ऋगुवेद सूक्ति- (32) की व्याख्या "स्तोतुर्मघवन काममा पृण"। ऋगुवेद ---१/५७/५भावार्थ --हे प्रभु! भक्त की कामनाओं को पूर्ण करो। मंत्र :“स्तोतुर्मघवन् काममापृण।”— ऋगुवेद --1.57.5पदच्छेद--स्तोतुः / स्तोतुर् — स्तुति करने वाले, भक्त या उपासक कामघवन् — दानी, कृपालु (इन्द्र अथवा परम दाता ईश्वर के लिए प्रयुक्त)कामम् — इच्छा, अभिलाषाआ पृण — पूर्ण करो, भर दो, संतुष्ट करो।भावार्थ-हे मघवन (दानी प्रभु)! जो भक्त आपकी स्तुति करता है, उसकी उचित और धर्मसम्मत कामनाओं को पूर्ण करो।इस मंत्र में वेद यह शिक्षा देता है कि ईश्वर दानी और कृपालु है। जो व्यक्ति श्रद्धा, स्तुति और सत्कर्म के साथ ईश्वर की उपासना करता है, उसकी आवश्यक और धर्मयुक्त इच्छाओं