रेसक्यू
[ नीलम कुलश्रेष्ठ ]
[ जब भी टी वी ऑन करो बहुत से प्रदेशों की दिल दहलाने वाली पानी में भरी सूरत होती हैं। सन – 2006 सूरत में भयानक बाढ़ आई थी- प्रशासन व सिंचाई विभाग ग़फ़लत से. कॉर्पोरेट के तीन तृतीय श्रेणी के कर्मचारी बाढ़ में जा फंसे थे। इस कहानी से आपको पता लगेगा कि कॉर्पोरेट्स में काम करने वाले मशीन मानव हो जाने के लिये बदनाम में भी इंसानियत होती है।इन कर्मचारियों को बचाने में अपनी जान लगा देते हैं। इसमें सुपन मेरा बेटा सुलभ ही है व फ़िल्म स्टार हक़ीक़त में फ़ारुख़ शेख हैं, जो सूरत के थे। ]
सुपन ने अपनी घड़ी पर नज़र डाली -शाम के सात बजे हैं। उसकी नज़र खिड़की के बाहर पाम के हथेली से फैले, छितराये पत्तों पर चली गई, वे लगातार पड़ती बारिश में ठिठुरते काँप रहे हैं। आसमान ऐसा हो रहा है कि जैसे ऊपरवाला सैकड़ों नल खोलकर उन्हें बंद करना भूल गया हो। नीचे बाढ़ में बहते इंसानों, मवेशियों या इनकी लाशों या बहते सामान या पेड़ पर टंगे इंसानों को देखकर भी मीठी नींद में सो गया हो। नींद ऐसी गहरी है तो उसे कैसे पता लगेगा सीमेंट के मकानों में चारों ओर बहते मटमैले पानी में घिरे लोग बिना बिजली व पीने के पानी के बदहवास हैं। घर के बड़े बड़े बर्तन छत पर, आँगन में रखकर बारिश का पानी इकठ्ठा करके रहे हैं। जिन मकानों में पानी भरा है उसमें बच्चे बड़े पलंगों पर बैठे हैं। पानी में जब कोई बहता हुआ सांप उनकी तरफ़ आता है तो भय से उनकी घिग्घी बंध जाती है। वह तो अच्छा है बहते पानी के बहाव के कारण वह संतुलित होकर अपना फन नहीं फैला पाता। बहता हुआ दूर निकल जाता है।
सुपन को बड़ी मुश्किल से ऑफ़िस के काम से फ़ुर्सत मिलती है, जो आराम से टी वी देखे। टी वी पर जब ये हृदयविदारक दृश्य देखता है तो सोचता है, ऐसे दृश्य जिनसे दिल दहल जाये, देखने से तो अच्छा है कि काम में डूबे रहो। वह उन खुशनसीबों में से एक है जिनकी उच्च शिक्षा के कारण अच्छी आय है। इनका जीवन सीमेंट के मकानों में सुरक्षित है। वो बात और है कि बरसों में कभी भूकंप जैसा हादसा हो जाए तो इस सुरक्षित जीवन को भी झकझोर कर रख दे वरना भयंकर गर्मी, सर्दी बारिश में लोग फ़ुटपाथों पर भी कीड़े मकोड़ों की तरह जीते मरते हैं। मेज़ पर रक्खे लैपटॉप पर उसकी उंगलियां जल्दी जल्दी चल रहीं हैं। आधे घंटे बाद उसे होटल डी मेरियो के कॉन्फ़रेंस हॉल में पहुंचना है। आधे घण्टे बाद मतलब ठीक आधे घंटे बाद। कोई भी एम एन सी [मल्टी नेशनल कंपनी ] मॉल में लुटाने के लिए मोटी तनख़्वाह नहीं देती। यहाँ हर मिनट की कीमत दी जाती है, तो उतना ही काम तो करना पड़ेगा।
