अन्तर्निहित - 50

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[50]अपनी निर्दोषता सिद्ध होने पर वत्सर मन ही मन श्री कृष्ण का धन्यवाद करते हुए स्तुति करने लगा। न्यायालय के प्रांगण में स्थित एक पीपल वृक्ष के नीचे पद्मासन में आँखें बंद कर बैठे वत्सर को येला ने देखा। उसे इस अवस्था में देखकर वह रुकी, प्रतीक्षा करने लगी। जब वत्सर ने अपनी स्तुति सम्पन्न की तो आँखें खोली। उसने सम्मुख येला को पाया। “येला?” भाववश वह और कुछ बोल नहीं पाया। “वत्सर। मैं आज अत्यंत प्रसन्न हूँ किन्तु ग्लानि भी हो रही है कि मेरे कारण तुम्हें इतनी कष्ट से भरी यातना भुगतनी पड़ी। मैं इसके लिए क्षमा की प्रार्थना लेकर