अलभ्य
जिस वक्त मैं ट्रेन से उतरकर प्लेटफाॅर्म पर आया, सुबह के चार बजकर सत्रह मिनट हो रहे थे। घड़ी मेरी कलाई पर बंधीं थी, लेकिन समय का भान प्लेटफाॅर्म पर उतरते ही रेलवे स्टेशन की उस इलेक्ट्राॅनिक घड़ी से हुआ, जिसके डायल पर लाल रंग के चमकते अंकों पर अनायास आंखें जा टिकी थीं। ऐन इसी वक्त मैंने अपनी घड़ी भी देखी और इत्मीनान हुआ कि मेरी घड़ी भी ‘राइट टाइम’ चल रही है। मेरे पास एक छोटी-सी सफारी अटैची थी और मैं इस ट्रेन से उतरा इकलौता मुसाफिर था। प्लेटफाॅर्म पर दूर-दूर तक सन्नाटा था और जो लोग बेंचों पर बैठे हुए थे, वे भी उनींदे-अलसाए, मेरी उपस्थिति से जैसे निहायत गाफिल थे। उचटती नजरों से प्लेटफाॅर्म का जायजा लेते हुए मैंने महसूस किया कि सर्दियों की रात का यह समय गर्माहट का सबसे नाजुक क्षण है। शायद इसीलिए ट्रेन के डिब्बों में मौजूद लोगों में भी कोई हलचल नहीं थी और मुझे पक्का यकीन है कि जिस डिब्बे में मैं सफर कर रहा था, उसमें मौजूद अधिकांश यात्रियों को आभास भी नहीं होगा कि बीच रास्ते में उनका एक सहयात्राी कब और कहां उतर गया। यह एक दिलचस्प ख्याल था। इस ख्याल के ख्याल से मेरे भीतर गुदगुदी-सी हुई और मैं अनायास ही मुस्करा पड़ा।
ट्रेन के इंजन ने सीटी दी। पता नहीं सीटी कमजोर थी या कि ड्राइवर ही उनींदा-अनमना था, हांफती-खांसती-सी आवाज उभरी और देखते ही देखते डिब्बे रेंगने लगे। जाती हुई इस ट्रेन को, जिससे अभी-अभी मैं स्वयं सफर कर रहा था, देखना बेहद रोमांचक लग रहा था। खट्ट-पट करते डिब्बे एक-एक कर मेरे सामने से निकलते जा रहे थे और मैं अंतिम डिब्बे को देखने की उत्सुकता से भरा हुआ था। अंतिम डिब्बा गार्ड का था। गार्ड रेलवे की यूनिफार्म में कसा मफलर से अपने कानों को ढांके डिब्बे के दरवाजे पर खड़ा था। उसके बाएं हाथ में एक टाॅर्च थी, जिससे निकलती हरी रोशनी का संकेत वह इंजन की दिशा में प्रक्षेपित कर रहा था। जब तक मैं गार्ड के बारे में ठीक-ठीक कुछ सोच पाता, उसके डिब्बे के पीछे चमकते ‘टेल लाइट’ की लाल रोशनी पर आंखें जम गई और जैसे सर्द हवा के झोंके ने दिमाग की नसो को जमाकर रख दिया।
ट्रेन जा चुकी थी। प्लेटफार्म खाली हो चुका था। ट्रेन की मौजूदगी से अभी-अभी जो प्लेटफार्म एक जिंदा आबादी का दृश्य लग रहा था, अचानक भांय-भांय करते सन्नाटों भरी किसी मुर्दघट्टी में तब्दील हो गया था। इस प्लेटफार्म के उस पार जो दूसरा प्लेटफार्म था, वह घने कोहरे से भरा था और जलते बल्बों की मद्धिम रोशनी के बावजूद कहीं कुछ नजर नहीं आ रहा था। मैंने अचानक सिहरन-सी महसूस की। तन-बदन में ठंड की तीखी लहर दौड़ गई। मैंने अटैची प्लेटफाॅर्म पर रखकर मफलर को इस तरह कसा कि ढीली पड़ गई गांठ मेरे निचले जबड़े से जा सटी। कान कुछ ज्यादा ही कस गए थे, बावजूद इसके ठंड की चुभन कम नहीं हुई। खुले चेहरे पर मिर्च मल दिए जाने का तीखापन बढ़ गया था। मैंने अटैची उठा ली और अंदाज से स्टेशन के मुख्य द्वार की ओर बढ़ चला। गनीमत थी कि मेरी ट्रेन अप लाइन की थी, इसलिए वह मुख्य प्लेटफार्म पर ही रुकी थी। लिहाजा मुझे खुशी हुई कि चलो, कम से कम उस प्लेटफार्म से इस प्लेटफार्म तक आने के झंझट से बचा।
प्लेटफार्म पर सन्नाटा बरकरार था। चन्देक बेंचों पर बैठे लोग जिस इत्मीनान से झपकी ले रहे थे, उससे यही लग रहा था कि वे ऐसे लोग होंगे जिन्हें कहीं आना-जाना नहीं होगा। हो सकता है, ये लोग मेरी ही तरह किसी ट्रेन से उतरे हों और सुबह का इंतजार कर रहे हों, ताकि उजाले में अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर सकें। मैं स्वयं नहीं तय कर पा रहा था कि इस वक्त मुझे क्या करना चाहिए?