अहमदाबाद में होटल डी मेरियो में एच ओ डीज़ [विभाग प्रमुख ]की कॉन्फ़्रेंस है। सुपन अपनी कंपनी के हैड ऑफ़िस के एच आर डिपार्टमेंट के ताज़े आँकड़े इकठ्ठे कर रहा है .कुछ देर बाद लैपटॉप उठाकर ऑफ़िस से बाहर निकल, कार से होटल की तरफ़ चल देता है। यहां से मुश्किल से पांच मिनट का रास्ता है, वह पांच मिनट पहले ही पहुँच गया है। होटल के बड़े कांच के दरवाज़े को खोल रिसेप्शन में रक्खे विशालकाय सोफ़ों, दीवारों पर सजी मॉडर्न आर्ट पेंटिंग्स व पीतल के बड़े फ्लावर वास का जायज़ा लेता हुआ लिफ़्ट का सात नंबर का बटन दबा देता है ..कॉन्फ़्रेंस हॉल का दरवाज़ा खोलकर सामने बैठे प्रदेश के चेयरमै न से सभ्यता से पूछता है, ``मे आई कम इन सर। ``
``कॉल मी `अतुल `नॉट `सर ` .``
वह झेंपता सा सिर हिलाकर अपने एच ओ डी मेहुल देसाई की पास वाली कुर्सी पर बैठ जाता है। उसके लिए ये कंपनी नई है। सारे प्रदेश के अनुभवी एच ओ डीज़ को देखकर उसके दिल में हल्का कम्पन हो रहा है। ए सी में भी हल्के पसीने से नहा गया है। उस लगता है उसके स्मार्ट जीजाजी उसके कान में मन्त्र फूंक रहे हैं, ``डो `न्ट लूज़ योर कौंफ़ीडेन्स लेवल।सफ़लता का आज यही मूलमंत्र है। ``
अपनी घबराहट पर क़ाबू पाकर वह अकड़कर बैठ जाता है। बीच की लम्बी टेबल पर लगे छोटे छोटे माइक्स के सामने की कुर्सी पर बैठे हैं उसकी कम्पनी के टॉप एग्ज़ेक्युटिव्स- बेहतरीन ब्रेंडेड कपड़ों में .वह महसूस करता है कि कमरा मेल परफ़्यूम्स की मिली जुली गंध से महक रहा है ..
वह धीरे से अपने एच ओ डी से पूछता है, ``मेहुल कौन से डाटाज़ पहले शो करूँ ?``
``वेट फ़ॉर समटाइम देयर इज़ अ सीरियस प्रॉब्लम। ``
``वॉट ?``
``सूरत की तापी नदी में वहां के उकई डैम का पानी बिना लोगों को पहले से वॉर्निंग दिए छोड़ दिया गया है।सारा सूरत पानी में डूब गया है। ``
``सर !मैंने भी न्यूज़ सूनी थी। बाढ़ के कारण लोगों ने मल्टी स्टोरी बिल्डिंग्स में पनाह ले रक्खी है। ``
```यस ------अब क्या सिचुएशन है ?``चेयरमैन अपने मोबाइल पर बात कर रहे हैं। ``ओ नो। ``वह मोबाइल का स्विच ऑफ़ करके बताते हैं, ``ये पानी चौबीस घंटे में बंद नहीं होगा। ``
वह समझ नहीं पा रहा उकई डैम के पानी से डूबे सूरत के मातम से ये एच ओ डीज़ क्यों ग़मगीन हो रहा है ? वह यह सोचकर आया था इस कंपनी के टॉप एग्ज़ेक्युटिव्स के कंपनी मैटर्स डिस्कस करने के अंदाज़ देखेगा, बहुत कुछ सीखने को मिलेगा लेकिन यहां तो सब चुपचाप हैं। ``
चेयरमैन कहतें हैं, `यू मेहुल !आप सूरत ब्रांच के एच आर डी के एग्ज़ेक्युटिव से कॉन्टेक्ट करिये कि वे क्या कर सकतें हैं ?``
``यस। ``वे दिवांग दांडेकर का नंबर डायल करते हैं और `हाँ `हूँ `----`ओ --नो `करने लगते हैं। सुपन उलझन में है, समझ नहीं पा रहा की इस बेहद महत्वपूर्ण मीटिंग व बाढ़ में क्या सम्बन्ध है ?मेहुल मोबाइल ऑफ़ करके कहते हैं, `नो होप्स अतुल !``
