वेदांत 2.0 : प्रकृतिजीवी से यंत्रजीवी तकयदि आज की शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था और तकनीकी सभ्यता को गहराई से देखें, तो प्रतीत होता है कि मनुष्य धीरे-धीरे प्रकृतिजीवी से यंत्रजीवी बनता जा रहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि विज्ञान या शिक्षा गलत हैं, बल्कि यह कि विकास का केंद्र मुख्यतः बाहरी सुविधा, उत्पादन और उपयोगिता बन गया है, जबकि मनुष्य के भीतर का चेतना-केंद्र, संवेदना और जीवन-बोध अपेक्षाकृत पीछे छूटते गए हैं।हम केवल प्रकृति से दूर नहीं हुए, बल्कि कई बार इस दूरी को ही प्रगति का प्रतीक मानने लगे। प्रश्न यह नहीं कि विज्ञान कितना आगे बढ़ा, बल्कि यह