रूहों का सौदा क्या जीत केवल तलवार से होती है? जब मर्यादा की दीवारें ढहने लगीं और क्रोध ने विवेक का गला घोंट दिया, तब रुद्र ने उठाया एक ऐसा कदम जिसने सबको स्तब्ध कर दिया। लेकिन इस शांति के पीछे एक भयानक तूफान छिपा था। एक रहस्यमयी परछाईं और एक खौफनाक चेतावनी— 'महागुरु ही तुम्हारे विनाश का द्वार हैं!' क्या रुद्र अपने रक्षक पर भरोसा कर पाएगा? क्या 'रक्त-शिला' के जागने का अर्थ पूरे गुरुकुल का अंत है?"अध्याय 1 रुद्र का समर्पण और क्रोध का शमनतलवारों की खनखनाहट और लौरा की चीखें पूरे गलियारे में गूँज रही थीं।
रूहों का सौदा - 1
रूहों का सौदाक्या जीत केवल तलवार से होती है? जब मर्यादा की दीवारें ढहने लगीं और क्रोध ने विवेक गला घोंट दिया, तब रुद्र ने उठाया एक ऐसा कदम जिसने सबको स्तब्ध कर दिया। लेकिन इस शांति के पीछे एक भयानक तूफान छिपा था। एक रहस्यमयी परछाईं और एक खौफनाक चेतावनी— 'महागुरु ही तुम्हारे विनाश का द्वार हैं!' क्या रुद्र अपने रक्षक पर भरोसा कर पाएगा? क्या 'रक्त-शिला' के जागने का अर्थ पूरे गुरुकुल का अंत है? अध्याय 1 रुद्र का समर्पण और क्रोध का शमनतलवारों की खनखनाहट और लौरा की चीखें पूरे गलियारे में गूँज रही थीं। लौरा के ...Read More
रूहों का सौदा - 2
नियति का रक्त-अभिषेक और महाप्रस्थानकहते हैं कि विनाश से ठीक पहले की खामोशी सबसे डरावनी होती है, लेकिन गुरुकुल उस रात खामोशी ने आवाज़ दी थी। दीवार पर उभरी वह काली और रहस्यमयी आकृति जब धुंध में विलीन हुई, तो वह अकेले नहीं गई; वह अपने पीछे एक ऐसा ठंडा अहसास छोड़ गई जैसे मौत ने कमरे में कदम रख दिया हो। रुद्र के हाथ की नीली लकीरें अब महज़ निशान नहीं थे, वे उसकी त्वचा के नीचे किसी कैद नाग की तरह छटपटा रहे थे।दीवार पर उभरी वह काली और रहस्यमयी आकृति धीरे-धीरे धुंध में विलीन होने लगी, ...Read More
रूहों का सौदा - 3
दूसरी ओर... गुरुकुल का श्मशान सा सन्नाटागुरुकुल के भीतर, तबाही के निशान और भी गहरे थे। आचार्य विक्रम और वसुंधरा मलबे के बीच खड़े उन शिष्यों को देख रहे थे जिन्होंने वीरता से लड़ते हुए अपने प्राण त्याग दिए थे। पूरे परिसर में मंत्रों की गूँज की जगह अब सिसकियों ने ले ली थी। महागुरु, जो हमेशा अडिग रहते थे, आज उस मुख्य द्वार की चौखट पर ऐसे बैठे थे जैसे कोई पुराना किला ढह गया हो।खंडहरों का न्याय और पुराना हिसाब"रुद्र ने कांपते हाथों से उस ताबीज को उठाया, जिसकी धातु रात की ओस में और भी ठंडी ...Read More
रूहों का सौदा - 4
'विशाल गुरुकुल' का सबसे ऊँचा शिखर, जिसे 'ब्रह्म-कक्ष' कहा जाता था, आज किसी श्मशान जैसी शांति ओढ़े हुए था। सर्द हवाएँ दीवारों से टकराकर कराह रही थीं, लेकिन कक्ष के भीतर का वातावरण उससे भी कहीं अधिक ठंडा और तनावपूर्ण था।कक्ष के केंद्र में ऊँचे आसन पर महागुरु विराजमान थे। उनकी श्वेत जटाएँ कंधे तक बिखरी थीं और माथे पर खिंची तीन रेखाएँ—जिन्हें आमतौर पर ज्ञान का प्रतीक माना जाता था—आज चिंता की गहरी खाइयों में बदल चुकी थीं। उनके सामने गुरुकुल के चार प्रमुख आचार्य, जो स्वयं शस्त्र और शास्त्र के प्रकांड विद्वान थे, अपराधी की भांति सिर ...Read More