``ओ माई गॉड। ``सुपन अपनी जगह पर पहलु बदल रहा है। उसने सोचा था कि पंद्रह बीस मिनट में ये डाटाज़ दिखाकर वह यहां से चला जाएगा। अधिक से अधिक समय लगा तो आधा घंटे में होटल से निकलकर घर चला जाएगा। आज वीक डे है दूसरी कंपनी में काम करने वाले पार्टनर्स तो होंगे नहीं।स्टेको शॉप से सी डी लेकर कोई मनपसंद फ़िल्म देखेगा --शायद एक महीना हो गया है उसने कोई फ़िल्म नहीं देखी। हर दिन ऑफ़िस से नौ दस बजे तक काम करके निकलो। इतवार को सबसे प्यारी चीज़ होती है -`नींद `जो ग्यारह बारह बजे तक साथ नहीं छोड़ती।शाम को कभी मूड हुआ तो पिक्चर देखी या किसी महँगे होटल में खाना खा लिया। बस जो सोमवार की सुबह से काम करने का चक्र शुरू होता है वह शनिवार की रात तक ही समाप्त होता है।
वह धीमे से कहता है, ``मेहुल !वे डाटाज़। ``
``नो !प्लीज़ !बड़ा टेंशन है। ``
``क्या बात हो गई है ? ``
वे धीमी आवाज़ में बताते हैं, ``अहमदाबाद के हैड ऑफ़िस तीन एम्प्लॉईज़ को सूरत किसी काम से भेजा था। वह दोपहर में अडाजन जगह से गुज़र रहे थे तभी उकई डैम का पानी छोड़ दिया गया। वहां पानी के बढ़ते स्तर को देखकर वे घबराकर एक ट्रक में चढ़ गए। .वे सोच रहे थे कि पानी कम हो जाएगा तो उतर जाएंगे लेकिन पानी बढ़ता ही गया। उनमें से एक के पास मोबाइल था इसलिए उसने लोकल ऑफ़िस में ख़बर कर दी लेकिन लगता है ट्रक में और पानी भर गया है। मोबाइल भीग गया होगा। अब वह नेटवर्क कैच नहीं कर रहा है। ``
``ओ ----.``
चेयरमैन परेशान से दांडेकर से स्वयं बात करने लगते हैं, ``उस ट्रक मे फँसे लोगों के लिए कोई बोट अरेंज करिये। किसी अच्छे बोटमैन से बात करिये -----मनी ?---मनी इज़ नॉट अ प्रॉब्लम ---जितना मांगें उतना दीजिये -----ज़्यादा से ज़्यादा कितना मांगेंगे ?दस हज़ार ----बीस हज़ार। ``
वह कल्पना करता है ट्रक में कंपनी के अटके तीन प्राणी ---दूर दूर तक फैला मटमैला पानी ---उस खुले मैदान से इमारतें दूर हैं जहां से देखा भी नहीं जा सकता की दूर खड़े आठ दस ट्रकों में से एक ट्रक में तीन जानें शरण लिए हुए हैं। यदि उन इमारतों के बाशिंदे जान भी जायेंगे तो कौन सा तीर मार लेंगे क्योंकि वे तो पहली, दूसरी या -----मंज़िल पर फंसे बिजली, पानी के लिए तरस रहे होंगे। यदि पानी कम नहीं हुआ तो दूध के अभाव में चाय जैसी नामालूम के लिए तरस जाएंगे।
तभी चेयरमैन का मोबाइल की डायल टोन बज उठती है, `` क्या कहा ?वे तैयार नहीं हैं ?उन्हें समझाओ जितना पैसा चाहिए उन्हें देंगे। उन तीनों को बचाकर लाएं। ---क्या कहा वे बोटमैन अपनी जान जोखिम में डालना नहीं चाहते ?नॉनसेंस --तो बोटिंग सीखी क्यों थी ?``
