प्रेम न हाट बिकाय

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कुहासों की गलियों में से गुज़रते हुए जीवन की गठरी न जाने कितनी बार नीचे गिरी, कितनी बार खुली, कितनी बार बिखरी और समेटी गई लेकिन गठरी की गाँठ बड़ी कमज़ोर रही फिर चिंदी बनकर उड़ने से उसमें भरी स्मृतियों को उड़ने से कोई नहीं रोक पाया | उसे लगता है सबके जीवन की गठरी कुछ ऐसी ही होती है, कुछ ऐसा ही अनुभव पसारती, समेटती, बटोरती है | वह अनोखी नहीं ! हाँ ! किसी की गठरी बड़ी, तो किसी की छोटी ! किसी की पूरी तरह से सिमटी हुई तो किसी की बिखर जाने के बाद सिमटती ही नहीं | क्या कर लेगा इंसान ? अपने सिर पर धरी गठरी संभालते हुए पूरी ज़िंदगी गुज़ार देता है वह ! गुज़ार क्या देता है गुज़ारनी पड़ती है |

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 1

======== 1- कुहासों की गलियों में से गुज़रते हुए जीवन की गठरी जाने कितनी बार नीचे गिरी, कितनी बार खुली, कितनी बार बिखरी और समेटी गई लेकिन गठरी की गाँठ बड़ी कमज़ोर रही फिर चिंदी बनकर उड़ने से उसमें भरी स्मृतियों को उड़ने से कोई नहीं रोक पाया | उसे लगता है सबके जीवन की गठरी कुछ ऐसी ही होती है, कुछ ऐसा ही अनुभव पसारती, समेटती, बटोरती है | वह अनोखी नहीं ! हाँ ! किसी की गठरी बड़ी, तो किसी की छोटी ! किसी की पूरी तरह से सिमटी हुई ...Read More