लोग कहते हैं कि बड़े शहर में आकर गाँव का इंसान बदल जाता है, पर कोई यह नहीं पूछता कि उस शहर की कांच की दीवारों ने एक जीते-जागते इंसान को अंदर से कैसे तोड़ दिया।सच कहूँ तो इस बड़े शहर की ये जो ऊँची-ऊँची कांच की इमारतें हैं ना, ये दूर से देखने में जितनी सुंदर लगती हैं, पास आने पर उतनी ही बेदर्द महसूस होती हैं। जब दोपहर की तेज़ धूप इन कांच की दीवारों पर पड़ती है, तो उसकी चकाचौंध सीधे आँखों में चुभती है, मानो चीख-चीख कर कह रही हो कि 'यह जगह तुम्हारे जैसे छोटे