कुछ क्षण तक बोर्ड रूम में चुप्पी छाई रहती है। चैयरमैन का तनाव व गुस्सा पेपरवेट पर सरसराती उनकी उंगलियों से आंका जा सकता है।
मेहुल उससे कहते हैं, ``सुपन !यू मे लीव नाऊ .``
``इट `स ओ के.मैं घर जाकर भी क्या करूंगा ? ``
उसे पता है वह घर जाकर कोई सी डी नहीं देख सकता, किसी तेज़ संगीत में नहीं डूब सकता। उसका मन भी सूरत में पानी में फंसे ट्रक में उलझ कर रह गया है। समाचार मिलता है कि सूरत में तेज़ पानी बरसना आरम्भ हो गया है। बरसते पानी में लबालब मटमैले पानी में डूबे सूरत के अडाजन के उस हिस्से में पानी में डूबे ट्रकों में से एक ट्रक में फंसे वे तीनों सर्दी से अधिक मौत की आहट से डर रहे होंगे ---पता नहीं अंतिम क्षण पता नहीं कब आ जाये ?बार बार ट्रक से बाहर के पानी के तल को देखकर और घबरा जाते होंगे ---कहीं ये और न बढ़ जाए। वह अनुमान लगाने से कतरा रहे होंगे कि पानी का तल कितना और बढ़ेगा जिससे वह पूरे डूब जाएँ।यदि वे पूरे डूब गए तो आँख, कान मुंह में भरते पानी से उनकी श्वास नली तो बंद होगी ही --उनका बहता शव घर वालों को मिलेगा या नहीं ?सुपन को स्वयं शरीर में देर तक पानी में रहने की गलन महसूस होने लगी है।
बेचैन होकर चेयरमैन फिर दांडेकर को फ़ोन करने लगते हैं ., ``किसी लोकल रेसक्यू टीम से कॉन्टेक्ट क्यों नहीं हो पा रहा ?---उस एरिया में ख़तरनाक ढंग से पानी भरा है सो वॉट ? -----डू समथिंग डी------सेव दोज़ थ्री गाइज़ एट एनी कॉस्ट। ``
चैयरमैन की बेचैनी हॉल में बैठे हुए हर एग्ज़ेक्युटिव की साँसों में जेसे उतर रही है। सबका मन फिंगर क्रॉस मुद्रा में है -हे भगवान ! उन तीनों का जीवन बचा लीजिये . सूरत में सभी आदमी, औरतें, बच्चे, पशु आदि पानी में डूबे हुए हैं लेकिन हॉल में बैठे लोगों की चिंता उस ट्रक में फंसे तीन लोगों के इर्द गिर्द घूम रही है। चैयरमैन के दांयी तरह बैठे प्रोडक्शन इंचार्ज पूछते हैं, ``सर !डिनर के लिए ऑर्डर कर दिया जाए। ``
``श्योर!सबसे पूछ लीजिये क्या खाएंगे। मैं तो कॉफ़ी व सैंडविच लूंगा। ``
थोड़ी देर में सब सेंडविच व कॉफ़ी ले रहे हैं। कॉफ़ी पीते पीते भी चेयरमैन बड़बड़ा रहे हैं, ``दांडेकर का फ़ोन नहीं आ रहा--ही मस्ट डू समथिंग। ``
कॉफ़ी पीने के बाद हॉल में फिर चुप्पी छाई हुई है। मेहुल फिर उससे कहते हैं, ``सुपन तुम जा सकते हो। ``
``नो सर, जब तक वे तीनों बचा लिए नहीं जाते तब तक मैं कैसे घर जा सकता हूँ ?``
क्यों उसे लग कि पानी में फंसे लोग बच जाएंगे या इस हॉल में जुटे एकजुट हुए लोगों की चाह, उनकी प्रार्थना उन्हें बचा ही लेगी।इंसानी जान को बचाने के लिए लोग प्रार्थनाएं तो हर बार करते हैं। जान बख्शी जाए या नहीं ----ये फ़ैसला कौन करता है ?वह कहाँ छिपा बैठा है।
