यजुर्वेद सूक्ति (3) की व्याख्या परिमाग्ने दुश्चरिताद बाधस्व"यजुर्वेद--4/28भावार्थ--हे ईश्वर!आप हमें दुष्ट आचरण से बचाएँ। इसका पूरा मंत्र अर्थ सहितयजुर्वेद (शुक्ल यजुर्वेद) अध्याय 4, मंत्र 28परि माग्ने दुश्चरिताद् बाधस्वा मा सुचरिते भज।उदायुषा स्वायुषोदस्थाममृताननु॥ शब्दार्थ:परि = चारों ओर से, पूर्णतःमा = मुझेअग्ने = हे अग्ने! (यहाँ परम तेजस्वी परमेश्वर के लिए भी प्रयुक्त)दुश्चरितात् = बुरे आचरण सेबाधस्व = दूर करें, हटाएँमा = मुझेसुचरिते = उत्तम आचरण मेंभज = स्थापित करें, लगाएँउद् आयुषा = उत्तम आयु के साथस्वायुषा = श्रेष्ठ जीवन द्वाराउदस्थाम् = मैं प्राप्त होऊँ, ऊपर उठूँअमृतान् अनु = अमृतस्वरूप (मोक्ष अथवा अमर आनन्द को प्राप्त) महापुरुषों के मार्ग का अनुसरण करूँ। सरल भावार्थ:हे परमेश्वर!