इस घर में प्यार मना है

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इस घर में प्यार मना है… क्योंकि यहाँ प्यार ने कभी किसी को पूरा नहीं छोड़ा। या शायद… क्योंकि इस घर का मालिक प्यार से नफरत करता है। अध्याय 1— एक अनचाही शादी “संस्कृति… तैयार हो जाओ।” माँ की आवाज़ कानों में पड़ी, लेकिन संस्कृति का ध्यान आईने में दिख रही अपनी ही परछाईं पर अटका था। लाल जोड़ा, भारी गहने और आँखों में वो डर… जो किसी दुल्हन का नहीं होता। आज उसकी शादी थी। कार्तिक रघुवंशी से। एक ऐसा नाम… जिसे सुनते ही पूरे शहर में खामोशी छा जाती थी। संस्कृति ने धीरे से खुद से पूछा— “क्या शा

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इस घर में प्यार मना है - 1

इस घर में प्यार मना है…क्योंकि यहाँ प्यार ने कभी किसी को पूरा नहीं छोड़ा।या शायद…क्योंकि इस घर का प्यार से नफरत करता है।अध्याय 1— एक अनचाही शादी“संस्कृति… तैयार हो जाओ।”माँ की आवाज़ कानों में पड़ी, लेकिन संस्कृति का ध्यान आईने में दिख रही अपनी ही परछाईं पर अटका था। लाल जोड़ा, भारी गहने और आँखों में वो डर… जो किसी दुल्हन का नहीं होता।आज उसकी शादी थी। कार्तिक रघुवंशी से।एक ऐसा नाम… जिसे सुनते ही पूरे शहर में खामोशी छा जाती थी।संस्कृति ने धीरे से खुद से पूछा—“क्या शादी के बाद ज़िंदगी शुरू होती है… या यहीं खत्म ...Read More

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इस घर में प्यार मना है - 2

कमरे में सन्नाटा था।इतना गहरा… कि संस्कृति की सिसकियाँ भी उसे तोड़ नहीं पा रही थीं।वो वहीं बैठी रही। की तरह सजी… लेकिन किसी बेवा से भी ज़्यादा अकेली।धीरे-धीरे उसने फाइल अपने हाथ से नीचे रख दी। जैसे उसमें लिखा हर शब्द उसके दिल पर किसी ने नुकीले पत्थर से उकेर दिया हो।संस्कृति (खुद से, टूटती आवाज़ में) बोली -“तो यही है… शादी?”उसने कंगन उतार दिए। एक-एक करके। गहने उतार कर इधर उधर फेंक दिए। हर खनक के साथ उसकी उम्मीद टूटती गई।आईने में खुद को देखा—लाल जोड़ा अब बोझ लग रहा था। सिंदूर… जैसे किसी और की कहानी ...Read More

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इस घर में प्यार मना है - 3

संस्कृति अब वर्क फ्रॉम होम में नहीं… बल्कि नियमों के बीच काम करने लगी थी। अकेलापन अब सिर्फ़ घर सीमित नहीं था। वो उसके साथ ऑफिस तक चला जाता।सुबह-सुबह सास की आवाज़ उसके कानों में गूँजती रहती।सास (सख्त लहजे में) बोली -ऑफिस जाना है तो ये बात दिमाग़ में रखना—संस्कृति चुपचाप साड़ी की पल्लू ठीक करती।सास बोली -साड़ी पहनकर जाना।ज्यादा मेकअप नहीं।लिपस्टिक हल्की।बाल खुले नहीं रहने चाहिए।संस्कृति ने सिर हिला दिया।सास बोली -किसी से ज़्यादा बात नहीं करोगी। खासतौर पर मर्दों से।एक और नियम।सास बोली -हँसना नहीं है। ऑफिस घूमने की जगह नहीं है।संस्कृति का दिल और सिकुड़ गया।लेकिन ...Read More

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इस घर में प्यार मना है - 4

घर में शाम का सन्नाटा था। कमरे की खिड़की से हल्की धूप अंदर आ रही थी। लेकिन कमरे में कार्तिक उस हल्की रोशनी के बीच भी पूरी तरह खोया हुआ लगता था।वो थका हुआ था… और मानसिक रूप से पूरी तरह खाली।उसका दिमाग ब्लैंक था। सिर्फ दीवार को घूर रहा था,जैसे दुनिया में कुछ भी न हो।संस्कृति खिड़की से बाहर झांक रही थी। उसके मन में एक ख्याल आया—संस्कृति (मन में) बोली -अगर मैं इस घर को फिर से पहले जैसा बनाना चाहती हूँ…तो पहले घर के बड़े बेटे को अपने वश में करना होगा।पर कैसे?वो कुछ पल के ...Read More