सुबह से शाम तक मोबाइल, लैपटॉप, ए सी ऑफ़िस, ट्रेन के ए सी डिब्बों या प्लेन में उड़ते प्राइवेट कम्पनी के एग्ज़ेक्यूटिव्स को पता नहीं क्यों सब मशीन समझते हैं ?सुपन देख रहा है मेज़ के चारों ओर बैठा हर कोई अपने रिश्तेदार, दोस्त या किसी सोर्स को मोबाइल से सम्पर्क कर उन्हें बचाने का कोई रास्ता खोज रहा है। शायद कोई चमत्कार हो जाए। हर स्थान से यही उत्तर मिलता है, हम स्वयं पानी से घिरे बैठे हैं।
``मेहुल ! कंपनी के एन्युअल फंक्शन में तुम जिस सेलिब्रिटी को बुलाते थे --क्या नाम है उसका ?वह भी तो सूरत के पास के गाँव का है। ``
``जी अब्दुल शेख। ``
``ट्राई हिज़ नंबर। वो हमारे लोगों के लिए कुछ करें। ``
``सर वह तो फ़िल्म एक्टर है मुम्बई में बैठा हुआ है। ``
``तो क्या हुआ ?ही इज़ अ वेरी जनरस पर्सन। उसके सूरत में `लोकल कॉन्टेक्ट्स `अच्छे होंगे। ये लोग पॉलिटीशियन्स के टच में भी रहतें हैं। उन्हें फ़ोन करो कि वे कुछ करें। डू समथिंग, हमें अपने लोगों को किसी तरह बचाना है। `` मे
मेहुल अपने मोबाइल से अब्दुल शेख का सेव किया नम्बर डायल करते हैं, ``गुड इवनिंग शेख साहब। ``
``वेरी गुड़ इवनिंग।आप कैसे हैं मेहुल ?बहुत अरसे के बाद याद किया। ``
``आप कैसे हैं जनाब। ``
``माशा अल्लाह !पूरी तरह चुस्त दुरुस्त। बस अभी शूटिंग के लिए निकल ही रहा हूँ। ``मेहुल के मोबाइल के ऑन किये स्पीकर से अब्दुल शेख की आवाज़ आ रही है।
``आपसे हेल्प चाहिए लेकिन आप तो बिज़ी हैं। ``
``नहीं, नहीं बोलिये क्या काम है ?``मेहुल के संक्षेप में सारी बात बताने पर वे कहते हैं, ``मैं सूरत के अपने कॉन्टेक्ट्स ट्राई करता हूँ। ``
``आपकी शूटिंग ---?``
``शूटिंग पर तो लेट जाया जा सकता है। तीन जानों का सवाल है। ``
उन सबको लग रहा है उनके गले में जो बाढ़ का पानी उनकी साँसों को तकलीफ़, अब थोड़ा उतार पर है।
थोड़ी देर बाद शेख का कॉल आ जाता है, ``मेहुल !सूरत के मेयर मेरे गाँव के हैं। हम लोग एक ही स्कूल में पढ़ें हैं। अब मुझे समझाइये कि शहर के किस कोने में वह ट्रक खड़ा है।``
``ये मुझे पता है ट्रक अडाजन में है लेकिन वह किस दिशा में है ये नहीं पता। मैं हमारी कंपनी के एग्ज़ेक्युटिव को आपका नंबर दे देता हूँ। ``
``प्लीज़ !नो फ़ॉर्मेलिटी।नम्बर मुझे दे दीजिये। हमें समय नहीं बर्बाद करना है। ``
महाराष्ट्र के हखनूर डैम में लबालब भरे पानी को जब छोड़ा जाता है तो वह बहता बहता गुजरात के उकई डैम्म में आता है .जब इस डैम का पानी ख़तरे के निशान से ऊपर तक आ जाता है तो इसके गेट खोलकर उसे तापी नदी की तरफ़ बहा दिया जाता है। तापी नदी के तट पर बसा है सूरत।
