मैं दादा-दादी की लाड़ली

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मैं अपने बचपन में दादा-दादी की लाड़ली थी।उनकी आँखों का नूर, उनके आँगन की सबसे प्यारी हँसी।घर में अगर कोई सबसे पहले मेरी ओर देखता था,तो वे दादा-दादी ही होते थे।उनके लिए मैं केवल उनकी पोती नहीं थी,बल्कि उनके दिन की शुरुआतऔर शाम का सुकून भी थी।मुझे आज भी याद है,जब मैं छोटी-छोटी बातों पर रो दिया करती थी,तो दादा मुझे अपने कंधों पर बिठा लेते थेऔर दादी अपने दुपट्टे सेमेरे आँसू पोंछ दिया करती थीं।उन दोनों के साथ रहते हुएकभी यह एहसास ही नहीं हुआकि ज़िंदगी में किसी चीज़ की कमी भी हो सकती है।

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मैं दादा-दादी की लाड़ली - 1

मैं अपने बचपन में दादा-दादी की लाड़ली थी।उनकी आँखों का नूर, उनके आँगन की सबसे प्यारी हँसी।घर में अगर सबसे पहले मेरी ओर देखता था,तो वे दादा-दादी ही होते थे।उनके लिए मैं केवल उनकी पोती नहीं थी,बल्कि उनके दिन की शुरुआतऔर शाम का सुकून भी थी।मुझे आज भी याद है,जब मैं छोटी-छोटी बातों पर रो दिया करती थी,तो दादा मुझे अपने कंधों पर बिठा लेते थेऔर दादी अपने दुपट्टे सेमेरे आँसू पोंछ दिया करती थीं।उन दोनों के साथ रहते हुएकभी यह एहसास ही नहीं हुआकि ज़िंदगी में किसी चीज़ की कमी भी हो सकती है।मैं छोटी थी,पर बहुत ज़िद्दी ...Read More

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मैं दादा-दादी की लाड़ली - 2

यह कहानी “मैं दादा-दादी की लाडली” का दूसरा भाग है।बचपन की मासूमियत के बाद, अब ज़िंदगी ने मुझेपहली बार प्यार से मिलवाया।एक ऐसा एहसास, जो मिला नहीं…पर दिल में हमेशा के लिए बस गया।अध्याय 2 – अधूरा प्यार।तुम्हें लाइफ में कैसा पार्टनर चाहिए?”सब अपनी पसंद बताती, हँसी-मजाक के साथ, और मैं चुप-चाप उनकी बातें सुनती।फिर मेरी बारी आई।मैने कहा,"मुझे ऐसा पार्टनर चाहिए जो मुझे पूरा तरह प्यार करे, सोलमेट टाइप।और मैं उसके लिए पूरी दुनिया लूट दूंगी।”पर जिंदगी का खेल कुछ और था।मेरा प्यार मिला... पर अधूरा।सिर्फ एक तरफ़ा प्यार, जो मेरे दिल के कोने में छुप गया।हर दिन ...Read More