अब जबकि सुबह का समय था, फिर भी गहरा अंधेरा कायम था। कोहरे की चादर में लिपटा अंधेरा इतना घना था कि स्टेशन के बाहर जाने की कल्पना भी कठिन थी। खासकर ऐसे अनजान शहर में, जहां न सिर्फ मैं पहली बार आया था, बल्कि जहां और जिसके यहां मुझे जाना था उससे भी मैं लगभग अपरिचित था। हालांकि मेरे पास टेलीफोन नंबर था, फिर भी मुझे यह अशिष्टता लग रही थी, कि मैं अपने मेजबान को इस वक्त, जबकि वह नींद के गर्म आगोश में होंगे, परेशान करूं। यूं भी, इस वक्त मेजबान के घर पहुंचकर भी क्या करूंगा? न खुद सो पाऊंगा, न उन्हें आराम मिल पाएगा।
मेरे लिए मुफीद यही था कि मैं स्टेशन पर ही रुककर उजाले का इंतजार करूं। हद से हद डेढ़ घंटा। छह बजते-बजते पौ फटने लगेगी और चीजों की पहचान साफ होने लगेगी। उजाले में काफी हद तक भय और भ्रम खत्म हो जाते हैं और आदमी खुद भी आत्मविश्वास से भर जाता है। यह एक सही निर्णय था और मैंने तय किया कि मुझे स्टेशन पर ही रुककर सुबह का इन्तजार करना चाहिए। प्लेटफार्म पर महज तीन बेंचें थीं और उनपर लोग पसरे पड़े थे, लिहाजा वहां बैठने की कोई गुंजाइश नहीं थी। वैसे भी खाली प्लेटफार्म पर ठंड कुछ ज्यादा ही लग रही थी, सो किसी बेंच पर बैठकर इंतजार करना मुझे जंचा नहीं। मैंने प्लेटफार्म पर टहलते हुए स्टेशन-मास्टर कक्ष को ढूंढ़ना शुरू कर दिया। लेकिन सौभाग्य से मेरी नजर एक ऐसे बोर्ड पर जाकर अंटक गई, जिस पर ‘प्रतीक्षालय’ लिखा था।
सहसा विश्वास नहीं हुआ कि इस छोटे से स्टेशन पर ‘प्रतीक्षालय’ भी है। लेकिन प्रतीक्षालय था और दरवाजे के दोनों पल्ले तिकोन की शक्ल में आपस में भिड़े हुए थे। क्षण भर को ठिठककर मैंने प्रतीक्षालय के बोर्ड को निहारा और फिर आश्वस्त हुआ कि सामने जो कमरा है, वह प्रतीक्षालय ही है। लकड़ी के पल्लों के ऊपरी हिस्से में पारदर्शी चैकोर शीशे लगे थे, जिससे छनकर आती मरियल रोशनी के अलावा और कुछ नजर नहीं आ रहा था।
मैंने एक बार फिर घड़ी देखी। साढ़े चार बज रहे थे। इस बीच या तो ठंड बढ़ गई थी या फिर ‘प्रतीक्षालय’ देखकर मेरे भीतर ठंड का अहसास कुछ ज्यादा गहरा गया था। मैंने तेज कदमों से चलते हुए प्रतीक्षालय की दूरी तय की और दाहिने हाथ का दबाव देते हुए दरवाजा खोल डाला। अंदर एक अजीब-सी गंध अंटी पड़ी थी। कुछ-कुछ आदमी की सांसों और दीवारों की सीलन की मिली-जुली गंध। सामने की दीवार से लगी लोहे के फ्रेम में कसी-फंसी प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठे लोग अधजगे, अधलेटे-से पड़े थे। एकाध ने अनमनेपन से आंखें खोलीं और मुझे देखकर, और शायद आश्वस्त होकर कि मेरी उपस्थिति निरापद किस्म की है, पूर्ववत आंखें बंदकर अपने आप में गुम गए। कमरे की बाईं दीवार की तरफ भी कुछ कुर्सियां थीं और संयोग से उनमें अधिकांश खाली पड़ी थीं। बस किनारेवाली कुर्सी पर एक बुजुर्ग थे जो पूर्णतः जागृत मुद्रा में बैठे थे। यह दीवार जहां खत्म होती थी, वहां एक द्वार था जो बाथरूम का रास्ता था। कमरे के बीचोबीच एक टेबुल पड़ी हुई थी, जिसपर दो जने मय लाव-लश्कर सोए थे। उनमें से एक की नाक जोर-जोर से बज रही थी और कमरे का संन्नाटा कुछ अजीबोगरीब अंदाज में भंग कर रही थी मानो कोई बनबिलाव दुश्मन पर आक्रमण के लिए पंजे पिजा रहा हो।
मैं बाईं दीवार की खाली कुर्सियों की ओर बढ़ा और वहां बैठे बुजुर्ग के बीच दो कुर्सियां छोड़कर एक कुर्सी पर जम गया। अपनी अटैची पैरों के पास इस तरह रखी कि वह मेरे पैरों से सटी रहे और उसकी मौजूदगी का भान मुझे होता रहे। इस तरह इत्मीनान हो लेने के बाद, मैने महसूस किया कि चलो, उजाले का इंतजार अब बहुत कठिन नहीं होगा। नसों का तनाव ढीला पड़ने लगा था, लेकिन देह में अकड़न-सी होने लगी थी। शायद नींद पूरी न होने और देह को झकझोरती ट्रेन की रफ्रतार से उपजी थकान एक साथ हावी हो आई थी। मैंने पैंट की जेब से सिगरेट निकाली और अपनी कतार में बैठे बुजुर्ग की तरफ देखा, गोया उन्हें कोई आपत्ति न हो। लेकिन वह मुझसे गाफिल एकटक बाहरी दरवाजे की ओर देखने में मशगूल थे- जैसे उन्हें किसी आगन्तुक की प्रतीक्षा हो। मैंने बेफिक्री से सिगरेट सुलगाई और एक लंबा कश खींचकर धुआं छत की ओर उड़ेल दिया। धुएं का एक नीला गुबार वृत्ताकार फैलता हुआ छत से लटक रहे मरियल बल्ब की रोशनी में गड्डमड्ड होने लगा।
