यजुर्वेद सूक्ति (2) की व्याख्या "तनूपा अग्निःपातु दुरितादलद्यात"यजुर्वेद--4/15ईश्वर हमें यह मंत्र यजुर्वेद 4.15 का अंश है। इसका भाव अत्यंत प्रेरणादायक है।मंत्र"तनूपा अग्ने! पातु दुरिताद्..."(यजुर्वेद 4/15)भावार्थ :हे तनुओं (शरीर, जीवन और अस्तित्व) की रक्षा करने वाले अग्निस्वरूप परमेश्वर! हमें पाप, दुराचार, बुरे कर्मों और सभी प्रकार के दुष्प्रवृत्तियों से बचाइए। हमारे जीवन को सत्य, सदाचार और शुभ कर्मों की ओर प्रेरित कीजिए।सरल अर्थ :"ईश्वर हमें दुराचार, पाप और बुरे आचरण से बचाए तथा सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे।"यह मंत्र केवल बाहरी संकटों से रक्षा की प्रार्थना नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले क्रोध, लोभ, अहंकार और दुराचार से