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इस घर में प्यार मना है - 5

शादी को कुछ ही दिन बीते थे।संस्कृति अब भी उस घर को समझने की कोशिश में थी—कि कब, कैसे ठीक होगा।लेकिन उस दिन उसके शरीर ने उसे धोखा नहीं दिया… समाज ने दिया।सुबह-सुबह संस्कृति को दर्द महसूस हुआ।वो समझ गई—पीरियड्स हो गए।उसने चुपचाप अपना काम निपटाने की कोशिश की, लेकिन बातसास तक पहुँच गई।सास की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी—राम-राम-राम!गंदी लड़की!पूरे घर को अशुद्ध कर दिया!संस्कृति सन्न रह गई।सास ने उसका हाथ ज़ोर से पकड़ा और घसीटते हुए घर के पिछले हिस्से की तरफ ले चली।संस्कृति डर गई।संस्कृति बोली -माँजी… मुझे दर्द हो रहा है…।लेकिन कोई नहीं रुका। ...Read More

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इस घर में प्यार मना है - 6

आधी रात हो चुकी थी। पूरा घर गहरी नींद में था।सन्नाटा इतना गहरा कि कार्तिक के कदमों की आहट खुद ही चुभ रही थी। उसके हाथ में एक पुरानी लोहे की रॉड थी। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। वो उसी घर के पीछे की तरफ बढ़ा… जहाँ वो अंधेरा कमरा था।कार्तिक ने चारों ओर देखा। सब सो रहे थे।उसने ताले पर रॉड मारी—कड़क!एक बार। फिर दूसरी बार।क्लिक!ताला टूट गया। दरवाज़ा खुलते ही सीलन और बदबू का झोंका आया। कार्तिक का दिल और बैठ गया।कमरे के कोने में संस्कृति सिकुड़ी हुई पड़ी थी।चेहरा पसीने से भीगा, होंठ नीले पड़ते ...Read More

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इस घर में प्यार मना है - 7

रात…जब पूरा घर नींद के बोझ से खामोश हो जाता—तभी कदमों की आहट धीरे-धीरे उस अंधेरे कमरे की ओर हर रात आता। बिना आवाज़ किए। बिना किसी को बताए। उसके हाथ में हमेशा एक ही चीज़ होती , डार्क चॉकलेट।छोटी-सी। सादी-सी। पर उस कमरे में किसी खजाने से कम नहीं।संस्कृति उसे देखते ही समझ जाती—आज भी वो अकेली नहीं है। कार्तिक धीरे से उसके पास बैठता।फिर उसे अपनी गोद में बिठा लेता।कार्तिक (हल्की मुस्कान के साथ) बोला -धीरे-धीरे खाना…दर्द में मीठा अच्छा लगता है।संस्कृति बच्चों की तरह छोटे-छोटे कौर लेती। कार्तिक को खिलाने की कोशिश करती।पर कार्तिक बोलता -मुझे ...Read More

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इस घर में प्यार मना है - 8

रघुवंशी हवेली में नियम पत्थर की लकीरों जैसे थे—दिखते नहीं थे, पर हर साँस में महसूस होते थे।और अब…वो धीरे-धीरे मिट रही थीं।कार्तिक और संस्कृति दोनों ने मिलकर घर के नियम तोड़ दिए थे।बिना आवाज़। बिना ऐलान। बिना किसी को बताए।इस घर को अब भी लगता था, सब वैसा ही है। पर एक कमरा झूठ बोल रहा था।जैसे ही घर की लाइटें बुझतीं—कार्तिक संस्कृति के और करीब आ जाता।कार्तिक (मुस्कुराकर) बोला -दिन भर कितनी चुप रहती हो…थक नहीं जाती?संस्कृति उसके सीने पर सिर रखकर धीरे से बोलती—आपके पास आकर सब ठीक हो जाता है।कार्तिक उसे बच्चों की तरह चिढ़ाता। ...Read More

