Vivek aur 41 Minutes - 17 in Hindi Detective stories by S Bhagyam Sharma books and stories PDF | विवेक और 41 मिनिट - 17

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विवेक और 41 मिनिट - 17

विवेक और 41 मिनिट..........

तमिल लेखक राजेश कुमार

हिन्दी अनुवादक एस. भाग्यम शर्मा

संपादक रितु वर्मा

अध्याय 17

विवेक सदमे में आया |

“पुष्पवासन..........”

“वही............”

“कहाँ से बोल रहे हो............?”

“सॉरी विवेक............! ये सब तुम्हें बताने के लिए मेरे पास समय नहीं है........... अभी मेरे हाथ में एक पिस्टल है | वह पिस्टल जज सुंदर पांडियन के लड़के गोकुलवासन की तरफ है |”

विवेक घबराया |

“ये...... ये........... ये ........ क्यों मारोगे गोकुलवासन को ?”

“पिता के कर्मों का दंड पुत्र को नहीं भुगतना है क्या ? मेरी क़ारूँणया के सिर के अंदर बंदूक की गोली थी ऐसा पेपर में देखा था | उस समय मेरा दिल कैसे तड़पा किसको पता......... मेरे जीवन का नाश करने वाला जज सुंदर पांडियन का आगे के जीवन में कोई वारिस ही नहीं होना चाहिए | गोकुलवासन की डेड बॉडी आपको मिले तो उसकी खोपड़ी में दो बंदूक की गोलियां होनी चाहिए |”

“अरे............ अरे.............”

“क्या है विवेक..... गुस्सा आ रहा है क्या ? मुझे पकड़ना है इसलिए तुम्हें गुस्सा है ? तुम ही नहीं | तुम्हारे पुलिस के सभी लोग मिलकर आएं तो भी मुझे पकड़ नहीं सकते | गोकुलवासन को बचा नहीं सकते | चाहे तो एक शर्त लगाए | अभी समय 10.19 तुम्हें मैं 41 मिनिट का समय देता हूँ | अर्थात 11 बजे तक |

11 बजे तक मैं गोकुलवासन को कुछ नहीं करूंगा | ठीक 11 बजे उसे गोली मार कर मैं अपना चलता बनूँगा | तुमसे बने तो तुम गोकुलवासन को बचा लो | चाहे तो तुमको दो क्लू बताता हूँ | गोकुलवासन के गाड़ी के अंदर ही मैं हूँ | वह ड्राइविंग सीट पर और मैं पीछे की सीट पर | कार जो है मद्रास के सिटी के अंदर है | किसी रोड के किनारे ही खड़ी है | हो सके तो बचा लो |”

दूसरी तरफ से सेल को उसने बंद कर दिया | तो विवेक स्तब्ध हो खड़ा रहा |

***