मेरी कतार में बैठे बुजुर्ग ने उचटती नजर से मुझे देखा। जबतक मेरी आंखें उनकी आंखों से मिलतीं, वह छत की ओर देखने लगे थे। छत अपेक्षाकृत ऊंची थी। अंग्रेजी जमाने के बने मकानों की छतें आमतौर पर ऐसी ही उंची होती हैं। इन ऊंची छतों का विज्ञान चाहे जो रहा हो, अंग्रेजों का मनोविज्ञान मुझे खासा दिलचस्प जान पड़ता रहा है। बुजुर्गों के पास इस दिलचस्पी को बढ़ानेवाले ढेरों किस्से मिल जाते हैं। एक से एक लौकिक। एक से एक पारलौकिक। इस वक्त जो बुजुर्ग मेरी कतार में मुझसे दो कुर्सी परे बैठे हैं, उनके पास भी कोई न कोई अंग्रेजी किस्सा जरूर रहा होगा, लेकिन मेरी परेशानी यह थी कि वह अपने आप में खोए निहायत अजनबी बने पड़े थे। उनकी तरफ से संवाद की कोई पहल होती नहीं दिख रही थी। मैंने चोर नजरों से गौर किया कि बंद गले के नीले सूट में इस बुजुर्ग की उम्र तकरीबन पैंसठ साल की होगी। गोरा-दमकता चेहरा रौब से भरा हुआ। उनके पैरों के सामने एक बड़ी-सी खूबसूरत अटैची थी। उनकी उपस्थिति में खास तरह की एक भव्यता थी। मुझे लगा कि वह किसी बड़े पद से रिटायर हुए ऐसे अफसर होंगे, जो अपने अभ्यस्त आभिजात्य के चलते अकेले पड़ जाने को अभिशप्त होता है।
प्रतीक्षालय का यह कमरा बमुश्किल चैदह गुणा बारह फुट का होगा। यही वजह थी कि मुझे मिलाकर कुल जमा नौ लोगों की मौजूदगी के बावजूद भरा-भरा-सा लग रहा था। दरवाजा बंद रहने तथा लोगों की सांसों के अंटे पड़े होने के कारण कमरा खासा गर्म था। बीच की टेबुल पर लेटा शख्स जो खर्राटें भर रहा था, अचानक कुनमुनाया और खर्राटों का बजना थम गया। एकबारगी कमरे में सन्नाटा छा गया। हालांकि कानों को सुकून मिला, लेकिन एक अजीब खालीपन खल गया। मुझे लगा कि वह शख्स जो खर्राटे भर रहा था, थोड़ी देर बाद फिर खर्राटे लेने लगेगा, लेकिन मेरा अंदाजा गलत साबित हुआ। वह जम्हाइयां लेता हुआ हड़बड़ाकर उठ बैठा। अपनी कलाई घड़ी पर समय देखने के साथ ही उसने अपने सिरहाने रखी अटैची भी देखी और फिर धम्म से टेबुल से उतरकर अपने जूते पहनने लगा। शायद वह जाने की तैयारी में था। हो सकता है, उसका नियत समय यही हो। सोने से पहले उसने शायद यही समय सोचा हो। और अब जबकि उसकी नींद टूट गई थी, वह एकदम हड़बड़ी में था। मैंने सोचा कि शायद वह अपने साथ सोए दूसरे शख्स को भी उठाएगा। लेकिन ताज्जुब कि न तो उसने दूसरे शख्स को उठाया और न ही सोए हुए उस शख्स को यह अंदाजा हुआ कि उसके बगल में बनविलाव की तरह गुर्राता शख्स उठकर कहीं जाने की तैयारी में है।
यह शख्स जो नींद से बाहर आकर कमरे में अपनी हरकतों से हलचल पैदा कर रहा था, दूसरी दीवार की ओर कुर्सियों पर ऊंघते लोगों के लिए परेशानी का कारण बन गया था। जूते घिसने-घसीटने की आवाज, अटैची उठाने और फर्श पर रखने की किरकिराहट कमरे के सन्नाटे में कुछ ज्यादा जोर से बज रही थी। जाहिरन यह बाकी लोगों को नागवार गुजर रहा था, लेकिन कोई कुछ बोल नहीं रहा था। हालांकि लोगों के चेहरे पर आजिजपन आ चुका था, लेकिन कहीं कोई बंदिश थी, जो उन्हें सख्त चुप्पी में जकड़े हुए थी। मैंने गौर किया कि उन कुर्सियों पर बैठे पांच लोगों में से दो अधेड़ उम्र के हैं। गर्दन तक कंबलों में दुबके हुए। तीसरा शख्स युवा था। तकरीबन बाईस-चैबीस साल का। फरवाली टोपियों के साथ एक खूबसूरत जैकेट में टिप-टाप। चौथा सिर्फ एक शाॅल लपेटे हुए था। शाॅल जितनी मटमैली थी, उसका चेहरा उतना ही मलिन था। वह अपने आपमें सिकुड़ा, गुड़ीमुड़ी था। पांचवां रेलवे का मुलाजिम जान पड़ता था। उसका पहनावा रेलवे कर्मचारियों के यूनिफार्म की तरह था। उसके चेहरे पर अपने ही घर में पड़े होने का-सा इत्मीनान पसरा पड़ा था। ये पांचों के पांचों शख्स उस आदमी को एकटक घूर रहे थे, जो जूते पहनकर अपनी अटैची उठाए खड़ा था। शायद वह कोई निर्णय ले रहा था। अगले ही क्षण उसने अपनी गर्दन को झटक दिया और अटैची लिए दिए बाथरूम में घुस गया।
बाथरूम का दरवाजा बंद कर उसने अपने आपको अंदर कैद कर लिया। मैंने कमरे में बैठे बाकी लोगों की तरफ सरसरी निगाह दौड़ाई। सारे के सारे लोग यथावत अपनी चुप्पियों में धंसे हुए थे। बाथरूम में मय अपने सामान के बंद व्यक्ति से निरपेक्ष इन लोगों के बारे में सहसा एक ख्याल कौंधा।
