अमृत वाणी - संत वाणी - 18

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हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे जीवन में दुख इसलिए है क्योंकि हमारे पास साधनों की कमी है। लेकिन अगर हम ईमानदारी से अपने मन की जांच करें, तो हमें पता चलेगा कि हम अपने दुखों से उतने दुखी नहीं हैं, जितने दूसरों के सुखों को देखकर दुखी होते हैं। पड़ोसी की नई गाड़ी, दोस्त का नया प्रमोशन या सोशल मीडिया पर किसी की चकाचौंध देखकर हमारा मन अंदर ही अंदर सुलगने लगता है। इस मानसिक बीमारी को संत सुंदरदास जी ने बहुत ही करारे शब्दों में समझाया है:“पर सुख देखि न सकत जिय, जरि-बरि होवत छार।सुंदर ऐसे मनुष को,