ऋगुवेद सूक्ति-(१६)-की व्याख्या--"मान्तः स्थूर्नो अरातयः" — १०/५७/१भावार्थ --हमारे अन्दर कंजूसी न हो।पद विच्छेद --मान्तः — भीतर, अन्तर मेंस्थूः/स्थुर्नः — स्थिर न रहें, ठहरें नहींअरातयः — अराति = दान न करने की वृत्ति, कृपणता, शत्रुता, संकुचित भावशब्दार्थ--हे देव! हमारे अन्तःकरण में अराति (कंजूसी, दान न करने की वृत्ति, संकीर्णता) स्थिर न हो।अर्थात — मेरे भीतर कृपणता न रहे।वेदों से प्रमाण-- १. ऋगुवेद (क)--१०/११७/४“केवलाघो भवति केवलादी।”भावार्थ — जो अकेला खाता है (साझा नहीं करता), वह पाप का भागी होता है। यहाँ कृपणता और स्वार्थ की निन्दा है। (ख) ५/६१/५ "अदातारं परित्यजैत"भावार्थ --जो दान न दे, उसका त्याग करो।वेद में दानी पुरुष की प्रशंसा है और कृपण की