वास्तविक चाबी

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वास्तविक चाबीरामपुर की पुरानी हवेली में समय जैसे ठहर गया था। मोटी दीवारें, लकड़ी की नक्काशीदार छतें, आँगन में बरगद का पेड़ और ऊपरी मंजिल पर रखा लोहे का विशाल संदूक—ये सब पिछले पचास सालों से एक ही कहानी दोहरा रहे थे। हवेली के मालिक अवध बिहारी लाल, जिन्हें सब बाबूजी कहते थे, उम्र के साठ पार कर चुके थे, लेकिन उनकी आँखों में अभी भी किशोर जैसी चमक बाकी थी। वे रोज सुबह आँगन में चाय पीते, अखबार पढ़ते और शाम को छत पर बैठकर पुरानी यादों में खो जाते।उस संदूक की चाबी बाबूजी ने पचास साल पहले खो