अमृत वाणी - संत वाणी - 19

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हम सब दिन-रात इस तलाश में भाग रहे हैं कि कहीं से हमें थोड़ा सुख और मन का सुकून मिल जाए। हम सोचते हैं कि जब बहुत सारा पैसा आ जाएगा, बड़ा घर मिल जाएगा या बड़ी गाड़ी आ जाएगी, तब हम खुश होंगे। लेकिन सच यह है कि जैसे-जैसे बाहरी चीजें बढ़ती हैं, हमारे मन की भूख और ज़्यादा बढ़ती जाती है। इस अंतहीन दौड़ और असली सुख के रहस्य को संत तुकाराम जी ने बहुत सरलता से समझाया है:“तुका म्हणे सुख संतापाचे मूळ।चित्त समाधान नाही ज्या पाशी॥” — संत तुकाराम(अर्थ: तुकाराम जी कहते हैं कि जब तक तुम्हारे