ahankaar in Hindi Moral Stories by ललिता अय्यर books and stories PDF | अहंकार

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अहंकार

पंकजजी सुबह की सैर से लौटकर घर के आंगन की लान में रखी हुई कुर्सी में जैसे ही बैठे उनकी धर्मपत्नी सुधा ने उनके हाथ में अखबार पकडाया और वहीं दूसरी कुर्सी में बैठ गई। वह भी एक दूसरा अखबार लेकर सरसरी नजरें दौडाने लगी ,लेकिन सारा ध्यान पति के अगले हुक्म की ओर था। थोडी देर बाद पंकजजी ने जैसे ही चश्मा नीचे करके बडे रौब से सुधा की ओर देखा तत्काल वह इशारा समझकर उठी और किचन में जाकर उनके लिए चाय बनाने लगी। उनकी दोनों बहुएँ नाश्ते की तैयारी में लगी हुई थीं। रोज की तरह बहुओं की व्यंगात्मक फुसफुसाहट सुनाई दी “पापाजी की स्पेशल चाय तो मम्मीजी ही बना सकती हैं, हम लोगों के हाथ की कहाँ पसंद आएगी !” उनकी बातें सुनी अनसुनी कर सुधा चाय लेकर पंकजजी के पास आ गई। अखबार से आँखें हटाए बिना वे चाय की चुस्कियों का आनंद लेने लगे। सुधा ने बडे प्यार से जो बनाई थी। लेकिन शब्द तो दूर प्रशंसा के भाव तक उनके चेहरे पर दिखाई नहीं दिए। दाम्पत्य-जीवन के इन पैंतीस सालों में सुधा को उनके इस रूखे स्वभाव की आदत सी हो गई थी। वह तो बस चुपचाप सुबह से रात तक उनकी हर जरुरत का ध्यान रखती थी और उनके मन को ठेस पहुँचाने वाली कोई भी बात उनतक पहुँचने नहीं देती थी। उनके मान-सम्मान में कोई आंच नहीं आए इसका पूरा ख्याल रखती थी।
पंकजजी हाल ही में शासकीय सेवा के एक उच्च अधिकारी के पद से रिटायर हुए थे। जब तक वे सेवा में रहे उनकी पहचान एक कुशल, कठोर और अनुशासनप्रिय अधिकारी के रूप में रही। उनका काफी दबदबा था। उनके वरिष्ठ भी उनका मान करते थे। लेकिन अपने मातहतों के प्रति वे बडे सख्त थे और उनसे डाँट- डपट और रौब जमाकर काम लेने में विश्वास करते थे। यही रवैया उनका अपने परिवार के प्रति भी था। सुधा ने तो उनके तेज स्वभाव को प्रेम के वशीभूत होकर अपना लिया था। वह तो इस बात में गर्व महसूस करती थी कि वह एक उच्च अधिकारी की पत्नी है और इस नाते सभ्रांत लोगों के बीच उठना-बैठना और मिलना-जुलना होता था। लेकिन उनके दोनों बेटों के मन में बचपन से ही पिता की डाँट-डपट और उनके कठोर स्वभाव की वजह से डर समाया हुआ था। वे तो अपने पापा से बात करने में भी कतराते थे। इकलौती बेटी के प्रति उनका रुख नरम होने से वह सहज थी।
सुधा ने अपनी लगन और सूझबूझ से अपने लाडले बेटों आशीष और अथर्व पर पिता के खौफ और तनाव को हावी नहीं होने दिया और पढाई की ओर पूरा ध्यान लगाने में बेटों के साथ दिन रात लगी रही। माँ के प्रोत्साहन से आशीष और अथर्व भी निरंतर उन्नति की ओर बढते रहे। लेकिन बेटों की कामयाबी का सेहरा तो पंकजजी ने अपने सिर पर ही बांधा। जब आशीष ने आई.आई.टी में और अथर्व ने मेडिकल क्षेत्र में अपूर्व सफलता हासिल की तो दोनों ही समय बधाई देने वालों का तांता-सा लग गया था। पंकजजी ने सबके सामने बडे गर्व से कहा “ यह सब मेरी सख्ती और अनुशासन का ही नतीजा है, वरना माँ के लाड-प्यार में तो बेटे बिगड ही गए होते !” सुधा के दिल में पति के अहंकारपूर्ण कटाक्ष तीर की तरह चुभे किन्तु वह चुपचाप मुस्कराकर रह गई।
सुधा ने घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी और चिंताओं से हमेशा पंकजजी को दूर रखा और स्वयं सारा दायित्व निभाती रही। निश्चिंत होकर पंकजजी सरकारी काम से छः महीने जर्मनी में रहकर आए। इसका फायदा उन्हें तरक्की में भी मिला। लेकिन अपने सम्मान में आयोजित समारोह में पंकजजी ने अपनी छाती ठोकते हुए कहा “ यह सब मेरी सूझबूझ के कारण ही हो सका ,मैंने अपने काम और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बनाकर रखा और परिवार को कोई परेशानी नहीं होने दी “। सुधा मन मसोस कर रह गई, काश! एक बार तो कह देते यह सब पत्नी के सहयोग से ही संभव हो सका।