इनमें से किसकी नीयत में खोट हो सकता है? कौन ऐसा हो सकता है, जो उस आदमी की अटैची लेकर भाग सकता था? चेहरे-मोहरे, हाव-भाव और उपस्थिति से तो कोई ऐसा नहीं लगता। तो...तो... वह व्यक्ति अपनी अटैची यहीं क्यों नही छोड़ गया? शायद, उसे किसी पर विश्वास नहीं था। उसने कमरे में मौजूद हर शख्स की विश्वसनीयता को संदेह में डाल दिया था। यहां तक कि मैं...मैं स्वयं भी उसकी नजर में संदिग्ध था। अपने बारे में इस तरह सोचते हुए मेरे भीतर हंसी का गुबार उठा और उसे रोकने की कोशिश में मैंने सिगरेट फर्श पर डाली और टोटे को जूते से रगड़कर बुझा दिया।
ऐन इसी वक्त मेरी कतार में बैठे बुजुर्ग ने अपनी अटैची सरकाकर अपने सामने जमाई और दोनों पांव उसी पर फैलाकर आराम की मुद्रा में पसर गए। मुझे लगा कि बुजुर्ग अपनी उम्र के कारण बहुत देर तक एक ही मुद्रा में बैठे रहने में सक्षम नहीं हैं। उनके जूतों के ‘टो’ छत की ओर थे और तले उस टेबुल की ओर जो कमरे के बीचोंबीच पड़ी थी, जिस पर अभी भी एक शख्स सोया पड़ा था। मैंने उस सोए हुए आदमी को निहारा। थुलथुल देहवाला वह आदमी बड़े-बड़े फूलो के छापे वाला खूबसूरत-सा कंबल ओढ़े था, जिसका आधा हिस्सा टेबुल की एक तरफ लटका हुआ था। उसने अपने सिरहाने अपना बैग तकिए की तरह लगा रखा था। सफर में बैग को तकिए की तरह लगाने का प्रचलन कब शुरू हुआ होगा? शायद तब, जब किसी चोर ने किसी मुसाफिर का बैग पहली-पहली बार चुराया होगा। इस तरह उस पहले चोर ने तमाम सहयात्रियों की विश्वसनीयता भी चुरा ली होगी।
अचानक, बचपन में पढ़ी एक कहानी याद आ गई। एक बच्चा सफर पर जा रहा था। उसकी मां ने कुछ मुहरें उसकी मिर्जई में रखकर सिल दीं। डाकुओं के सरदार ने बच्चे से पूछा, ‘‘तेरे पास कुछ नहीं है?’’ बच्चे ने जवाब दिया, ‘‘मेरी मिर्जई में कुछ मुहरें हैं।’
सरदार ने पूछा, ‘‘तेरी मिर्जई में मुहरें हैं। यह बात तूने छुपाई क्यों नहीं?’’ बच्चे ने जवाब दिया, ‘‘मेरी मां ने कहां था, कभी झूठ मत बोलना।’ सरदार बच्चे की ईमानदारी से बेहद खुश हुआ। उसका हृदय परिवर्तन हो गया वगैरह...वगैरह। यह कहानी बचपन में बहुत प्रभावित करती थी, लेकिन इस वक्त उतनी ही हास्यापद लग रही थी। पता नहीं किस जमाने की वह मां थी। किस जमाने का वह बच्चा और डाकू थे?
एक अजीब बचैनी घर कर गई। मैंने पहलू बदला। घड़ी देखी। सवा पांच बज रहे थे। बाहरी दरवाजे से शीशे के पार देखते हुए लगा कि अंधेरा अभी छंटा नहीं है। प्लेटफार्म पर भी कोई हलचल नहीं थी। बल्बो की मद्धिम रोशनी यथावत थी। लग रहा था, कोई ट्रेन भी आने-जाने का समय नहीं हुआ था। सभी इत्मीनान से थे। एक अभ्यस्त ‘रूटीन’ की बेफिक्री। किसी छोटे रेलवे स्टेशन पर इस तरह इतनी देर रुकने-ठहरने का यह पहला अनुभव था। इतनी लंबी खामोशी वाकई दिलचस्प थी। लेकिन यह दिलचस्पी अब उबाने लगी थी। बाहर सन्नाटा। भीतर चुप्पी। इतने लोग, फिर भी संवाद नहीं। इतने बेहिस। इतने बेजान लोग कि एकबारगी मुझे कोफ्त होने लगी।
मुझे हैरत हो रही थी कि कमरे में मौजूद ये लोग वाकई इतनी गहरी चुप्पी में कब तक रह सकते हैं? मैंने उस दीवार की तरफ लगी कुर्सियों पर बैठे लोगों को एक बार फिर देखा। जैकेटवाला नौजवान ठुड्डी पर हाथ रखे कुछ सोचने की मुद्रा में था। क्या सोच रहा होगा? देखने से तो किसी अच्छे घर का लगता है। नौकरी-वौकरी जैसी चिंता तो उसे होनी नहीं चाहिए। फिर? भगवान जाने क्या सोच रहा होगा! लेकिन सोचता हुआ वह मुझे जंच नहीं रहा था। मैंने अपनी निगाह मटमैले कंबलवाले उस व्यक्ति के चेहरे पर टिका दी, जिसका चेहरा देखने से ही मलिन जान पड़ रहा था। वह दुखी लगता था। हो सकता है, इस वक्त उसे कोई गहरा दुख साल रहा हो। हो सकता है, वह इस वक्त जैसा दिख रहा हो, वह हर वक्त वैसा ही दिखता हो। कुछ लोगों का चेहरा ही ऐसा होता है। सहसा, उस आदमी की आंखें मेरी आंखों से टकराई और मैंने अपनी चोरी पकड़े जाने की हड़बड़ी में अपनी आंखें उधर से हटा लीं। क्या सोच रहा होगा यह आदमी? जरूर मेरे ही बारे में सोच रहा होगा। हो सकता है, वह मुझ पर शक कर रहा हो। वाकई मुझे, उसे इस तरह नहीं देखना चाहिए था, न उसके बारे में सोचना चाहिए था।