होना तो ये चाहिए था कि बारिश से पहले थोड़ा थोड़ा पानी छोड़ देना चाहिये था क्योंकि बारिश में तो बाढ़ की सम्भावना रहती ही है .ये क्या ज़रूरी है कि गांधी जी की अहिंसा की भूमि पर बाढ़ में और पानी मिलाकर इंसानों को चींटियों की तरह मार डाला जाए ?--जिनकी किस्मत में मरना लिख दिया जाए ., मरो सूरत वालो। पानी भी तो अपना रौद्र रूप लिए सड़कों, गलियों में उछलता कूदता भाग लिया था जैसे कह रहा हो -सूरत वालो ! तुम्हें अपनी हीरे की कमाई पर बहुत नाज़ है न !इतवार को बाज़ार बंद कर होटलों में एश करते हो, सुरती, पापड़ी सुरती ऊंधियो और भी न जाने क्या क्या खाते हो ---- अब भुगतो इस कृत्रिम बाढ़ के प्रकोप को।
सुपन याद करने की कोशिश करता है वह कौन सा डैम था जिससे उत्तर प्रदेश में भी उस दिन पानी छोड़ा गया था जिस दिन गंगा में स्नान करने का पर्व था शायद सोमवती अमावस्या। तब भी बहुत से लोग पानी में बहते चले गए थे, नदियों को पूजने वाले भारत जैसे पर्वों के देश के सिंचाई विभाग के अधिशासी इन नदी तटों के पर्वों की तिथी अनदेखा करके डैम छोड़ देते हैं .ढेरों लोग मर जाएँ तो मरते रहें।
अब्दुल शेख का कॉल आते ही सब चौकन्ने हो जाते हैं, ``मेयर ने मुझसे वायदा किया है वे किसी भी तरह से उन्हें बचा लेंगे। ``
``थेंक यू वैरी मच शेख साहब। ``
``नो प्लीज़ !अपने इस दोस्त पर मुझे पूरा भरोसा है। अब मैं शूटिंग पर जा रहा हूँ। मेयर से कॉन्टेक्ट में रहूँगा। प्लीज़ डो `नट बॉदर। ``
``अगेन थेंक यू। ``घड़ी की सुइयों के साथ एक एक क्षण खिसक रहा है। हर व्यक्ति का चेहरा संज़ीदा है सिर्फ़ तीन चहरे ऐसे हैं जो खीजते हुए बार बार अपनी रिस्ट वॉच देख रहे हैं।
चेयरमैन परेशान हैं, ``मेहुल !कॉन्टेक्ट टु अब्दुल शेख। ``
``थोड़ा और वेट कर लें। ``
कुछ देर बाद उन्हीं का फ़ोन आ जाता है। स्पीकर पर सब सुन रहे हैं``एक बड़े ऑइल कंटेनर ले जाने वाले ट्रक पर एक लम्बी बोट रखवा दी है, दो बोटमैन साथ में हैं। एक तैराक भी साथ कर दिया गया है। ``
``ग्रेट लैट्स वी प्रे फ़ॉर सक्सेस। ``
सुपन के मन में भयानक आशंकाएं करवट ले रहीं हैं ---पानी का क्या है ?और बढ़ भी सकता है --किसी तेज़ पानी के रेले से बोट उलट भी सकती है -----कहीं तीन जानों के बदले तीन जानें ?---नहीं ----ऐसा नहीं होगा ---ऐसी भयंकर बाढ़ में क्या कुछ नहीं हो सकता। ?बुरी बात नहीं सोचनी चाहिए ---फिर भी संभावना तो है ही बोट अँधेरे में किसी चीज़ से टकरा ही जाये। ---कहीं बोट के ट्रक तक पहुँचने से पहले ही उसमें इतना पानी भर गया हो और ------ख़ैर ----ऐसा बुरा नहीं होगा। पल पल पर कदम रखता ये इंतज़ार बेहद भारी पड़ रहा था बिना काम किये कुर्सी पर बैठे शरीर थकने लगे हैं।
मेहुल का मोबाइल बज उठता है.आवाज़ अब्दुल शेख की है, ``मेहुल ! वे तीनों बचा लिए गये हैं .``.
