ का जस अकेले मंगल को सौंप रहे हैं। कल्लू उस्ताद कहते थे हुनरमंदी तो रियाज से आती है और उस्ताद की सलाह उसे कामयाब बनाती है, हुनरमंदी का जाति और मजहब से कोई ताल्लुक नहीं, इसलिये हुनरमंद आदमी पूरे आवाम की दौलत होता है उस पर सिकी की बपौती नहीं होती।
अब अपनी हेकड़ी का खमियाजा भी दोनों बेटे खुद ही तो भुगत रहे हैं। भुगतना ही पड़ेगा। बल्कि वे तो यह मानते है कि जूझना ही पड़ेगा उन्हे।
जूझने से कभी नहीं डरे वे, बचपन में जब अब्बा का इंतकाल हुआ तब वे पन्द्रह वर्ष के थे और नासिर दस बरस के। उन्होंने तब भी कहां हिम्मत हारी थी। अब्बा के दस बीघा खेत में खुद ही खेती करने लगे थे। नासिर की पढ़ाई जारी रखी थी उन्होंने। नासिर का मन पढ़ने में नही लगा तो उन्होंने खुदकी पढ़ाई पर ध्यान दिया था। दिन भर के थके-मांदे घर लौटते तो चिमनी के उजायारे में बैठ जाते और उसके उजाले में अपनी किताबें पलटते रहते। वे खेती के अलावा भी यहां वहां जो काम मिलता कर लेता थे और बूढ़ी अम्मी, नासिर व खुद के लिए जैसे-तैसे वे सालन-रोटी का बंदोबस्त कर पाते थे। आज लोग लाख कहें कि अब रोजी-रोटी की बड़ी किल्लत है, पर तब पुराने जमाने में भी ऐसी इफरात कहाँ थी तब भी तो ऐसी ही दिक्कतें थीं काम-धंधे की।
बीस बरस की उम्र में मिडिल पास किया था जमीन चच्चा ने और खुदा के फज़ल से उसी वर्ष नौकरी पा ली थी । वे स्कूल में कमाठी बन गए थे। वे कहाँ सोचते थे इस तरह की नौकरी बाबत। पड़ोसी सलमान चच्चा की ही कृपा थी वो तो, कि उन्हीं दिनों वे स्कूल इंस्पेक्टर बनके इस कस्बे में आए और उन्हीं दिनों कमाठी की जगह निकली। सलमान चच्चा ने ही जमील को बुलवाया था और दरख्वास्त लिखाकर ले गए थे जिला दफ्तर में।
उन्हें बहाली मिली तो समाज के लड़की वालों की जैसे नींद टूटी। रोज-रोज रिश्ते आने लगे थे। अम्मी परेशान थीं रिश्तेवालों की खिदमत कर-करके। आखिर अम्मी ने अपने मायके की दूर की रिश्तेदार जमीला से उनका रिश्ता तय किया और आठ दिन में शादी भी निपटा दी।
जमील ने अपने सुघड़ हाथों से इस घर को ऐसा संभाला कि पास पड़ोस के लोग वाह-वाह कर उठे। सात साल बाद नासिर की शादी हुई। उसकी दुल्हन ने आते ही बखेड़ा मचाना शुरू कर दिया तो मजबूरन तीन वर्ष में ही उन्हें अलग होना पड़ा। खानदानी मकान नासिर के हिस्से में आया और खेत बेचकर पैसा आधा-आधा हो गया।
अपने हिस्से के रूपये से जमील ने कुछ सोना चांदी खरीदा था और खरीदी थी नई साइकिल। इस साइकिल से बड़ा प्रेम करते थे वे। इस साइकिल ने खूब साथ भी दिया उनका। जंगल से लकड़ी लाने से लेकर नाते-रिश्तेदारों के यहां गांव खेड़े में शादी-ब्याह में जाने के लिए वे इसी साइकिल का उपयोग करते रहे है। साइकिल जैसी सवारी दूसरी नही दिखी उन्हें। वे बड़े प्रशंसक हैं इसके। शायद पहलवानी की आदत इसका कारण है, क्योंकि साइकिल चलाने का मतलब भी वे कसरत करना मानते रहे हैं। शायद सत्तर साल की उम्र में भी उनके हाथ-पांव चलते रहने का बड़ा कारण यही साइकिल है ।
कभी-कभी वे पछताते भी बहुत है कि खेत बेचे थे, उस वक्त मकान खरीद लेते तो बड़ा आसरा हो जाता। आज बुढ़ापे में भी किराए के मकान में रहना पड़ रहा है। पूरी जिन्दगी यूं ही बीत गई।
जिन्दगी-भर बड़ी जद्दो-जहद की उन्होंने। आज घर में खुद का दिया सब कुछ है तो उनकी मेहनत की बदौलत ही है। अब तक संघर्ष किया आगे भी करेंगे, कहीं-न-कहीं लग ही जाएँगे बच्चे। वे अपने मन को प्रायः इस तरह दिलासा देते रहते हैं, उम्मीद गई तो इंसान टूट गया समझते हैं वे। नाउम्मीद तो नासिर हो गया है अपने बेटों से, बहुओं से और बीवी से। हर घड़ी कलह मची रहती है घर में। एक दूसरे को दुश्मन की नाई देखते हैं सब-के-सब।
सोच-विचार में उनकी ऐसी झपकी लगी कि किसी के झकझोरने से वे जागे। सामने वजीर खड़ा था-चिंतित और परेशान।
“काहे, क्या हुआ ?” वे चौंके।
“आप तीन बजेे तक खाना खाने घर नही लौटे तो पूरा घर परेशान हो उठा है। वहां किसी ने खाना नही खाया है।”
सुनकर पुलकित हो उठे वे। पूरा घर उनकी चिंता करता है, ये क्या कम बात है। यही तो उनकी सबसे बड़ी दौलत है। आपसी प्यार और चाहत ही तो चाहते रहे हैं वे अपने घर में। एक खुशनसीब घर को सबसे बड़ी ज़रूरत इसी प्यार और चाहत की है। बाकी जरूरत और बातें तो बाद की हैं। वे प्रकट में वजीर से सिर्फ इतना बोले, “इसमें चिंता की क्या बात है ?”
उन्होंने उमंग और आत्मगर्व के साथ अपनी दुकान समेटना शुरू की। सच्ची बात है, तीन बज गए। पूरा घर उनकी वजह से भूखा बैठा है, तौबा-तौबा आइंदा ध्यान रखेंगे वे।
उन्होंने मन ही मन तय किया कि वे अपने बच्चों पर दबाव नही डालेंगे कि उनसे गुण सीख लें, हाथ का रिजक ले लें। बल्कि वे कल से मंगल को पूरे उत्साह से सिखाएँगे। वे अपना रिजक मंगल को भी वैसे ही सौंप देंगे जैसे कल्लू उस्ताद ने उन्हे सौंपा था। ऐसे गुण सिखाने के लिए न बेटा देखा जाता है न दुश्मन। हाथ की कला तो उसे सौंपना चाहिए जो उसकी कद्र जानता हो। न इसमें जाति पांति देखी जाती है न धर्म। अब अगर उनके बच्चे यह काम नही करना चाहते तो न करें, अपनी मर्जी का काम करें और खुश रहें। यही तो चाहते है जमील चच्चा।
उत्साह में डूबे चच्चा को लग रहा था कि वे चालीस साल पुरानी साईकिल पर नही नई चमचमाती साईकिल पर सवार हैं और बड़े हलके से होकर घर की ओर उड़े चले जा रहे हैं।
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