मैंने चोर निगाहों से देखा, रेलवे के मुलाजिम जैसा दिखनेवाला आदमी जो फर्श पर बेफिक्री से टांगें फैलाए था, बिटर-बिटर ताक रहा था। वह किसे देख रहा है, या किस ओर देख रहा है, यह अंदाज लगा पाना मुश्किल था। हो सकता है, इस तरह देखना उसकी आदत में शामिल हो। मेरी इच्छा हुई कि मैं उसे जाहिरा तौर पर देखूं, लेकिन लगा कि मेरी यह हरकत उसे बुरी लग सकती है। वह रेलवे का मुलाजिम है, किसी तरह की मुसीबत खड़ी कर सकता है। यह आशंका मुझे भीतर ही भीतर सिहरा गई। मैं अपने-आप में सिमट गया।
मैंने फिर घड़ी देखी। साढ़े पांच बज चुके थे। बाथरूम गया शख्स अभी तक लौटा नहीं था। मेरी भी इच्छा हुई कि मुझे ब्रश कर लेना चाहिए। चाय की तलब भी जोर मारने लगी थी।ऊब, तलब, बेचैनी और आशंका के तमाम भावों को दरकिनार करने के लिहाज से मैंने अपनी अटैची उठाई और अपने घुटनों पर रख लिया। एक ‘खट’ की आवाज हुई और अटैची का लाॅक खुल गया। मैंने देखा, वहां मौजूद सबकी आंखें मेरी ओर आ लगी हैं। क्यों? क्यों हुआ ऐसा? कहीं ऐसा तो नहीं कि सबके सब अपनी तन्हाई से ऊबने लगे हैं? यह गहरी चुप्पी सबको खल रही है शायद। सभी जिाद के बहाने ढूंढ़ रहे हैं। लेकिन कोई पहल क्यों नहीं करता? कोई किसी से पूछता क्यों नहीं, ‘‘आप कहां से आए हैं? कहां जाना है? यहां किस लिए आए हैं। यहां से कहां जाना है।’’ कुछ भी। बातचीत शुरू करने के बहुत से बहाने हैं। बात शुरू हो जाए तो बात से बात निकलनी क्या मुश्किल? लेकिन नहीं। कोई पहल होती नहीं दिख रही।
मैंने अटैची के एक कोने में रखा ब्रश-पेस्ट निकालकर अटैची लाॅक कर दी। मैं अंदर गए आदमी के बाहर निकलने की प्रतीक्षा करने लगा। मुझे ध्यान आया कि वह आदमी काफी देर से अंदर है। जब तक मेरे पास अंदर जाने की वजह नहीं थी, तब तक यह ध्यान में भी नहीं आया था और अब जब ध्यान आया तो मुझे उस आदमी पर झुंझलाहट होने लगी। भगवान जाने इतनी देर से अंदर क्या कर रहा है? हां, उसके बाहर आते ही मैं अंदर चला जाऊंगा वर्ना पता नहीं कोई और जाए तो कितनी देर लगा दे। अंदर जाते हुए मुझे क्या करना चाहिए? अटैची बाहर ही छोड़ दूं या साथ लेता जाऊं ? साथ ले जाना जितना हास्यापद लग रहा था, बाहर छोड़ना उतना ही मुश्किल। यहां जो लोग, जिस तरह अजनबीयत ओढ़ बैठे हैं, उसमें से कौन जिम्मेदारी लेगा भला? अगर मैं पहल करके किसी से अनुरोध भी करूं तो किससे? इन सबमें कोई अपेक्षाकृत अंतरंग होना चाहिए। और अगर किसी ने अटैची देखने की जिम्मेदारी लेने से इन्कार कर दिया तो? इधर आतंकवादी गतिविधियों के चलते अजनबियों से मेल-जोल न बढ़ाने की नसीहतें रेलवे-बस स्टेशनों पर खूब प्रचारित की गई हैं, इसलिए भी लोग अतिरिक्त सर्तकता बरतने लगे हैं। किसी का सामान देखने की जिम्मेदारी लेना तो और भी खतरनाक माना जाने लगा है। क्या पता सामान के भीतर बम हों? गांजा, भांग, स्मैक, हेरोइन हो? नहीं... नहीं... किसी को धर्म संकट में डालना ठीक नहीं। बेहतर होगा कि मैं अपनी अटैची कुर्सी पर यूं ही छोड़कर अंदर चला जाऊं। जो होगा, देखा जाएगा। वैसे भी मुझे यहां मौजूद लोगों में कोई ऐसा शातिर नहीं दिखता बल्कि मुझे तो लगता है, ज्यादातर एक-दूसरे से सहमे हुए लोग हैं। एक-दूसरे पर शक करते हुए। एक-दूसरे से चौंकन्ने।
दीवार की तरफ कुर्सियों पर बैठे, सिर तक कंबलों में ढके दो लोगों में एक ने कंबल से बाहर अपना चेहरा निकाला। उसके चेहरे पर भरपूर नींद की खुमारी है। उसने आंखें मिचमिचाकर गर्दन इधर -उधर घुमाई और झटके से उठ खड़ा हुआ। उसके उठने से कुर्सी चरमराई और उसके बगलवाले ने भी आंखें खोल दीं। वह शायद नींद में नहीं था। आंखें बंद किए शायद नींद का नाटक कर रहा था। उसने खड़े व्यक्ति की तरफ देखा। मुझे लगा, शायद वह उससे कुछ बतियाना चाहता है। इससे पहले कि वह कोई पहल करे, खड़ा व्यक्ति अपना कंबल फैलाकर झाड़ने लगा। कंबल झाड़ने की आवाज कमरे में भर गई। मुझे उसकी यह हरकत हालांकि अच्छी नहीं लगी, लेकिन मैने खुद को जज्ब कर लिया। मेरी कतार में बैठे बुजुर्ग भी असहज हो आए थे। लग रहा था, वह फट पड़ेंगे। लेकिन नहीं। ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्होंने जेब से रूमाल निकालकर नाक पर रख लिया था।