मेहुल की आवाज़ खुशी के कारण ज़ोर से निकलती है, ``क्या सच में ?ग्रेट शेख साहब !आपका अहसान हम ज़िंदगी भर नहीं भूलेंगे---थैंक यू वेरी मच। ``
``कैसी बात कर रहे हैं ?ये तो इंसानियत का फ़र्ज़ था। ``
``लेकिन आपने निबाहा भी इंसानों की तरह। ``
``उपरवाले का साथ होना चाइये, ब्लेसिंग्स होनी चाहिए। ``अतुल भी शेख साहब को धन्यवाद देते हैं। मेहुल के स्विच ऑफ़ करते ही सब ख़ुशी में अपने पास बैठे व्यक्ति से हाथ मिलाने लगते हैं, `थेंक्स फ़ॉर गॉड ---कॉंग्रेट्स। ``
सभी बहुत खुश व भावुक हैं। कुछ लोग कुर्सी से उठकर आपस में गले लग रहे हैं। दो तीन भावुक लोगों की आँखों की कोरों में आंसू की बूँद झिलमिला रही है। सब लोग अपनी फ़ाइल्स ब्रीफ़केस में रखकर आपस में बातचीत करते हॉल से बाहर चल दिए हैं। उन तीनों के मुंह अलबत्ता कुछ लटके हुए हैं, इस ज़रूरी मीटिंग के लिए एक दिन और अहमदाबाद रुकना पड़ेगा।
सुपन अपनी कार की तरफ़ बढ़ रहा है। कार का दरवाज़ा खोलकर लैपटॉप सीट पर रख कर ड्राइविंग सीट पर बैठकर कार होटल से बाहर निकलते हुए सोच रहा है -इस बाढ़ के लिए सरकार ज़रूर कोई जांच कमेटी बनाएगी। किसी जज के नेतृत्व में बनी एन जी ओ सहित ये कमेटी यदि रिपोर्ट भी दे भी तो क्या है ?----`मैन मेड डिज़ास्टर `[इंसान के द्वारा उत्पन्न आपदा ].
सुपन ये बात तो उस दिन सपने में भी नहीं सोच पाया था कि सात अगस्त से डैम से जो पानी छोड़ होगा, वह नौ अगस्त की सुबह तक चलता रहेगा। वह ये भी नहीं सोच पाया था कि कि इस वर्ष सूरत में हाहाकार मचाते हुए पानी की दहशत से अगले वर्ष बारिश का मौसम आते ही कुछ लोग इतने आक्रांत होंगे कि टी वी की स्क्रीन पर ही उकई डैम से उस वर्ष भी पानी छोड़े जाने की बात सुनकर उन्हें उनके घरवालों को मनोवैज्ञानिक को दिखाना पड़ेगा .
कार से फ़्लैट की तरफ़ जाते हुए तब उसे ये अनुमान लगाना मुश्किल था कि आर्थिक हानि इक्कीस करोड़ तक पहुँच जाएगी यानि कितनी जानें गईं होंगी ?सरकार न अनुमान लगा पायेगी, न बता पायेगी । सारे सूरत शहर में तांडव मचाते जान लेते पानी से एक डॉक्टर इतनी आन्दोलित होगी कि साल भर बाद मृतकों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना गीतों की सी डी रिलीज़ करेगी। एक वर्ष बाद यानि सन 2007 में में इससे क्या फ़र्क पड़ेगा कि जांच कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार समाचार पत्र प्रकाशित करें कि `इट वाज़ ए केस ऑफ़ द क्रिमिनल नेग्लीजेंस ` [ एक वर्ष पूर्व यह एक आपराधिक लापरवाही से उत्पन्न दुर्घटना थी ।]
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नीलम कुलश्रेष्ठ
Kneeli@rediffmail.com