प्रेम न हाट बिकाय

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कुहासों की गलियों में से गुज़रते हुए जीवन की गठरी न जाने कितनी बार नीचे गिरी, कितनी बार खुली, कितनी बार बिखरी और समेटी गई लेकिन गठरी की गाँठ बड़ी कमज़ोर रही फिर चिंदी बनकर उड़ने से उसमें भरी स्मृतियों को उड़ने से कोई नहीं रोक पाया | उसे लगता है सबके जीवन की गठरी कुछ ऐसी ही होती है, कुछ ऐसा ही अनुभव पसारती, समेटती, बटोरती है | वह अनोखी नहीं ! हाँ ! किसी की गठरी बड़ी, तो किसी की छोटी ! किसी की पूरी तरह से सिमटी हुई तो किसी की बिखर जाने के बाद सिमटती ही नहीं | क्या कर लेगा इंसान ? अपने सिर पर धरी गठरी संभालते हुए पूरी ज़िंदगी गुज़ार देता है वह ! गुज़ार क्या देता है गुज़ारनी पड़ती है |

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 1

======== 1- कुहासों की गलियों में से गुज़रते हुए जीवन की गठरी जाने कितनी बार नीचे गिरी, कितनी बार खुली, कितनी बार बिखरी और समेटी गई लेकिन गठरी की गाँठ बड़ी कमज़ोर रही फिर चिंदी बनकर उड़ने से उसमें भरी स्मृतियों को उड़ने से कोई नहीं रोक पाया | उसे लगता है सबके जीवन की गठरी कुछ ऐसी ही होती है, कुछ ऐसा ही अनुभव पसारती, समेटती, बटोरती है | वह अनोखी नहीं ! हाँ ! किसी की गठरी बड़ी, तो किसी की छोटी ! किसी की पूरी तरह से सिमटी हुई ...Read More

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 2

2---- आज विवेक का जन्मदिवस था और अकेली बैठी वह गुज़रे रास्तों की धूल फाँक थी, आँसुओं की लड़ियाँ मोतियों सी उसके गालों पर फिसल रही थीं | एक समय ऐसा होता है जब सब अपने कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं और पीछे छुटी हुई अकेली ज़िंदगी के पास धुंध भरी गहराती गलियों में चक्कर काटने के अलावा कोई चारा नहीं रहता |एकाकीपन कुछ ऐसे चुभने लगता है जैसे कोई बहुत बारीक काँच जो हाथ से छूट जाता है और उसकी किरचें शरीर से अधिक मन की दीवार में भीतर और भीतर जाकर चुभती ...Read More

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 3

3-- गुज़रे पल किसकी मुट्ठी में कैद रह सकते हैं ?जब समय अवसर देता है मन का ढीठपन उस अवसर को भुनाने में आनाकानी करता है, समय बीत जाने पर हम हाथ मलते रह जाते हैं | खूबसूरत अहसासों की संवेदना से घिरा मन (अनामिका )आना को अपने बालपन में खींचकर ले जाता, आँसू से लबरेज़ कर देता उसे ! कहाँ, कैसे बालपन व किशोरावस्था के दिनों को समेट ले ! उन दिनों तो मन के भीतर से एक आक्रोशित भावना पनपती रहती और खीज आती माँ-पापा पर !'क्यों हर समय अपने उपदेश थोपते रहते ...Read More

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 4

4-- अहमदाबाद में जहाँ अनामिका का घर था, उसकी थोड़ी दूरी पर ही दूसरे ब्लॉक ही तो गढ़वाली पूर्णिमा भाभी रहतीं थीं | उनके पास एक बेटा और एक बेटी थे, दोनों में मुश्किल से डेढ़ साल का फ़र्क ! भाभी का जब मन होता या उन्हें किसी काम से बाहर जाना होता, अनामिका के पास बच्चों को छोड़ जातीं | उनकी सास भी उनके ही साथ रहती थीं और भाईसाहब, यानि उनके पति विवेक की तरह ही टूर पर रहते | सो, दोनों सरल परिवारों में खूब जमने लगी जिससे आस-पास के लोगों की ...Read More

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 5

5 -- अब जब बच्चे अपनी-अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहने लगे तब गृहस्थी में व्यस्त आना पलकों ने झपकी ली | बच्चों के स्कूल जाने के बाद उसे अपना खाली रहना अखरने लगा |कोई खोया हुआ सा सपना उसकी आँखों में फिर से भर आया | कपड़ों की अलमारी व्यवस्थित करती तो लगता यहाँ तो पुस्तकें रखनी थीं फिर कपड़े क्यों ? बच्चों की पुस्तकें खोलकर बैठती तो लगता, कुछ भी नहीं आता उसे, फिर से बच्चों के साथ पढ़ना शुरू कर देना चाहिए | सब ओर पुस्तकें ही पुस्तकें दिखाई देतीं | बच्चों के स्कूल ...Read More

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 6

6- गीता सिंह ने कुछ चमचियों को इक्क्ठा करके अपना एक ग्रुप बनाया हुआ जिसमें उनकी हमउम्र सहेलियाँ थीं जो उनकी जैसी ही मानसिकता को ओढ़-बिछाकर अपने शिक्षित होने का ठप्पा भी क्या--- अपने गलों में बोर्ड लटकाए घूमती रहती थीं | " तुमसे ही बात कर रही हूँ, बच्चों के स्कूल जाने के बाद कौनसे धंधे में बिज़ी रहती हो?" अनामिका के माथे पर बल पड़ गए—धंधा ! इस औरत को बात करने का सलीका नहीं है, वह जानती थी लेकिन इतनी बदतमीज़ !आना का दिमाग ठनक गया लेकिन उसने सोचा ऐसे इंसान ...Read More

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 7

7 --- बीस वर्ष की थी जब विवाह हुआ था अनामिका का | एक साल में दृष्टांत, उसके लगभग डेढ़ साल बाद बिटिया दृष्टि का जन्म हो गया |लीजिए, हो गई गृहस्थी भी पूरी ! छुटकी यानि दृष्टि के जन्म के समय जब सबसे बड़ी व सबसे छोटी नन्द भाभी की डिलीवरी पर आईं, छोटी ने तो हँसते-हँसते कह भी दिया था ; “भाभी जी, हमारी चचिया सास कह रही थीं कि बड़ी लिखी-पढ़ी और पढ़े-लिखे परिवार की हैं तुम्हारी भाभी ---फिर हर साल कलैंडर क्यों छाप रही हैं ?” वह खिसिया गई थी, ...Read More