ठीक इसी वक्त अंदर का दरवाजा खुला। अंदर गया शख्स मय अटैची कमरे में विजयी भाव से नमूदार हुआ। मैं एक पल भी गंवाए बगैर झट से उठा। अटैची अपनी कुर्सी पर रखी और लपककर अंदर चला गया। अपनी कुर्सी से बाथरूम तक का यह सफर बेहद रोचक, रोमांचक और सुकूनदेह लगा। लगा कि जैसे राहत की यह राह फिलहाल वरदान है।
बाथरूम में ब्रश करते हुए आभास हुआ कि प्रतीक्षालय का बाहरी दरवाजा खुला है और कोई अंदर दाखिल हुआ है। मैंने घड़ी देखी छह बजने में पांच मिनट बाकी थे। हो सकता है, बाहर उजास हो गई हो और किसी ट्रेन के आने का समय हो चुका हो, इसलिए कोई स्थानीय यात्राी आया हो। हो सकता है, धीरे-धीरे भी लोग आएं। लोगों का आना शुरू होने से हलचल बढ़ेगी। वीरानगी और बेगानगी के टूटने की कल्पना से मै गुदगुदी से भर गया। भीतर ठिठकी पड़ी चुहल सिर उठाने लगी। मैंने एक अव्यक्त गुनगुनाहट के बीच जल्दी-जल्दी ब्रश किया। मुंह धोया ओर पिछली जेब से कंघी निकालकर बालों को संवारा। एक तरह से फुर्ती के साथ ताजगी भी लौट आई थी।
मैं बाथरूम से निकलकर कमरे में आया तो एकबारगी कई तब्दीलियां देखकर दंग रह गया। खर्राटे भरता हुआ शख्स, जो मुझसे पहले बाथरूम से निकला था, अब जा चुका था। कंबल झाड़ता हुआ व्यक्ति अपनी सीट पर मुस्तैदी से जमा हुआ था। उसके बगलवाला व्यक्ति फर्श पर बैठकर अपनी अटैची में कंबल जमा रहा था। बीचवाली टेबुल पर लेटा आदमी उठकर बैठ गया था और सबसे दिलचस्प नजारा यह था कि कमरे में अभी-अभी जो आया था, वह एक महिला थी। उसके साथ बमुश्किल पांच साल का एक बच्चा भी था। महिला जवान थी। सुंदर थी। किसी उच्च मध्यवर्गीय परिवार की लगती थी। उसने खूबसूरत लांग कोट पहन रखा था। सिर पर लाल रंग का स्कार्फ बांधे हुए थी। स्कार्फ के पीछे उसके कटे बाल करीने से झूल रहे थे। उसका चेहरा सुर्ख था। होंठ पतले, नर्म और
फड़कते हुए। पता नहीं, बाहर की ठंड का असर था या कि उसके होंठ ही ऐसे थे, मुझे लगा कि वह चुप्पी के बीच कुछ बुदबुदा रही है । उसके साथ जो बच्चा था, वह इस कदर गदबदा और गुलगुला था कि अनायास ही प्यार उमड़ आए, ऊपर से नीचे तक स्वेटर-सूट में कसा यह बालक उस महिला के साथ सटकर सहमा-सा खड़ा था।
महिला मेरी कतार में बुजुर्ग के बगलवाली कुर्सी पर बैठी हुई थी। इस तरह मेरी सीट और उस महिला के बीच एक कुर्सी का फासला रह गया था। मैंने थोड़ी राहत महसूस की। वह ठीक मेरे बगलवाली कुर्सी पर होती तो शायद मैं वहां बैठने में संकोच महसूस करता या हो सकता था, मैं बैठता ही नहीं। यह स्थिति मेरे लिए थोड़ी सहूलियत भरी थी। मैं अपनी अटैची उठाकर अपनी सीट पर बैठ गया। बच्चा जो महिला के साथ खड़ा था, मुझे सीट पर बैठते हुए कौतूहल भरी आंखों से देखने लगा। मैंने मुस्कराहट के साथ बच्चे की आंखों में झांका। बच्चा झेंप गया। उसने अपना चेहरा महिला के कंधे से सटा लिया।महिला के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई। उसने मेरी उपस्थिति को कोई तवज्जों नहीं दी थी, इसलिए यह अंदाज लगाना मुश्किल था कि उस महिला के चेहरे पर इस वक्त क्या भाव हैं। वह अपनी सीध में देख रही थी, लेकिन उसकी आंखों के केन्द्र में क्या है, यह बता पाना कठिन था। एक जबर्दस्त निरपेक्षता और दंभी उपस्थिति का यह अहसास सचमुच आतंककारी था। उस महिला के बगल में बैठे बुजुर्ग अपनी सीट पर सलीके से जम गए थे। यूं उनके चेहरे पर अब से पहले तक काबिज भव्यता पिघल चुकी थी और वह एक तरल पुरुष में तब्दील हो चुके थे। वह देख तो रहे थे बाहरी दरवाजे की ओर ही, लेकिन उनकी वह पहली वाली एकाग्रता टूट चुकी थी। हां, दीवार की ओर लगी कुर्सियों पर बैठे लोग भी अब चाक-चौबंद दिख रहे थे। खूबसूरत जैकेटवाला जवान तो अब तरो-ताजा दिख रहा थाऔर महिला से सटकर खड़े बच्चे की ओर मुस्कराते हुए यूं ताक रहा था जैसे उसे अपने पास आने का आमंत्राण दे रहा हो। और बच्चा था कि अपने आप में सिकुड़ता महिला के शरीर में धंसा जा रहा था। यह एक दिलचस्प नजारा था। एक तरह से उस जवान और बच्चे के बीच संवाद शुरू हो गया था। मुझे लगा कि जल्दी ही दोनो एक-दूसरे के करीब आ जाएंगे और कमरे के भीतर व्याप्त अजनबीयत तार-तार हो जाएगी।
