मेरी हो तुम

(0)
  • 45
  • 0
  • 51

पैहरगढ़ में कई दिनों बाद फिर से रौनक लौट आई थी। मंदिर की घंटियाँ, घरों में दीपक, और हर चेहरे पर सुकून था। अदिति छत पर खड़ी चाँद को देख रही थी। हवा में अजीब-सी हलचल थी… जैसे कुछ अनकहा पुकार रहा हो। तभी विवेक पीछे से आता है। “क्या सोच रही हो?” अदिति हल्की मुस्कान के साथ कहती है— “पता नहीं क्यों… सब ठीक होने के बाद भी मन शांत नहीं है।”

1

मेरी हो तुम - 1

पैहरगढ़ में कई दिनों बाद फिर से रौनक लौट आई थी।मंदिर की घंटियाँ, घरों में दीपक, और हर चेहरे सुकून था।अदिति छत पर खड़ी चाँद को देख रही थी।हवा में अजीब-सी हलचल थी… जैसे कुछ अनकहा पुकार रहा हो।तभी विवेक पीछे से आता है।“क्या सोच रही हो?”अदिति हल्की मुस्कान के साथ कहती है—“पता नहीं क्यों… सब ठीक होने के बाद भी मन शांत नहीं है।”उसी पल दूर जंगलों की ओर से काली ऊर्जा की एक लहर उठती है।पेड़ झुक जाते हैं… पक्षी उड़ जाते हैं।वहीं दूसरी ओर—अंधकार में डूबा एक विशाल कक्ष।आग जैसी आँखों वाला वह रहस्यमयी साया ज़मीन ...Read More