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इस घर में प्यार मना है - 9

सुबह की पहली किरण अभी खिड़की तक पहुँची भी नहीं थी—कि नीचे से चीख़ने–चिल्लाने की तेज़ आवाज़ें हवेली में उठीं।संस्कृति अब भी कार्तिक की बाँहों में थी। दोनों गहरी नींद में—जैसे दुनिया से बेपरवाह। अचानक शोर और बढ़ा। संस्कृति हड़बड़ाकर उठी।संस्कृति (घबराकर) बोली -नीचे… क्या हो रहा है?कार्तिक भी चौक गया। उसने घड़ी की तरफ़ देखा, सुबह हो चुकी थी। दोनों जल्दी-जल्दी नीचे पहुँचे।और जो देखा—पूरा घर जैसे कटघरे में खड़ा था।ननद नाइट ड्रेस में घबराई हुई एक कोने में खड़ी थी।ससुर जी गुस्से से काँप रहे थे।देवर आधी नींद में आँखें मलता हुआ।नौकर–नौकरानियाँ सिर झुकाए चुपचाप।और बीच में—सास।बस ...Read More

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इस घर में प्यार मना है - 10

किसी को नहीं पता था—कि संस्कृति सिर्फ इस घर से नहीं, अपनी ही बीमारी से भी लड़ रही थी।संस्कृति हेलुसिनेशन होते थे। और उसके साथ-साथ स्लीप पैरालिसिस।ऐसी बीमारी जिसमें आँखें खुली रहती हैं,दिमाग जागता रहता है—पर शरीर मर चुका-सा हो जाता है।शादी के बाद जब से कार्तिक हर रात उसके पास सोता था तब वो सुरक्षित थी।क्योंकि उसे पता था अगर डर आएगा तो कोई उसे हिला देगा।कोई कहेगा—मैं यहीं हूँ।काली कोठरी में अंधेरा और गहरा हो गया। सीलन की बदबू।दीवारों से टपकती नमी।संस्कृति घुटनों में सिर छुपाकर रोती रही।संस्कृति (सिसकते हुए) बोली -कार्तिक जी…मुझे डर लग रहा है…।लेकिन ...Read More

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इस घर में प्यार मना है - 11

रात…एक बार फिर पूरी हवेली नींद में डूबी हुई थी। पर इस बार कार्तिक नहीं सोया था। उसकी आँखों नींद नहीं फ़ैसला था।जैसे ही सबके कमरों की लाइटें बुझीं—कार्तिक सीधे उस काली कोठरी की ओर गया। उसके हाथ काँप नहीं रहे थे।धड़ाम!एक ही वार में ताला टूट गया।कार्तिक जैसे ही अंदर घुसा—उसका दिल फट पड़ा। संस्कृति ज़मीन से टेक लगाए बैठी थी।मुँह पर टेप चिपका हुआ। आँखें डर से फटी हुई। शरीर थरथरा रहा था।कार्तिक (टूटती आवाज़ में) बोला -संस्कृति…वो भागकर उसके पास पहुँचा। काँपते हाथों से तुरंत उसके मुँह से टेप हटाया। टेप हटते ही संस्कृति एक पल ...Read More

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इस घर में प्यार मना है - 12

आँगन में अब सन्नाटा नहीं था—वहाँ डर जम गया था। कार्तिक अब भी दरवाज़े की तरफ़ भागना चाहता था—कि उसके पिता आगे आए। आवाज़ शांत थी, पर निर्दयी।ससुर बोले -बहुत हो गया, कार्तिक।उन्होंने कार्तिक के हाथ को ज़ोर से पकड़ा—और मोहन की तरफ़ इशारा किया।वो बोले -तुम दोनों—अभी।कार्तिक और उसका छोटा भाई मोहन—दोनों को एक कमरे में धकेल दिया गया।धड़ाम!दरवाज़ा बंद।बाहर से कुंडी चढ़ी—और ताला।अंदर…कमरे में अँधेरा नहीं था—पर घुटन थी।मोहन घबराया हुआ इधर-उधर देख रहा था।मोहन (काँपती आवाज़ में) बोला -भैया…ये क्या हो रहा है?कार्तिक ने पूरी ताक़त से दरवाज़ा पीटना शुरू किया।कार्तिक बोला -दरवाज़ा खोलिए!आपको अंदाज़ा भी ...Read More