पफर्श पर अपनी अटैची में कंबल जमाता हुआ शख्स अटैची बंद करके उठा और अपनी सीट पर बैठ गया। उसके हाथ में एक किताब थी। सीट पर बैठने के साथ ही उसने किताब खोली और कुछ पन्ने पलटने के बाद किसी खास पृष्ठ पर ठहर गया। संभवतः वह यह किताब पहले से पढ़ रहा था और अब उसने आगे पढ़ना शुरू कर दिया था। मैंने किताब के आवरण पर छपे शीर्षक को पढ़ने की कोशिश की। शीर्षक पढ़ते हुए मैंने मन ही मन दुहराया ‘द स्ट्रेस साइक्लाॅन’। यह किताब अंगेजी में थी। मैंने इस किताब के बारे में सुन रखा था। मनुष्य मन के आवेग, संवेग, तनाव और दबाव पर लिखी इस किताब की कारपोरेट जगत में बड़ी ध्ूम थी। मुझे लगा कि यह किताब पढ़ता हुआ शख्स जरूर किसी मल्टी नेशनल कंपनी में प्रबंध्न से जुड़ा होगा। आमतौर पर ऐसी किताबें इन लोगों के लिए गीता-कुरान की तरह प्रिय होती है। व्यक्तित्व विकास के गुर सिखाती ये किताबे अंततः दूसरों पर हावी हो जाने की कला सिखाती हैं। मेरे मन में इस शख्स के प्रति उत्सुकता जागी। लगा कि यह वह शख्स है, जिससे बात करना एक नए अनुभव से गुजरने जैसा होगा। लेकिन वह शख्स किताब में गहरे जा डूबा था।
बीचवाली टेबुल पर बैठे थुलथुल देहवाले व्यक्ति ने कसकर जम्हाई ली। बच्चा उसकी इस हरकत को उत्सुकता से देखने लगा। वह व्यक्ति बच्चे को अपनी ओर देखता पाकर चुहल भरी मुस्कान के साथ बच्चे को देखने लगा। बच्चा प्रत्युत्तर में मुस्कराया। मुझे हैरत हुई कि बच्चा जैकेटवाले जवान लड़के के बजाय उस थुलथुल देहवाले व्यक्ति में रुची लेने लगा था। जरूर बच्चे को थुलथुल देहवाला व्यक्ति मजेदार लग रहा होगा। उसे देखना बच्चे को कोई तमाशा देखने का सुख दे रहा होगा। मैंने गौर किया कि वह बच्चा अब महिला के जिस्म से थोड़ा अलग हो आया था। उसके शरीर में हरकत होने लगी थी। वह अब सहज ढंग से अपने पैरों पर खड़ा था और मैं निश्चित था कि वह अब किसी भी क्षण कोई अप्रत्याशित हरकत कर सकता है। इससे पहले कि बच्चा अपने मन की कर पाता महिला ने उसे दोनों कंधें से पकड़कर उठाया और मेरे और अपने बीच खाली पड़ी कुर्सी पर बिठा दिया। कुर्सी पर बैठते ही वह रोष में आ गया था। उसने अपने कंधे को झटका देकर महिला के प्रति विरोध भी जताया। लेकिन महिला ने अपनी आंखें तरेरकर बच्चे को ऐसा न करने का संकेत दिया। बच्चे का रोष कम नहीं हुआ और शायद इसी प्रतिक्रिया में उसने फर्श और कुर्सी के बीच हवा में झूल रहे अपने पैरों को जोर-जोर से हिलाना शुरू कर दिया। इस क्रम में अचानक उसका पैर कुर्सी के पेंदे से टकराया और ‘ठक’ की आवाज कमरे में गूंज गई। बच्चे ने जूता पहन रखा था, इसलिए यह एक ठोस आवाज थी और उसकी ध्वनि दमदार थी। लिहाजा बच्चे को खूब मजा आया। उसके चेहरे का रोष तिरोहित हो चुका था और वह अपनी इस नई सपफलता पर मुग्द हो रहा था। हालांकि महिला ने उसकी तरपफ सख्त आंखों से देखा, लेकिन बच्चे पर कोई असर नहीं हुआ, वह मुतबातिर अपने पैरों को हिलाता रहा और जान-बूझकर कोशिश करता कि उसके पांवों की ठोकर से कुर्सी बज उठे। उसकी यह कोशिश अक्सर नाकाम होती, लेकिन जब भी वह कामयाब होता, उसके चेहरे की रौनक बढ़ जाती। आंखें चमक उठतीं और वह पहले से ज्यादा आनंदित हो जाता। बच्चा धीरे -धीरे खुल रहा था। कमरे में मौजूद तमाम लोगों का ध्यान उसकी तरफ केंद्रित हो चुका था।
अचानक बच्चे ने पैरों को हिलाना बंद कर दिया। लगा कि वह इस खेल से ऊब गया है या कि थक गया है। जब तक मैं कुछ समझ पाता वह बड़ी तेजी से उछला और फर्श पर खड़ा हो गया। महिला ने उसी तेजी से बच्चे को कंधे से पकड़ना चाहा, लेकिन बच्चा बगैर परवाह किए एक-एक कदम बढ़ाता बीचवाली टेबुल तक जा पहुंचा। टेबुल की ऊंचाई बच्चे के बराबर थी। बच्चे ने अपने पंजों पर उचककर टेबुल की ऊंचाई को कम करने की कोशिश की, लेकिन वह देर तक पंजों पर खड़ा नहीं रह सका। वह टेबुल के किनारे को पकड़कर कुछ तजबीजने लगा। संभवतः टेबुल पर चढ़ने की तरकीब। मैंने गौर किया कि टेबुल पर बैठा थुलथुल देहवाला व्यक्त् लगातार मुस्कराता हुआ बच्चे की आंखों में झांक रहा है। यकीनन बच्चा भी उसकी आंखों में झांक रहा होगा। आंखों-आंखों में हो रही वह बातचीत अव्यक्त थी, फिर भी मैं महसूस कर रहा था कि वह टेबुल पर चढ़ने के लिए मचल रहा है। टेबुल पर बैठा शख्स उसे सहारा देने के लिए खिसका, लेकिन ठीक इसी वक्त महिला ने तीखे स्वर में टोका, ‘‘आर्ची नो!’’