सुधा ने अपनी इकलौती बेटी रितु के लालन-पालन, पढाई-लिखाई में भी कोई कसर नहीं रखी। माँ के प्रोत्साहन से रितु आई. आई. एम. से सफल होकर एक प्रतिष्ठित मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी पा गई। सुधा के ही प्रयास से उसी कंपनी में कार्यरत होनहार युवक प्रतीक से रितु का रिश्ता तय हो गया और पंकजजी ने बेटी की शादी बडी धूमधाम से की। सारे नाते, रिश्तेदारों ने सुधा और पंकजजी को सुयोग्य दामाद पाने के लिए बहुत-बहुत बधाईयाँ दी। पंकजजी भी कहाँ चूकने वाले थे बोले “ बेटी किसकी है ! मैंने उसकी परवरिश में कोई कमी नहीं रखी ,अच्छे संस्कार दिए हैं। अच्छा वर तो मिलना ही था “। पंकजजी की नज़र में तो जैसे बच्चों की परवरिश में सुधा के त्याग और मेहनत की कोई कीमत ही नहीं थी। सुधा पति के दंभ और अहं को कड़वे घूंट की तरह चुपचाप पी गई।
पंकजजी के सारे रौब और ठाठ-बाटों पर आखिर ब्रेक लग ही गया। उनके रिटायरमेंट का दिन भी आ ही गया। इस सच्चाई को तो जैसे तैसे उन्होंने झेल लिया, लेकिन घर के लोगों के प्रति उनके तेवर लेशमात्र भी नहीं बदले। उन्हें इस बात का गुमान था कि रिटायर हो गए तो क्या घर में तो उनका दबदबा अभी भी बरकरार है। बेचारी सुधा तो उनके अहं को साधे रही। बेटे-बहू अब उनसे कहाँ दबने वाले थे। वे पंकजजी से कुछ कहते उसके पहले ही सुधा उन्हें रोक देती। बेटे नाराज होते “पापा ने बहुत ठाट कर लिए, अब तो घर के कामकाज में हाथ बंटाने दो, कब तक तुम ही सब करती रहोगी माँ ” सुधा मुस्कराकर बेटों को चुप कर देती। बहुओं के कटाक्षों को भी बडे धैर्य से सह लेती। लेकिन घर के बदले माहौल की भनक भी पंकजजी को लगने नहीं दी। पंकजजी भी मन ही मन बडे प्रसन्न थे कि घरवालों पर रौब बना हुआ है। उन्हें क्या मालूम यह सब सुधा की सूझबूझ का नतीजा है। उनकी मान-प्रतिष्ठा तो सुधा ने संभालकर रखी है।
उस रात सुधा कुछ जल्दी ही बिस्तर पर आकर लेट गई। पंकजजी के लिए दूध का गिलास भी रखना भूल गई थी। उसे असहनीय शारीरिक पीडा हो रही थी। फिर भी उसने किसी को कुछ नहीं बताया। वह निश्चल-सी चुपचाप आँखें बंद किए लेटी रही। पंकजजी सोने के लिए कमरे में आए तो सुधा को पहले से ही सोती हुई देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। बिना कुछ बोले वे चुपचाप लेट गए। उन्होंने यह जानने की भी कोशिश नहीं की कि कहीं सुधा की तबियत तो ठीक नहीं है। उनका अहं जो आडे आ रहा था। रोज सुबह सबसे पहले उठने वाली सुधा जब अगले दिन देर तक नहीं उठी तो सबको यह समझते देर नहीं लगी कि वह हमेशा के लिए सबको छोडकर चली गई है।
आशीष और अथर्व को माँ के निधन पर फूट-फूटकर रोते देखकर पंकजजी को पहली बार एहसास हुआ कि बेटों को अपनी माँ से कितना लगाव था और अपने पिता से वे कितने उदासीन थे। वे तो ऐसा बर्ताव कर रहे थे मानो माँ के जाने से वे अनाथ हो गए और पापा तो जैसे उनके लिए पराए थे। सुधा के बिछोह का दर्द और उनके और बेटों के बीच की दूरी ने पंकजजी के मन को गहराई तक कचोट कर रख दिया। कहाँ सुधा हर समय उनकी सेवा –सुश्रुषा में लगी रहती थी कहाँ अब उन्हें हर छोटी जरुरत के लिए भी बहुओं की बाट जोहनी पडती थी। उनके मन को गहरा धक्का तब लगा जब सारे क्रिया-कर्म निपटने और नाते-रिश्तेदारों के जाने के बाद बडी बहू प्रिया ने उन्हें एक लिस्ट थमाकर कहा ‘ पापाजी, ये सामान महेश की दुकान से लेकर आयें और उनकी कुछ पुरानी उधारी बाकी है उसे भी चुका दें ।‘ शायद जीवन में पहली बार उन्हें किसी ने काम का आदेश दिया था। अभी तक तो वे ही दूसरों को आदेश देते रहे हैं। वे सदमे से संभल पाते इतने में ही छोटी बहू नेहा की आवाज आई ‘ पापाजी, आते समय लाँड्री से कपडे भी उठा लाएं ।‘
पंकजजी को लगा जैसे उन्हें किसी ने आसमान से उठाकर नीचे पटक दिया है। उनका सारा अहंकार जैसे चूर-चूर हो गया। अनायास उनकी आँखे फूलमाला से सजी सुधा की तस्वीर पर टिक गई। उन्हें पहली बार अहसास हुआ कि परिवार पर उनका रौब, उनका मान-सम्मान सब सुधा की वजह से ही था। सुधा के त्याग, सेवा और लगन का एक-एक पल उनकी आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूमने लगा। ‘ काश ! मैं जीते-जी उस को समझ पाता ! अहंकार के मद में मैंने उसे हमेशा नीचा दिखाया, उसे वो सम्मान नहीं दिया जिसकी वह हकदार थी। हमेशा मैंने उसे दबाकर रखा। अब मुझे सबसे दबकर रहना होगा ‘ सोचते-सोचते उनकी आँखो से अविरल अश्रुधारा निकलकर गालों पर बहने लगी।

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ललिता अय्यर