महिला की आवाज इस कमरे में गूंजनेवाली अब तक की पहली किसी जीवित प्राणी की आवाज थी। एकाएक मुझे जलतरंग बजने का-सा एहसास हुआ, हालांकि उस आवाज में तुर्शी थी और बच्चा सहम भी गया था, लेकिन एक लंबे अंतराल के, अटूट चुप्पी का भंग होना इतना सुखद था कि तत्काल मेरे लिए वह आवाज बहुत प्रीतिकर लगी। बच्चे पर महिला का असर हुआ था। वह टेबुल से थोड़ा पीछे खिसक आया। टेबुल पर बैठा शख्स जो बच्चे पर विजय पा लेने के करीब था, एकदम गच्चा खा गया। उसके चेहरे पर झेंप और अपमान के भाव एक साथ आए-गए। उसके होंठ हिले भी। जब तक वह कुछ कह पाता, बच्चा तेजी से दौड़ता हुआ बाहरी दरवाजे के पास पहुंचा और पल्लों पर दोनों हाथों से इतने जोर की थाप जमाई कि लगा वह अपना गुस्सा उतार रहा है। उसके हाथों की ‘थप-थप’ में एक अजीब लय थी। मन को छूती ऐसी लय कि जी चाहा बच्चे को मनाया जाए, लेकिन बच्चे पर एकटक नजर रखे महिला का ख्याल आते ही इरादा काफूर हो गया।
बच्चा दरवाजे पर धौल जमाने के बाद पलटा और दौड़ता हुआ महिला के पास चला आया। महिला ने उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वह उसकी गिरफ्त से बचकर इतना खुश हुआ कि ‘खिल-खिल’ करता उलटे पांव उसी रौ में दौड़ता हुआ बाहरी दरवाजे के पास दुबारा पहुंच गया। फिर पल्लों पर धल जमाई और महिला के पास लौट आया। बच्चे को अच्छा बहाना मिल गया था। वह इस खेल में रम गया था। महिला भी उसके साथ हो ली थी। उसने अपने पास आते बच्चे को पकड़ लेने का अभिनय शुरू कर दिया था। इस अभिनय को असल समझ मां को धता बताने में कामयाब हो रहा बच्चा खूब खुलकर खिलखिलाने लगा था। कमरे में उसकी किलकारियां खीलों की तरह बिखरने लगी थीं। मैंने कनखियों से देखा, महिला बच्चे के खेल और किलकारी के जवाब में मद्धिम-मद्धिम मुस्कुरा रही थी। उसकी मुस्कुराहट इतनी मोहक थी कि मुझे लगा इस वक्त वह किसी अलभ्य सुख से लबालब दुनिया की सबसे समृद्ध महिला है।
अब तक प्रतीक्षालय के इस कमरे में काफी कुछ घट चुका था। ‘द स्ट्रेस साइक्लाॅन’ नामक अंगेजी किताब पढ़ रहा शख्स किताब बंद कर बच्चे को ताकता हुआ मुस्कुराने लगा था। उसके चेहरे पर जमी उबासी गायब थी और वह तमाम दबावों से मुक्त दिख रहा था। मुझे ख्याल आया कि जो किताब वह पढ़ रहा था, उसकी नसीहतों को बच्चे ने अपनी हरकत से जरूर गड़बड़ा दिया होगा। ऐसे में क्या करेगा वह? हो सकता है, वह जिन्दगी भर एक सफल प्रबंधक न बन पाए। एक रौबदार व्यक्तित्व निर्माण के लिए बचपने से बचना जरूरी होता है और मुझे लगता है, वह शख्स इस बात से नावाकिफ है। जैकेटवाला जवान लड़का बच्चे को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अपने होंठों को गोलकर ‘शी-शी-शी' की आवाजें निकालने लगा था। वह अभी तक अपनी कोशिश में कामयाब नहीं हुआ था, लेकिन इस तरह वह ज्यादा अच्छा लग रहा था और मुझे यकीन है कि वह जवान अपनी कोशिश में जरूर कामयाब होगा। हां, दुखी चेहरेवाले आदमी के चेहरे पर भी गजब का बदलाव दिख रहा था। चेहरे की लकीरें गायब हो चुकी थीं और वह पहले के मुकाबले ज्यादा स्निग्ध दिख रहा था। हालांकि वह मुस्कुरा नहीं रहा था, परंतु वह भीतर ही भीतर ज़रूर आनन्दित हो रहा है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। और वह रेलवे का मुलाजिम जान पड़ता व्यक्ति! वह अब तक सामान्य हो आया था। उसके हाव-भाव से ‘अकड़’ गायब हो चुकी थी, बल्कि वह बच्चे की हरकत पर कुछ-कुछ उछल भी पड़ रहा था। वह इस कदर सतर्क दिख रहा था, कि कहीं बच्चे को दौड़ते-धूपते चोट न लग जाए, इस आशंका से वह ‘हश-हश’ कर उठता। टेबुल पर बैठा शख्स अपना सामान समेटते हुए बच्चे पर बार-बार नजर डाल लेता, क्योंकि उसकी कोशिश यह थी कि वह बच्चे पर कोई खास तवज्जो नहीं दे रहा है। इस बीच मेरी कतार में बैठे बुजुर्ग, जो ठीक महिला की बगल में बैठे थे, महिला के पास दौड़कर आते बच्चे की तरफ लपककर अपना दाहिना हाथ बढ़ाते और बच्चा उनकी पकड़ से सायास बचने की कोशिश करता। कभी-कभी बिदककर बीच रास्ते में ही खड़ा हो जाता। फिर वह पलटकर दरवाजे तक जाता और पल्लों पर धौल जमाकर लौटता।
मैंने घड़ी देखी। सवा
छह बज रहे थे। उठकर दरवाजे के शीशे से बाहर के माहौल का जायजा लेना चाहा। कुछ परछाइयां डोलती-सी दिखीं। प्लेटफार्म पर जाग के आसार दिखने लगे थे। जी चाहा कि चल दूं। चलने का उपक्रम भी करना चाहा, लेकिन पता नहीं भीतर कैसी विवशता घर किए बैठी थी, कि चलने के नाम पर जड़ता ने मुझे जकड़ लिया। अनजान शहर में, अपने गन्तव्य तक पहुंचने के लिए पता ठिकाने की तफतीश जरूरी है। लेकिन यह तफतीश करूं तो किससे? अपने आप में डूबे-खोए, सहमें, सिमटे, शक करते लोगों से?
मेरी जानकारी के मुताबिक यह शहर बहुत छोटा है, बल्कि एक कस्बा ही है, लेकिन हाल ही में जिला मुख्यालय हो जाने से इसकी वक़त बढ़ गई है, लिहाजा इसके क्षेत्रफल और घनत्व में तेजी से वृद्धि हो रही है। इन सबके बावजूद हो सकता है कि मैं अपने मेजबान के यहां बिना किसी परेशानी के पहुंच जाऊं । फिर भी अच्छा होता है कि जहां जाना है, वहां तक पहुंचने की जानकारी पहले ही हासिल कर ली जाए। इससे भटकने की मुंजाइश कम रहती है और खुद भी आदमी सही रास्ते पर होने के प्रति आश्वस्त होता है।
मैंने अजीब बेबसी से कमरे में मौजूद लोगों का एक बार फिर मुआयना किया। सबके सब बच्चे में इस कदर विस्मृत थे कि मुझे लगा, उनके भीतर दबी किलकारियां अब फूटीं कि तब फूटीं। हालांकि यह खामखयाली ही थी, बावजूद इसके, मेरी इच्छा हुई कि मुझे उस अलभ्य अवसर की प्रतीक्षा तक रुकना चाहिए।
-अवधेश प्रीत /8877614421